समान नागरिक संहिता पर जारी बहस का एक लंबा ऐतिहासिक और संवैधानिक संदर्भ रहा है, जिसकी जड़ें संविधान सभा की बहसों तक जाती हैं। उस दौर में डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने अनुच्छेद 44 को राज्य के नीति निदेशक तत्वों में शामिल करने का पुरजोर बचाव किया था और तर्क दिया था कि एक साझा नागरिक कानून क्रमिक कार्यान्वयन के साथ राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगा। उनका दृढ़ मत था कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार राज्य को विवाह, उत्तराधिकार और विरासत जैसे सामाजिक मामलों में सुधार करने से नहीं रोक सकता। इसी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए प्रसिद्ध संविधान विशेषज्ञ ग्रैनविले ऑस्टिन ने इसे सामाजिक लोकतंत्र के निर्माण और सभी समुदायों को समान नागरिकता के तहत एकीकृत करने के संवैधानिक विजन के रूप में देखा था। हालाँकि प्रोफेसर उपेंद्र बक्शी जैसे विद्वान यह आगाह करते हैं कि कानूनी एकरूपता से सांस्कृतिक बहुलवाद को ठेस नहीं पहुँचनी चाहिए और अल्पसंख्यक अधिकारों व समानता में संतुलन होना चाहिए। वहीं राजीव भार्गव का 'सिद्धांतवादी दूरी' का विचार बताता है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता न्याय और समानता की गारंटी के लिए धर्म के साथ राज्य के जुड़ाव की अनुमति देती है। माधव खोसला भी मानते हैं कि संविधान विविधता का सम्मान करते हुए एक एकीकृत लोकतांत्रिक नागरिकता के निर्माण का खाका प्रस्तुत करता है। मार्था नुसबाम और फ्लेविया एग्नेस जैसी विचारकों ने भी इस बात पर जोर दिया है कि लैंगिक न्याय और समान नागरिकता के लिए भेदभावपूर्ण पर्सनल लॉ में सुधार आवश्यक है, और यह बहस केवल कानूनी एकरूपता के बजाय महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा और संवाद पर केंद्रित होनी चाहिए। प्रो. ताहिर महमूद के शब्दों में कहें तो, वर्तमान में लागू विशेष विवाह अधिनियम या घरेलू हिंसा विरोधी कानून पहले से ही क्रमिक एकरूपता की दिशा में बढ़ते कदम हैं, और UCC का वास्तविक उद्देश्य धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों को खत्म करना नहीं, बल्कि इसके माध्यम से धर्म आधारित भेदभाव और लैंगिक असमानता को समाप्त करना है। इसके साथ ही, भारतीय अकादमिक और कानूनी विद्वान फैज़ान मुस्तफा का यह संतुलित दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण है कि इस विषय पर चर्चा बहुसंख्यकवादी आवेगों या राजनीतिक प्रतीकों के बजाय संवैधानिक नैतिकता, सामाजिक आम सहमति और धीरे-धीरे किए जाने वाले सुधारों के माध्यम से होनी चाहिए, जहाँ मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता का भी सम्मान हो।
भारतीय सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में समान नागरिक संहिता को लेकर कई प्रकार की भ्रांतियां और गलतफहमियां फैलाई गई हैं, जिन्हें दूर करना बेहद आवश्यक है। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो, समान नागरिक संहिता का मतलब किसी भी समुदाय पर कोई 'हिंदू कोड' थोपना कतई नहीं है। बल्कि, यह नागरिक कानूनों का एक ऐसा साझा समूह है जो बिना किसी धर्म, जाति या क्षेत्र के भेदभाव के देश के सभी नागरिकों पर उन पारिवारिक मामलों में समान रूप से लागू होता है जहाँ वर्तमान में व्यक्तिगत कानून संचालित हो रहे हैं। इसके मुख्य कार्यक्षेत्रों में विवाह और तलाक (जैसे शादी की न्यूनतम उम्र, तलाक के वैध आधार, अनिवार्य पंजीकरण और बहुविवाह पर रोक), रखरखाव और गुजारा भत्ता (तलाक के बाद जीवनसाथी और बच्चों के वित्तीय अधिकार), उत्तराधिकार और विरासत (बेटों, बेटियों, जीवनसाथी और माता-पिता को संपत्ति में समान अधिकार) तथा गोद लेने व संरक्षकता (सभी नागरिकों के लिए एक समान धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया) शामिल हैं। जब हमारे देश में आपराधिक कानून, अनुबंध कानून, संपत्ति कानून और नागरिक प्रक्रिया संहिता जैसी व्यवस्थाएं पहले से ही पूरे देश के लिए व्यापक रूप से एक समान हैं, तो