बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मुसहरी प्रखंड से लगभग 18 किलोमीटर दूर स्थित नरौली गांव इसकी एक झलक प्रस्तुत करता है। करीब 250 से अधिक घरों वाले इस गांव में अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय के परिवार रहते हैं। अधिकांश लोग दिहाड़ी मजदूरी, खेतिहर कार्य, छोटे-मोटे श्रम या स्वरोजगार के सहारे अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। दिन भर की मेहनत से जितनी आमदनी होती है, उसी से घर का खर्च चलता है। ऐसे में यदि किसी सरकारी योजना का लाभ समय पर मिल जाए तो वह परिवार की जिंदगी में बड़ा बदलाव ला सकता है। लेकिन जब जानकारी अधूरी हो, कागज़ी प्रक्रिया पूरी न हो पाए या आवेदन बार-बार अधूरा रह जाए, तब योजनाएं लोगों की उम्मीद बनने के बजाय उनके लिए एक अधूरा सपना बन जाती हैं। गांव के कई परिवार आज भी उज्ज्वला योजना का पूरा लाभ नहीं प्राप्त कर सके हैं। परिणामस्वरूप उन्हें लकड़ी के चूल्हे पर ही खाना बनाना पड़ता है। रसोई में उठने वाला धुआं केवल आंखों में जलन या खांसी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि धीरे-धीरे सांस संबंधी समस्याओं का कारण भी बन सकता है। घर के भीतर घंटों तक धुएं के बीच खाना बनाने का सबसे अधिक असर उन लोगों पर पड़ता है जो रसोई में सबसे ज्यादा समय बिताते हैं। यह केवल ईंधन का सवाल नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, समय और गरिमा से जुड़ा विषय भी है। मानसून आने के बाद यह कठिनाई और बढ़ जाती है। बारिश में लकड़ियां गीली हो जाती हैं, जिससे उन्हें जलाना आसान नहीं होता। कई बार भोजन तैयार करने में घंटों लग जाते हैं और कई बार चूल्हा जल ही नहीं पाता। ऐसे दिनों में परिवारों को कम भोजन में काम चलाना पड़ता है या फिर बिना भोजन किए रात बितानी पड़ती है। जिन परिवारों की रोजी-रोटी पहले ही अनिश्चित हो, उनके लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण बन जाती है। एक साधारण-सी सुविधा की अनुपलब्धता पूरे परिवार की दिनचर्या, स्वास्थ्य और बच्चों के पोषण तक को प्रभावित करती है।
गांव के 40 वर्षीय शिव कुमार ठाकुर बताते हैं कि उन्होंने उज्ज्वला योजना का लाभ पाने के लिए कई बार आवेदन किया, लेकिन हर बार कागजात में किसी न किसी कमी की बात कहकर प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। उनके लिए सबसे बड़ी परेशानी यह है कि आखिर कौन-सा दस्तावेज़ अधूरा है और उसे कैसे पूरा किया जाए, इसकी स्पष्ट जानकारी उन्हें नहीं मिल पाती। सीमित आय वाले परिवार के लिए बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाना भी आसान नहीं होता। एक दिन काम छूटने का मतलब उस दिन की मजदूरी का नुकसान है, जो सीधे घर के खर्च पर असर डालता है। गांव की 55 वर्षीय नीलम देवी की कहानी भी इसी वास्तविकता को सामने लाती है। उनकी पांच बेटियां हैं और उनके पति दैनिक मजदूरी करते हैं। परिवार की आय इतनी नहीं है कि सभी जरूरतें आसानी से पूरी हो सकें। जब उनसे पूछा गया कि सरकार द्वारा गरीब परिवारों और लड़कियों की शिक्षा के लिए चलाई जा रही योजनाओं के बारे में उन्हें क्या जानकारी है, तो उन्होंने सहजता से कहा कि उन्हें ऐसी किसी योजना की जानकारी नहीं है। उनका नाम केवल राशन कार्ड में दर्ज है और उसी के माध्यम से मिलने वाली सुविधा तक ही उनकी पहुंच है। इसके अतिरिक्त किसी ने उन्हें अन्य योजनाओं की जानकारी नहीं दी और न ही वे कभी उन तक पहुंच सकीं। यह स्थिति बताती है कि केवल योजना शुरू कर देना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसकी जानकारी हर उस व्यक्ति तक पहुंचना भी उतना ही जरूरी है जिसके लिए वह बनाई गई है।
जानकारी का अभाव अक्सर उन लोगों को सबसे अधिक पीछे छोड़ देता है, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है। गांवों में आज भी अनेक परिवार ऐसे हैं जो यह नहीं जानते कि वे किन योजनाओं के पात्र हैं, आवेदन कैसे करें या दस्तावेज कहां से बनवाएं? कई बार परिवार का कोई सदस्य पढ़ा-लिखा नहीं होता या सरकारी प्रक्रियाओं को समझने वाला व्यक्ति आसपास नहीं होता। ऐसे में वे उपलब्ध अवसरों से अनजाने ही दूर रह जाते हैं। इसका असर केवल वर्तमान पर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के जीवन पर भी पड़ता है। गांव की 75 वर्षीय रतिया देवी अकेले जीवन बिता रही हैं। उनके पति का दस वर्ष पहले निधन हो चुका है। उनके दो बेटे दिल्ली में अपने परिवार के साथ रहते हैं। गांव में वे स्वयं मेहनत-मजदूरी करके अपना गुजारा करती हैं। वे बताती हैं कि आवश्यक कागजात पूरे नहीं होने के कारण उन्हें वृद्धावस्था पेंशन का लाभ नहीं मिल पा रहा है। उम्र के इस पड़ाव पर भी उन्हें अपनी आजीविका के लिए श्रम करना पड़ता है। उनके अनुसार गांव में ऐसा कोई नहीं है जो दस्तावेज़ पूरे कराने या प्रक्रिया समझने में उनकी मदद कर सके। ग्रामीण समाज में अक्सर यह माना जाता है कि घर और परिवार की जिम्मेदारियां अपने आप निभा ली जाएंगी। लेकिन जब रसोई में ईंधन की समस्या होती है, जब बच्चों की पढ़ाई के लिए उपलब्ध सहायता की जानकारी नहीं होती या जब वृद्ध व्यक्ति आवश्यक सहायता से वंचित रह जाता है, तब उसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है। परिवार का कोई एक सदस्य कठिनाई झेलता है तो उसका भार दूसरे सदस्यों के जीवन पर भी दिखाई देता है।
प्रियंका कुमारी
मुजफ्फरपुर, बिहार
टीम, गाँव की आवाज़
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)

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