- पूर्वी भारत के लिए भूमि एवं जल उत्पादकता तथा जलवायु-स्मार्ट कृषि पर दिया गया विशेष बल
डॉ. अनुप दास ने संस्थान की प्रमुख उपलब्धियों, वर्तमान अनुसंधान कार्यक्रमों तथा भावी प्राथमिकताओं की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने कहा कि संस्थान गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान के साथ-साथ विकसित प्रौद्योगिकियों को विस्तार गतिविधियों एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने के लिए भी प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि धान परती भूमि प्रबंधन संस्थान का एक प्रमुख कार्यक्रम बनकर उभरा है, जिसने संसाधन संरक्षण तकनीकों तथा धान, दलहन एवं तिलहन की उन्नत किस्मों के माध्यम से सतत कृषि सघनीकरण को बढ़ावा दिया है। इसके परिणामस्वरूप पिछले एक दशक में पूर्वी भारत में धान परती क्षेत्र में लगभग 15 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है। पिछली अनुसंधान सलाहकार समिति की बैठक में दिए गए सुझावों पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट डॉ. पी.सी. चंद्रन, प्रधान वैज्ञानिक एवं सदस्य सचिव, अनुसंधान सलाहकार समिति द्वारा प्रस्तुत की गई। अनुसंधान सलाहकार समिति ने संस्थान की अनुसंधान प्राथमिकताओं को और सुदृढ़ करने के लिए विशेष रूप से धान परती भूमि का सतत् सघनीकरण, समेकित कृषि प्रणाली, जल-स्मार्ट कृषि, जलवायु-सहिष्णु कृषि, पशुधन एवं मत्स्य उत्पादन, संसाधन-कुशल उद्यानिकी, प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन तथा साक्ष्य-आधारित नीति समर्थन के क्षेत्रों में रणनीतिक सुझाव दिए। समिति ने अनुसंधान कार्यक्रमों के व्यवस्थित प्रभाव मूल्यांकन की आवश्यकता पर बल देते हुए पूर्वी भारत में व्यापक प्रभाव सुनिश्चित करने के लिए अंतर्विषयक एवं सहयोगात्मक अनुसंधान को बढ़ावा देने की भी अनुशंसा की। इससे पूर्व अनुसंधान सलाहकार समिति के सदस्यों ने संस्थान के वैज्ञानिकों के साथ धान रोपाई में भाग लिया। उन्होंने विभिन्न प्रायोगिक अनुसंधान प्रक्षेत्रों, अनुसंधान सुविधाओं तथा प्रयोगशालाओं का भ्रमण कर वैज्ञानिकों के साथ संवाद किया और चल रहे अनुसंधान कार्यों की प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त की।
कार्यक्रम के अंतर्गत समिति के सदस्यों ने आम एवं अमरूद जैसे फलदार पौधों का रोपण कर वृक्षारोपण अभियान में भी भाग लिया। आगंतुक सदस्यों के लिए संस्थान द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियों एवं उत्पादों की प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। इस अवसर पर चार प्रकाशनों का विमोचन किया गया तथा जी-बायोम प्राइवेट लिमिटेड के साथ सूक्ष्मजीव आधारित इनोक्यूलेशन तकनीक द्वारा कृषि अपशिष्ट के वैज्ञानिक प्रबंधन हेतु एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। तकनीकी सत्रों के दौरान विभिन्न प्रभागाध्यक्षों तथा कृषि विज्ञान केंद्रों के प्रतिनिधियों ने अपनी-अपनी इकाइयों की अनुसंधान उपलब्धियों, विकसित प्रौद्योगिकियों, विस्तार गतिविधियों एवं भावी कार्ययोजनाओं पर प्रस्तुतियाँ दीं। इनमें फसल सुधार, समेकित कृषि प्रणाली, भूमि एवं जल प्रबंधन, पशुधन एवं मत्स्य प्रबंधन, कृषि सामाजिक-आर्थिक अनुसंधान तथा बक्सर एवं रामगढ़ कृषि विज्ञान केंद्रों की गतिविधियाँ प्रमुख रूप से शामिल थीं। संस्थान की 25 वर्षों की गौरवपूर्ण यात्रा के दौरान प्राप्त उपलब्धियों पर संतोष व्यक्त करते हुए अनुसंधान सलाहकार समिति के सदस्यों ने किसानों एवं पूर्वी भारत के कृषि विकास के लिए किए जा रहे गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान की सराहना की। समिति ने भूमि एवं जल उत्पादकता बढ़ाने, जलवायु-स्मार्ट कृषि को बढ़ावा देने, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के माध्यम से गुणवत्तायुक्त बीज, पौध रोपण सामग्री, मत्स्य बीज एवं पशुधन उत्पादन, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए नीति समर्थन तथा प्रमुख कृषि जिंसों की मूल्य श्रृंखला के विकास पर विशेष बल देने की अनुशंसा की। कार्यक्रम का समापन डॉ. कमल शर्मा, अध्यक्ष, पशुधन एवं मत्स्य प्रबंधन प्रभाग, आईसीएआर-आरसीईआर, पटना द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

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