केवल पारिवारिक और नागरिक कानूनों में मौजूद यह अंतर सीधे तौर पर लैंगिक असमानता को बढ़ावा देता है। इस विसंगति को दूर करने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम (1985), सरला मुद्गल बनाम भारत संघ (1995) , और शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017) जैसे ऐतिहासिक मामलों में बार-बार दोहराया है कि महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और भेदभाव को रोकने के लिए देश को एक समान नागरिक संहिता की सख्त जरूरत है। शायरा बानो मामले में तत्काल तीन तलाक की प्रथा को असंवैधानिक घोषित किया जाना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि कोई भी धार्मिक या रूढ़िवादी प्रथा संवैधानिक नैतिकता और मानवीय गरिमा से ऊपर नहीं हो सकती।
भारत की जनसांख्यिकीय और भौगोलिक बनावट भी समान नागरिक संहिता के पक्ष में एक मजबूत और व्यावहारिक तर्क प्रस्तुत करती है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में हिंदुओं (79.8%), मुस्लिमों (14.2%), ईसाइयों (2.3%), सिखों (1.7%) और अन्य समुदायों के बीच भाषाई व क्षेत्रीय भिन्नताएं होने के बावजूद, पारिवारिक कानूनों से जुड़ी सामाजिक चुनौतियाँ एक समान हैं। बाल विवाह, लैंगिक रूप से पक्षपातपूर्ण विरासत, पर्याप्त गुजारा भत्ते की कमी और बहुविवाह जैसी समस्याओं का सामना हर समाज की महिला को करना पड़ता है। राजस्थान की एक हिंदू महिला हो या केरल की एक मुस्लिम महिला, दोनों ही तलाक के बाद समान आर्थिक असुरक्षा का सामना करती हैं, और एक साझा कोड उन्हें न्याय पाने के लिए अपना धर्म बदलने पर मजबूर किए बिना अधिकार प्रदान करता है। इसके अलावा, भारत में लगभग 450 मिलियन आंतरिक प्रवासी हैं और महानगरों में अंतर-सामुदायिक विवाहों का चलन बढ़ रहा है। मौजूदा व्यवस्था में ऐसे जोड़ों को कानूनी जटिलताओं का सामना करना पड़ता है, जिसे UCC पूरी तरह समाप्त कर नागरिकता को प्राथमिक पहचान दे सकता है। वर्तमान भारत की मध्यमान आयु (median age) 28.7 वर्ष है और 65% से अधिक आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है, जो आधुनिक शिक्षा और संवैधानिक समानता के मूल्यों में विश्वास रखती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के आंकड़े भी दर्शाते हैं कि युवा महिलाओं में समान विरासत और बाल विवाह के खिलाफ भारी समर्थन है। भौगोलिक दृष्टि से देखें तो, देश के विभिन्न राज्यों में एक ही महिला का कृषि भूमि पर अधिकार उसके धर्म और राज्य के नियमों के आधार पर बदल जाता है, जो न्याय के दोहरे मापदंड पैदा करता है। इसके विपरीत, गोवा में 1867 से लागू पुर्तगाली सिविल कोड यह साबित करता है कि एक समान कानूनी ढांचा सांस्कृतिक विविधता को नष्ट किए बिना बेहतर सामाजिक परिणाम, उच्च महिला साक्षरता और कम बाल विवाह दर सुनिश्चित कर सकता है। पूर्वोत्तर के राज्यों में भी आदिवासी प्रथाओं को संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप धीरे-धीरे सुधारा जा रहा है। अदालतों और कानूनी सहायता प्रणालियों पर से मुकदमों का बोझ कम करने, ग्रामीण क्षेत्रों में सुलभ न्याय सुनिश्चित करने और देश के भीतर कानून के शासन को मजबूत करने के लिए भी एक साझा कानून आवश्यक है।
धर्मनिरपेक्षता के दृष्टिकोण से भी समान नागरिक संहिता पूरी तरह तर्कसंगत और भारतीय दर्शन 'सर्वधर्म समभाव' (सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान और राज्य की तटस्थता) के अनुकूल है। एक धर्मनिरपेक्ष देश में व्यक्तिगत कानूनों को तब राज्य के कानून का बल नहीं दिया जा सकता जब वे नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करते हों। राज्य ने पहले भी लोक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता के आधार पर सती प्रथा, बाल विवाह और पशु बलि जैसी धार्मिक व सामाजिक कुप्रथाओं को प्रतिबंधित किया है, इसलिए भेदभावपूर्ण पारिवारिक कानूनों में सुधार करना धर्म-विरोधी नहीं बल्कि पूर्णतः संविधान-सम्मत कदम है। धर्म को पूजा-पद्धति, अनुष्ठानों और व्यक्तिगत विश्वास को