एक हजार से ज्यादा मौतें, हजारों अब भी लापता
1 सितंबर तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक नेपाल में कम से कम 987 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी थी। चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी 16 मौतें दर्ज की गई हैं। दोनों तरफ मिलाकर मृतकों की संख्या 1,000 से ज्यादा हो चुकी है। नेपाल में करीब 3,900 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। इनमें 38 देशों के 583 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। कई शव बाढ़ के साथ बहकर नेपाल में घटनास्थल से सैकड़ों किलोमीटर दूर और भारत के उत्तर प्रदेश तक पहुंचे हैं। नेपाल में रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, गोरखा और चितवन समेत कई जिले प्रभावित हुए हैं। सड़कें और पुल टूटे हैं, गांवों का संपर्क टूटा है और कई जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचा है। कम से कम 13 जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं और करीब 431 मेगावाट क्षमता के संयंत्र बिजली ग्रिड से बाहर हो गए हैं। निर्माणाधीन परियोजनाओं को भी नुकसान पहुंचा है। प्रारंभिक सरकारी अनुमान के मुताबिक नुकसान 200 अरब नेपाली रुपये से ज्यादा हो सकता है। पुनर्निर्माण की लागत इससे कई गुना अधिक होने का अनुमान है। यह ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़ नहीं थी, लेकिन खतरा उससे कहीं ज्यादा जटिल हो सकता है हिमालय में ग्लेशियल झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ यानी जीएलओएफ को लेकर पिछले कुछ वर्षों में काफी चर्चा हुई है। जीएलओएफ में आम तौर पर किसी ग्लेशियल झील में पानी बढ़ने और उसके प्राकृतिक बांध के टूटने जैसी प्रक्रिया होती है। ऐसी झीलों की निगरानी करके संभावित जोखिम का कुछ हद तक अनुमान लगाया जा सकता है।
रसुवा में घटनाक्रम अलग था।
यहां खतरा एक ऊंचे और अस्थिर पर्वतीय हिस्से से अचानक शुरू हुआ। बर्फ और चट्टान का विशाल हिस्सा नीचे गिरा, उसने मलबे और पानी को तेजी से आगे धकेला और कुछ ही मिनटों में नदी घाटी में विनाशकारी बाढ़ आ गई। यानी जिस जगह से आपदा शुरू हुई, वह उस बुनियादी ढांचे से बहुत ऊपर थी जिसे बचाने के लिए चेतावनी प्रणाली बनाई गई थी। हिमालयी क्षेत्र में काम करने वाली अंतर-सरकारी संस्था आईसीआईएमओडी के वरिष्ठ क्रायोस्फीयर विशेषज्ञ डॉ. फारूक आजम के मुताबिक, यह अचानक शुरू होने वाली ऐसी आपदा थी, जिसमें चेतावनी जारी करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला। इस तरह की घटनाओं के लिए यह एक गंभीर चुनौती है। किसी नदी में पानी बढ़ने का पता लगाने वाला सेंसर तब तक उपयोगी हो सकता है, जब तक पानी नीचे की ओर पहुंचने में पर्याप्त समय ले। लेकिन अगर पहाड़ का एक हिस्सा अचानक टूटकर कुछ ही मिनटों में घाटी तक पहुंच जाए, तो पारंपरिक चेतावनी प्रणाली की सीमा सामने आ जाती है।
क्या जलवायु परिवर्तन इसके पीछे है?
