वैज्ञानिकों ने किसानों को यह भी बताया कि केवल मखाना उत्पादन तक सीमित रहने के बजाय प्रसंस्करण , ग्रेडिंग, पैकेजिंग , ब्रांडिंग एवं मूल्य संवर्धन के माध्यम से मखाना को एक लाभदायक उद्यम के रूप में विकसित किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त मखाना की खेती के साथ मछली पालन को अपनाकर एक ही जलाशय से दोहरी आय प्राप्त की जा सकती है, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति और अधिक सुदृढ़ होगी। प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान किसानों ने मखाना उत्पादन से जुड़ी विभिन्न समस्याओं एवं जिज्ञासाओं को वैज्ञानिकों के समक्ष रखा, जिनका विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में राइमा ग्राम के प्रगतिशील किसानों सहित पंचायत प्रतिनिधियों एवं अन्य गणमान्य व्यक्तियों की भी सक्रिय सहभागिता रही। कार्यक्रम के समापन अवसर पर वैज्ञानिकों ने किसानों से आह्वान किया कि वे मखाना उत्पादन में आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाते हुए गुणवत्तापूर्ण बीज, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन तथा मूल्य संवर्धन पर विशेष ध्यान दें। उन्होंने कहा कि मखाना आधारित उद्यमिता एवं एकीकृत कृषि प्रणाली को अपनाकर किसान अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर आत्मनिर्भर एवं समृद्ध बन सकते हैं। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम किसानों को वैज्ञानिक खेती से जोड़ने, मखाना आधारित उद्यमिता को बढ़ावा देने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार एवं आय के नए अवसर सृजित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं प्रभावी पहल सिद्ध हुआ।
राइमा/मधुबनी (रजनीश के झा) । डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर के अंतर्गत क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र (RRS), झंझारपुर द्वारा बुधवार को मधुबनी जिले के राइमा ग्राम में "मखाना उत्पादन एवं उद्यमिता विकास" विषय पर एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम में 50 से अधिक किसानों ने भाग लिया। प्रशिक्षण का उद्देश्य किसानों को मखाना की वैज्ञानिक खेती, गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन, आधुनिक उत्पादन तकनीक, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन तथा उद्यमिता विकास से संबंधित नवीन जानकारियाँ उपलब्ध कराना था। कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिकों ने किसानों को खेत एवं जलाशय की वैज्ञानिक तैयारी, समय पर पौध स्थापना, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, जल प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण तथा अधिक उत्पादन प्राप्त करने हेतु अपनाई जाने वाली आधुनिक कृषि तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक अनुशंसाओं का पालन करने से उत्पादन लागत में कमी आती है तथा उपज एवं गुणवत्ता दोनों में वृद्धि होती है। इस अवसर पर डॉ. संजय कुमार, डॉ. एस. के. गंगवार, डॉ. सुनील कुमार मंडल, डॉ. राहुल राजपूत एवं डॉ. आशीष राय ने मखाना फसल में लगने वाले प्रमुख कीट एवं रोगों की पहचान, उनके लक्षण, फसल पर होने वाले दुष्प्रभाव तथा उनके प्रभावी नियंत्रण के लिए समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन (IPM) की वैज्ञानिक तकनीकों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने किसानों को नियमित फसल निरीक्षण, समय पर उपचार तथा अनुशंसित कृषि तकनीकों को अपनाने की सलाह दी, जिससे गुणवत्तापूर्ण एवं अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सके।

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