सपने मेरे बड़े थे, पर रास्ते थे रोकते,
मंज़िल दूर थी, मगर हौसला कम न था,
कमियाँ थीं बहुत, पर सपना छोटा न था,
समाज में हर किसी के अपने सपने होते हैं,
पर उन्हें पूरा करने के रास्ते कहाँ होते हैं?
थोड़ी कमी पैसों की थी, हुनर मैंने खुद में पाया,
कविताओं ने मेरे भीतर का रास्ता दिखाया,
छोटे-छोटे कदमों से बड़े सपने सजाए,
मंज़िल आज भी दूर है, पर उम्मीद साथ है,
मगर मेरे सपनों की उड़ान अभी बाकी है।।
गुड़िया कपकोटी
कक्षा – 11वीं
गाँव – सलानी, उत्तराखंड

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