यहीं वैज्ञानिक सावधानी जरूरी है। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि 26 अगस्त की इस खास घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन ने पैदा किया। वैज्ञानिक अभी यह समझ रहे हैं कि ढलान के टूटने के पीछे कौन से भौगोलिक और पर्यावरणीय कारक काम कर रहे थे। लेकिन व्यापक वैज्ञानिक तस्वीर चिंता बढ़ाती है। आईसीआईएमओडी की एचकेएच ग्लेशियर आउटलुक 2026 रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदूकुश हिमालय में ग्लेशियर तेजी से अपना द्रव्यमान खो रहे हैं। पिछले 50 वर्षों के रिकॉर्ड में करीब 89 प्रतिशत वर्षों में ग्लेशियरों का द्रव्यमान संतुलन नकारात्मक रहा है। वर्ष 2000 के बाद यह नुकसान और तेज हुआ है। इसी दौरान हिमालय के ऊंचाई वाले इलाकों में पर्माफ्रॉस्ट भी गर्म हो रहा है। पर्माफ्रॉस्ट यानी ऐसी जमीन जो लगातार जमी रहती है। इसके पिघलने से चट्टानी ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है और मिट्टी का कटाव, भूस्खलन तथा ढलान के अचानक टूटने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए जलवायु परिवर्तन का संबंध किसी एक घटना के साथ सीधे जोड़ने के बजाय वैज्ञानिक अब एक बदलते पर्वतीय तंत्र को देख रहे हैं। गर्म होता वातावरण बर्फ, ग्लेशियर, पर्माफ्रॉस्ट और चट्टानों के बीच उन संबंधों को बदल रहा है, जो सदियों से अपेक्षाकृत स्थिर रहे हैं।
हिमालय सिर्फ ग्लेशियरों के पिघलने की कहानी नहीं है
क्लाइमेट ट्रेंड्स के एक अध्ययन में भारतीय हिमालय में ब्लैक कार्बन और बर्फ की सतह के तापमान के बीच भी संबंध पाया गया है। अध्ययन के मुताबिक, 2000-09 और 2010-19 के बीच ब्लैक कार्बन की मात्रा में करीब 7.74 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 2000-09 में हिमालयी बर्फ की सतह का औसत तापमान करीब -11.27 डिग्री सेल्सियस था, जो 2020-23 में बढ़कर -7.13 डिग्री सेल्सियस हो गया। ब्लैक कार्बन बर्फ की सतह पर जमा होकर उसकी सूर्य की रोशनी परावर्तित करने की क्षमता घटाता है। इससे सतह अधिक गर्म हो सकती है और बर्फ तथा ग्लेशियर के पिघलने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। दूसरी तरफ, बर्फ की चादर के घटने और जल्दी पिघलने से नदियों में पानी पहुंचने का समय भी बदल रहा है। यानी हिमालय में बदलाव सिर्फ इस सवाल तक सीमित नहीं है कि ग्लेशियर कितनी तेजी से पीछे हट रहे हैं। सवाल यह भी है कि बदलती बर्फ, गर्म होती जमीन और अस्थिर होती ढलानें भविष्य में किस तरह की नई आपदाएं पैदा कर सकती हैं।
शुरुआती चेतावनी से आगे की तैयारी
रसुवा की घटना का सबसे बड़ा सबक शायद यही है कि शुरुआती चेतावनी प्रणाली जरूरी है, लेकिन हर आपदा के लिए पर्याप्त नहीं है। जहां चेतावनी के लिए कुछ घंटे या दिन मिल सकते हैं, वहां निगरानी और लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना हजारों जानें बचा सकता है। लेकिन बर्फ और चट्टान के अचानक टूटने जैसी घटना में बुनियादी ढांचे को बचाने या लोगों को निकालने के लिए कुछ मिनट भी नहीं मिल सकते। ऐसे में जमीन के इस्तेमाल की योजना की भूमिका बढ़ जाती है। हिमालयी घाटियों में सड़कें, जलविद्युत परियोजनाएं, बस्तियां और दूसरे बुनियादी ढांचे किस जगह बनाए जा रहे हैं, यह सवाल अब केवल इंजीनियरिंग का नहीं है। यह बदलती जलवायु और पर्वतीय खतरों का भी सवाल है। आईसीआईएमओडी ने हिमालय के लिए भूमि उपयोग की योजना को मजबूत करने, बुनियादी ढांचे की पूरी उम्र के दौरान बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों के प्रभाव का आकलन करने और स्थानीय तथा पारंपरिक ज्ञान को आपदा योजना में शामिल करने की जरूरत बताई है। ऐतिहासिक रूप से हिमालयी समुदायों ने कई जगहों पर ऊंची जमीन और नदी की मुख्य धारा से दूर रहने को प्राथमिकता दी थी। आधुनिक निर्माण ने कई इलाकों में नदी किनारों और बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्रों तक विस्तार किया है। रसुवा की घटना ऐसे फैसलों को फिर से देखने का संकेत देती है। क्योंकि हिमालय में अगली बड़ी आपदा जरूरी नहीं कि किसी ऐसी जगह से आए, जिसे आज हम खतरे की सूची में जानते हैं। वह किसी बर्फीली ढलान के भीतर छिपी अस्थिरता से शुरू हो सकती है। कुछ मिनटों में मलबे की नदी बन सकती है। और तब चेतावनी प्रणाली से ज्यादा मायने रखेगा कि हमने पहले से क्या तैयारी की थी।

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