- चेन्नई में छह दिवसीय मीडिया दौरे की यादगार शुरुआत पीआईबी वाराणसी कार्यालय के आयोजन में सरकारी संग्रहालय पहुंचे पत्रकार
- चेन्नई के सरकारी संग्रहालय में काशी से पहुंचे पत्रकारों ने देखी दक्षिण भारत की कला-संस्कृति की समृद्ध विरासत
1851 में रखी गई थी विरासत को सहेजने की नींव
एग्मोर का सरकारी संग्रहालय भारत के सबसे महत्वपूर्ण संग्रहालयों में गिना जाता है। 1851 में स्थापित यह संग्रहालय भारतीय संग्रहालय, कोलकाता के बाद देश के सबसे पुराने संग्रहालयों में शामिल है। विशाल परिसर में फैला यह संग्रहालय दक्षिण भारतीय इतिहास, पुरातत्व, कला, संस्कृति और प्राकृतिक विरासत का अनूठा दस्तावेज है। यहां रखी वस्तुएं केवल देखने भर की चीजें नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की निरंतर यात्रा की जीवंत कड़ियां हैं। संग्रहालय की सबसे बड़ी विशेषताओं में दक्षिण भारतीय कांस्य प्रतिमाओं का विशाल संग्रह शामिल है। ब्रॉन्ज गैलरी में पहुंचते ही चोलकालीन कला की उत्कृष्टता सामने आती है। यहां की कांस्य प्रतिमाओं में शिल्पकारों की कल्पना, आध्यात्मिक चेतना और धातु-कला का अद्भुत मेल दिखाई देता है।
नटराज के रूप में साकार हुआ नृत्य और दर्शन
ब्रॉन्ज गैलरी का नटराज विशेष आकर्षण का केंद्र है। नृत्यरत शिव की यह प्रतिमा केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन, कला और सृष्टि के निरंतर प्रवाह का कलात्मक रूपक प्रतीत होती है। इसके साथ राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान की कांस्य प्रतिमाएं भी दक्षिण भारतीय मूर्तिकला की बारीकी और सौंदर्य को सामने रखती हैं। चोलकालीन कांस्य प्रतिमाओं की यह परंपरा भारतीय मूर्तिकला के स्वर्णिम अध्यायों में मानी जाती है। संग्रहालय की यह दीर्घा इस बात का प्रमाण है कि सदियों पहले दक्षिण भारत में धातु को आकार देने वाले कलाकारों ने किस ऊंचाई की कलात्मक दृष्टि विकसित कर ली थी।
पुरातत्व दीर्घाओं में सदियों का सफर
संग्रहालय का पुरातत्व खंड दक्षिण भारत के गौरवशाली अतीत का विस्तृत परिचय कराता है। चोल, विजयनगर, होयसल और चालुक्य काल से जुड़े पुरावशेष यहां इतिहास के अलग-अलग पड़ावों को सामने रखते हैं। पत्थर की प्रतिमाओं से लेकर प्राचीन कलाकृतियों तक, प्रत्येक वस्तु अपने समय की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का संकेत देती है। प्राचीन सिक्कों का संग्रह तत्कालीन आर्थिक व्यवस्था और राजसत्ता की झलक देता है, जबकि अस्त्र-शस्त्र, कठपुतलियां, नृवंशविज्ञान संबंधी वस्तुएं और संरक्षित पुरावशेष दक्षिण भारत के लोकजीवन और सांस्कृतिक विविधता से परिचित कराते हैं।
चित्रों में राजदरबार से आधुनिकता तक
संग्रहालय परिसर की नेशनल आर्ट गैलरी कला प्रेमियों के लिए अलग आकर्षण रखती है। यहां पारंपरिक और आधुनिक चित्रकला की दुर्लभ कृतियों का संग्रह है। राजा रवि वर्मा की कलाकृतियां भारतीय चित्रकला के उस दौर की याद दिलाती हैं, जब पौराणिक पात्रों और भारतीय समाज को यथार्थपरक चित्रों के माध्यम से नया दृश्य रूप मिल रहा था। गैलरी में राजस्थानी चित्रकला, मुगलकालीन कला, 17वीं शताब्दी की दक्कनी चित्रकला तथा विभिन्न कालखंडों की दुर्लभ कृतियां भारतीय चित्रकला की विविध परंपराओं को एक साथ प्रस्तुत करती हैं। वहीं कंटेम्परेरी आर्ट गैलरी में ब्रिटिश काल के व्यक्तिचित्रों से लेकर आधुनिक कला तक का संसार दिखाई देता है।
बच्चों के लिए इतिहास बना रोचक अनुभव
संग्रहालय परिसर का चिल्ड्रेन म्यूजियम भी अपनी तरह की महत्वपूर्ण पहल है। यहां शैक्षिक और संवादात्मक प्रदर्शनियों के जरिए बच्चों को इतिहास, विज्ञान, कला और संस्कृति से परिचित कराने का प्रयास किया गया है। किताबों में पढ़े जाने वाले इतिहास को वस्तुओं और दृश्यों के माध्यम से समझने का अवसर बच्चों के लिए इसे आकर्षक बनाता है।
म्यूजियम थिएटर में संस्कृति का जीवंत मंच
संग्रहालय का म्यूजियम थिएटर भी इस परिसर की सांस्कृतिक पहचान को विस्तार देता है। यहां अकादमिक कार्यक्रमों के साथ नाटक, संगीत समारोह और विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित होती हैं। इस तरह संग्रहालय केवल अतीत को संरक्षित करने वाला स्थान नहीं, बल्कि वर्तमान में संस्कृति के संवाद का भी मंच बना हुआ है।
किताबों में सुरक्षित सदियों की स्मृतियां
संग्रहालय परिसर में स्थित कॉननेमारा पब्लिक लाइब्रेरी इस सांस्कृतिक यात्रा को साहित्य से जोड़ती है। दुर्लभ और प्राचीन प्रकाशनों तथा महत्वपूर्ण साहित्यिक संग्रहों के लिए प्रसिद्ध यह पुस्तकालय शोधार्थियों और पुस्तक प्रेमियों के लिए विशेष महत्व रखता है। संग्रहालय की कलाकृतियां जहां पत्थर और धातु में इतिहास को सुरक्षित रखती हैं, वहीं पुस्तकालय की पुस्तकों में वही इतिहास शब्दों के रूप में सांस लेता नजर आता है।
काशी से चेन्नई तक संस्कृति का सेतु
पीआईबी वाराणसी कार्यालय के आयोजन में शुरू हुई यह यात्रा पत्रकारों के लिए केवल एक मीडिया दौरा नहीं, बल्कि भारत की विविध सांस्कृतिक धाराओं को करीब से समझने का अवसर भी बनी। काशी की प्राचीन आध्यात्मिक-सांस्कृतिक परंपरा से आए पत्रकारों के लिए चेन्नई के संग्रहालय में दक्षिण भारत की कला और इतिहास को देखना देश की सांस्कृतिक एकता की उस तस्वीर से परिचित होना था, जिसमें भाषाएं और क्षेत्र अलग हो सकते हैं, लेकिन विरासत की आत्मा एक है। एग्मोर का सरकारी संग्रहालय इस यात्रा के पहले पड़ाव में ही यह संदेश दे गया कि भारत का इतिहास किसी एक काल, क्षेत्र या भाषा की कहानी नहीं है। यह उन असंख्य सभ्यताओं, कलाओं और परंपराओं का सम्मिलित आख्यान है, जो सदियों से एक-दूसरे में रंग घोलते हुए आज के भारत की पहचान गढ़ रहे हैं।

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