- 11 किलोमीटर की कांवड़ यात्रा के बाद किया भगवान शिव का सामूहिक अभिषेक, दो क्विंटल खीर का भोग लगाकर श्रद्धालुओं में बांटी प्रसादी
अमावस्या के साथ कांवड़ यात्रा का हुआ विराम
विठलेश सेवा समिति के मीडिया प्रभारी मनोज दीक्षित मामा ने बताया कि भादो अमावस्या के साथ इस वर्ष सीवन नदी के तट से कुबेरेश्वरधाम तक चलने वाली कांवड़ यात्रा के नियमित क्रम का विराम हो गया है। अब सीवन नदी तट से कांवड़ लेकर धाम पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में कमी आएगी। उन्होंने बताया कि सावन से लेकर भादो अमावस्या तक बड़ी संख्या में महाराष्ट्र, राजस्थान सहित देश के विभिन्न हिस्सों से शिवभक्त कांवड़ लेकर कुबेरेश्वरधाम पहुंचे और बाबा का अभिषेक किया। आने वाले दिनों में भी श्रद्धालुओं के धाम पहुंचने और एक लोटा जल अर्पित कर भगवान शिव का अभिषेक करने का क्रम जारी रहेगा।
आस्था के आगे तेज धूप भी नहीं बनी बाधा
अमावस्या के अवसर पर सीवन नदी तट से कांवड़ यात्रा शुरू करने वाले श्रद्धालुओं में खासा उत्साह नजर आया। तेज धूप के बीच शिवभक्त कांवड़ लेकर करीब 11 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए धाम पहुंचे। रास्ते भर भगवान शिव के जयकारे और भक्ति के स्वर सुनाई देते रहे। धाम पहुंचने के बाद श्रद्धालुओं ने कांवड़ में लाए पवित्र जल से भगवान शिव का अभिषेक किया। सामूहिक अभिषेक के दौरान श्रद्धालुओं ने परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना की।
सादगी और विश्वास से करें भगवान शिव की आराधना
इस अवसर पर कथा वाचक पंडित राघव मिश्रा ने भगवान शिव की आराधना के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भगवान शिव की पूजा-अर्चना सादगी और पूर्ण विश्वास के साथ करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि श्रद्धालु पूरी आस्था और विश्वास के साथ भगवान शिव को मात्र एक लोटा जल अर्पित करें। भगवान शिव का स्वरूप और उनकी महिमा इतनी व्यापक है कि उनका पूर्ण वर्णन करना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि भगवान शिव एक ओर भोलेनाथ के रूप में पूजे जाते हैं, तो दूसरी ओर वे महाकाल के रूप में भी आराध्य हैं। सदाशिव आदि काल से ही साधकों के मध्य प्रिय रहे हैं। शिव की भक्ति में दिखावे से अधिक श्रद्धा और भाव का महत्व है।
संत का अर्थ है परम संतुलन
पंडित राघव मिश्रा ने संतों के स्वरूप और उनकी साधना पर भी विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जो मन की सीमा के पार है, वही संत है। संत का अर्थ परम संतुलन है और स्वयं को संतुलित रखना अपने आप में एक विशेष तप है। उन्होंने कहा कि किसी संत को केवल उसकी वेशभूषा के आधार पर नहीं परखना चाहिए। संत साधना का दूसरा रूप है। संत वही है, जिसके सान्निध्य में व्यक्ति को अपने अस्तित्व और स्वयं के भीतर झांकने का अवसर मिले। उन्होंने कहा कि प्रेम सदैव बुद्धि और तर्क से परे होता है।
कांवड़ यात्रा के बाद भी बना रहेगा शिवभक्ति का क्रम
कांवड़ यात्रा के विराम के साथ सीवन नदी तट से धाम तक प्रतिदिन कांवड़ लेकर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या भले ही कम हो, लेकिन कुबेरेश्वरधाम में शिवभक्ति का क्रम निरंतर बना रहेगा। श्रद्धालु धाम पहुंचकर भगवान शिव के दर्शन करेंगे और एक लोटा जल अर्पित कर अभिषेक करेंगे। सावन से भादो अमावस्या तक चले कांवड़ यात्रा के इस क्रम में बड़ी संख्या में शिवभक्तों ने भाग लेकर भगवान शिव के प्रति अपनी आस्था प्रकट की। अमावस्या पर हुए सामूहिक अभिषेक, भोग और प्रसादी वितरण के साथ कांवड़ यात्रा के इस चरण का समापन हुआ।

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