1. फसल प्रबंधन एवं विविधीकरण
• कम अवधि वाली एवं सूखा सहनशील धान की किस्मों जैसे – स्वर्ण श्रेया, स्वर्ण उन्नत, सहभागी, लालट, IR-64, नवीन, बिरसा धान-108 का चयन करें।
• ऊपरी भूमि या जल की कमी वाले क्षेत्रों में वैकल्पिक फसलों का चयन करें: सीधी बुवाई वाली धान (Direct Seeded Rice) के साथ अरहर, मक्का एवं मूंगफली को वैकल्पिक फसलों के रूप में अपनाएँ।
• अरहर: बहार, बिरसा अरहर-1, UPAS-120, BR-65, नरेंद्र अरहर-1, IPA-203 (इन्हें खेत की मेड़ों पर भी उगाया जा सकता है)
• मक्का: बिरसा मक्का-1, बिरसा विकास मक्का-1 एवं 2
• रागी (मड़ुआ): बिरसा मड़ुआ-1, बिरसा मड़ुआ-2 बिरसा मड़ुआ-3
• अन्य विकल्प: सोयाबीन, मूंगफली, उड़द, तिल एवं मोटे अनाज (मिलेट्स)
• अंतरवर्तीय खेती अपनाएँ: मक्का + अरहर (2:1), मक्का + लोबिया (1:1), मक्का + उड़द (1:2), अरहर + उड़द (1:2), अरहर + मूंगफली
• पर्याप्त वर्षा या सिंचाई उपलब्ध होने पर सीधी बुवाई वाली धान अपनाएँ तथा बीज दर में 15–20% वृद्धि करें।
• समय एवं पानी की बचत हेतु मैट-टाइप (चटाई विधि) या डेपोग नर्सरी तैयार करें।
• विलंबित रोपाई की स्थिति में सामुदायिक नर्सरी स्थापित करें।
• बेहतर अंकुरण हेतु बीज प्राइमिंग (बीजों को रातभर पानी में भिगोना) करें।
• बुवाई से पूर्व बीजों का उपचार करें:
बाविस्टिन @ 2 ग्राम/किग्रा बीज,
जैव उर्वरक (PSB) का उपयोग करें
2. जल प्रबंधन
• खेत की मेड़ों का निर्माण एवं मरम्मत तुरंत करें ताकि जल का रिसाव रोका जा सके।
• वर्षा जल संचयन एवं संरक्षण हेतु मेड़ों की ऊँचाई बढ़ाएँ।
• मल्चिंग एवं अंतःसस्य (interculture) क्रियाओं द्वारा खेत में नमी संरक्षण (In-situ moisture conservation) करें।
3. पोषक तत्व प्रबंधन
• नाइट्रोजन उर्वरक को एक साथ देने के बजाय 3–4 भागों में (स्प्लिट डोज) दें।
• पोषक तत्वों की हानि कम करने हेतु नीम-लेपित यूरिया का प्रयोग करें।
• सूखी मिट्टी में कभी भी यूरिया का प्रयोग न करें।
• वर्षा या सिंचाई के तुरंत बाद अनुशंसित मात्रा का लगभग 75% उर्वरक दें।
4. खरपतवार प्रबंधन
• बुवाई/रोपाई के तुरंत बाद /अंकुरण-पूर्व खरपतवारनाशी का प्रयोग करें:
पेंडीमेथालिन @ 1.25 किग्रा सक्रिय तत्व/हेक्टेयर
प्रेटिलाक्लोर @ 0.75 किग्रा सक्रिय तत्व/हेक्टेयर
• अंकुरण के बाद (15–20 दिन बाद) खरपतवार नियंत्रण हेतु:
• बिस्पायरीबैक-सोडियम @ 75 ग्राम सक्रिय तत्व/हेक्टेयर
• जहाँ संभव हो, यांत्रिक निराई के लिए कोनो-वीडर का उपयोग करें।
• खरपतवार नियंत्रण एवं नमी संरक्षण हेतु फसल अवशेषों द्वारा मल्चिंग (पलवार) करें।

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