संचालित करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन विवाह और विरासत जैसे नागरिक मामले जो सीधे तौर पर इंसानी अधिकारों को प्रभावित करते हैं, वे राज्य के नियामक दायरे में आने चाहिए। सच्ची धर्मनिरपेक्षता केवल समुदायों की पहचान की रक्षा नहीं करती, बल्कि समुदायों के भीतर मौजूद शोषित तबकों (जैसे महिलाओं और बच्चों) के अधिकारों की भी रक्षा करती है। UCC ऐसे शोषितों को अपने समुदाय के नेतृत्व को चुनौती दिए बिना सीधे संवैधानिक अधिकार प्राप्त करने का एक मजबूत विकल्प देता है। इसके साथ ही, यह पारिवारिक कानूनों को 'वोट बैंक की राजनीति' और तुष्टीकरण के चक्रव्यूह से बाहर निकालकर 'हिंदू बनाम मुस्लिम' के बजाय 'नागरिक बनाम भेदभाव' के सही और स्वस्थ विमर्श पर केंद्रित करता है।
व्यावहारिक धरातल पर देखें तो UCC कई आवश्यक कानूनी सुधारों का मार्ग प्रशस्त करेगा। उदाहरण के लिए, यह हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (2005) के तहत बेटियों को मिलने वाले समान अधिकारों और मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बेटे के मुकाबले आधे हिस्से की विसंगति को समाप्त कर दोनों को समान अधिकार देगा। यह तलाक की प्रक्रियाओं को मानकीकृत कर बिना किसी धार्मिक भेदभाव के सभी महिलाओं के लिए गरिमापूर्ण गुजारा भत्ता सुनिश्चित करेगा। बाल विवाह निषेध अधिनियम की विसंगतियों को दूर करते हुए यह सभी समुदायों में विवाह की न्यूनतम आयु अनिवार्य रूप से 18 वर्ष लागू करेगा, जिससे बच्चों के अधिकारों की रक्षा हो सके। वर्तमान में केवल हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख ही गोद ले सकते हैं, जबकि मुस्लिम, ईसाई और पारसी केवल संरक्षक बन सकते हैं जिससे बच्चे को विरासत का अधिकार नहीं मिलता; UCC इस प्रक्रिया को धर्मनिरपेक्ष बनाकर सभी के लिए गोद लेने का मार्ग खोलेगा, जैसा कि 2015 में विधि आयोग ने भी अनुशंसित किया था। इसके साथ ही, यह समाज में बहुविवाह जैसी लैंगिक रूप से भेदभावपूर्ण प्रथा को पूरी तरह प्रतिबंधित कर अनुच्छेद 15 के तहत लिंग-आधारित भेदभाव पर रोक लगाएगा।
इस कानून को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए भारत को एक व्यावहारिक और संवेदनशील रोडमैप पर आगे बढ़ना होगा, जहाँ यह किसी भी प्रकार का थोपा गया 'पैराशूट इंपोजिशन' न लगे। इसे व्यापक संसदीय बहस, जन-परामर्श और महिलाओं, कानूनी विशेषज्ञों व सामुदायिक नेताओं के प्रतिनिधित्व के साथ तैयार किया जाना चाहिए। इसकी शुरुआत उन क्षेत्रों से होनी चाहिए जहाँ सामाजिक आम सहमति आसान है—जैसे बहुविवाह पर रोक, अनिवार्य विवाह पंजीकरण और समान विवाह आयु। आदिवासी समुदायों के पारंपरिक कानूनों को तब तक संरक्षण और आंतरिक सुधार का अवसर दिया जा सकता है जब तक वे बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन न करें। साथ ही, देश भर में क्षेत्रीय भाषाओं में व्यापक कानूनी साक्षरता अभियान चलाए जाने चाहिए और न्यायपालिका को भी इसके निष्पक्ष अनुप्रयोग के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। निष्कर्ष के तौर पर, भारत की जनसांख्यिकीय और भौगोलिक विविधता कानूनी एकरूपता के मार्ग में कोई बाधा नहीं है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ रूढ़ियों को संरक्षण देना नहीं बल्कि नागरिकों को समान अधिकार देना है। समान नागरिक संहिता किसी की पहचान मिटाने का साधन नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का जरिया है कि किसी महिला या बच्चे की धार्मिक पहचान उसके साथ होने वाले न्याय या अन्याय का पैमाना न बने। अनुच्छेद 44 हमारे संविधान में केवल एक सजावटी आभूषण के रूप में मौजूद नहीं है, बल्कि यह एक न्यायपूर्ण, समान और समेकित राष्ट्र के निर्माण का मार्गदर्शी सूत्र है, जिसे सावधानीपूर्वक विचार-विमर्श के साथ लागू करना भारत की संवैधानिक यात्रा का अगला और अनिवार्य कदम है।
डॉ. शालिनी अली
(सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखिका)

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