लोकतंत्र में विरोध अधिकार हो सकता है पर विरोध का एक तरीका होता है। शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का सबको अधिकार है पर अपने विरोध प्रदर्शन के चक्कर में अन्य और वह भी आमनागरिकों का जनजीवन प्रभावित करने का किसी को अधिकार नहीं हो सकता। विरोध के चलते कानून हाथ में लेना या क्षेत्राधिकार से बाहर जाना एक सभ्य समाज और सभ्य नागरिक की पहचान नहीं हो सकती। सरकारी या निजी संपत्ती को नुकसान पहुंचाना या कानून को हाथ में लेने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता। एक बात यह भी समझनी होगी कि पुलिस प्रशासन भी आखिर आदमी है और देखा जाएं तो उनका मरण दोनों तरफ से हो जाता है। यदि प्रदर्शनकारियों को एक सीमा से अधिक बढ़ने पर रोके नहीं तो प्रशासन की विफलता कहने में कोई देरी नहीं लगाता, यहां तक कि प्रशासन की इंटेलिजेंस फैलियर जैसे आरोप लग जाते हैं। प्रदर्शन के हिंसक होने पर प्रशासन द्वारा कार्रवाई की आलोचना आम हो जाती है पर जब कई बार प्रदर्शनकारियों द्वारा प्रदर्शन के दौरान बेरिकेड़ तोड़ने, पत्थरबाजी, तोड़फोड़ और निरपराध आमजन को निशाने पर लेने लगते हैं तो एक बात साफ हो जानी चाहिए कि फिर प्रशासन गुलाब के फूल देकर तो प्रदर्शन को नियंत्रित नहीं कर सकता हांलाकि प्रशासन को भी संयम बरतते हुए ही कदम उठाने चाहिए। दरअसल तस्वीर के दोनों पक्षों को देखना होगा। यदि प्रदर्शन सामान्य होता है और अनुमति प्राप्त शांतिपूर्ण प्रदर्शन हो तो उस पर पुलिस प्रशासन की सख्ती को किसी भी हालात में स्वीकारा नहीं जा सकता पर प्रदर्शनकारियों द्वारा लक्ष्मण रेखा लांघी जाती है तो उस पर प्रशासन को भी कानूनी दायरें में रहते हुए कार्रवाई तो करनी ही पड़ेगी।
अब जयपुर के स्कूल की घटना का विश्लेषण करें तो हालात की ओर ध्यान दिलाना एक उचित कदम हो सकता है पर स्कूल या किसी भी सरकारी-गैरसरकारी संस्थान का निरीक्षण का अधिकार किस कानून ने दे दिया है। एक सीमा तक प्रदर्शन आपका अधिकार हो सकता है पर प्रदर्शन से माहौल को तनावपूर्ण और द्वेषतापूर्ण बनाने की किसी भी व्यवस्था में अनुमति नहीं दी जा सकती और नहीं दी भी जानी चाहिए। प्रशासन, प्रदर्शनकारियों और आमजन को अपनी सीमाओं को समझना होगा। सुर्खियों में बनने के लिए कदम उठाना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
क्या कभी सोचा है कि हमारे प्रदर्षन से प्रदर्शन वाले शहरवासियों को कितना प्रभावित करता है। प्रदर्शन वाले शहर का कहीं ज्यादा तो कहीं कम यातायात प्रभावित हो जाता है। निजी व सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था बाधित हो जाती है। मरीजों व जरुरी काम वालों को बीच रास्ते अटकना पड़ जाता है। नौकरीपेशा या धंधे पर जाने वाले रास्ते में ही अटक जाते है। दैनिक काम के आधार पर रोजी रोटी कमाने वालों की मजदूरी अटक जाती है। शहर की सभी तरह की सप्लाई चैन बाधित हो जाती है। पुलिस प्रशासन व्यवस्था बनाये रखने के लिए व्यस्त हो जाता है तो लोगों में असुरक्षा की भावना बनती है और बाहर निकलने से पहले सोचने को मजबूर हो जाते हैं। और अब तो प्रशासन द्वारा ऐसे शहरों में इंटरनेट बंद करने तक का निर्णय कर लिया जाता है जिससे सामान्य गतिविधियां, बैंकिंग व्यवस्था, सूचनाओं का आदान-प्रदान और पढ़ाई-लिखाई तक पर असर पड़ता है। ऐसे में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अमित महाजन की यह टिप्पणी कि शहर को बेवजह बंधक बनाने की इजाजत कैसे दी जा सकती है।
प्रशासन भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। पहले तो प्रशासन को भी चाहिए कि प्रदर्शन आदि के लिए ऐसा स्थान निर्धारित हो जहां से सामान्य जनजीवन किसी तरह से प्रभावित ना हो सके। आम जन, शहरी यातायात, शहर का दैनिक जनजीवन किसी तरह से प्रभावित ना हो। ऐसी व्यवस्था हो जिससे प्रदर्शनकारियों की बात वे जहां पहुंचाना चाहते हैं वहां तक पहुंचाई जा सके। प्रदर्शनकारियों को भी प्रदर्शन के दौरान शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखनी चाहिए। असामाजिक तत्वों को किसी तरह का मौका ही नहीं दिया जाना चाहिए। जब किसी प्रदर्शन के दौरान हिंसा या गलत गतिविधियां होने लगती है और व्यवस्था हाथों से निकलने लगती है व प्रशासन द्वारा सख्ती होती है तो यह सामान्य जबाव होता है कि हिंसा या हालात बिगाड़ने वाले असामाजिक तत्व उनमें से नहीं थे पर ऐसा कहने मात्र से जिम्मेदारी से नहीं बचा जा सकता। इसलिए दिल्ली उच्च न्यायालय व न्यायालयों द्वारा पूर्व में भी दी गई टिप्पणियों को गंभीरता से प्रदर्शनकर्ताओं और प्रशासन दोनों को समझना होगा व दोषारोपण के नाम पर जिम्मेदारी से भागने की इजाजत किसी भी हालत में नहीं दी जा सकती। अपनी बात कहने के अधिकार के साथ दूसरों के मौलिक अधिकारों का भी सम्मान करना होगा। कानून व्यवस्था को हाथ में लेने या सीमाओं को लांघने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें