खेती इस संकट का एक खास हिस्सा है। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में होने वाली कार्यस्थल से जुड़ी मौतों में करीब एक-तिहाई कृषि क्षेत्र में होती हैं। लंबे समय तक बिना पर्याप्त आराम के काम करना, खतरनाक कीटनाशकों और रसायनों का संपर्क और अब बढ़ता चरम मौसम खेतों में काम करने वालों के लिए जोखिम बढ़ा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन इस जोखिम को और बढ़ा रहा है। अत्यधिक गर्मी, जंगल की आग, बाढ़ और दूसरे जलवायु प्रभाव खेतिहर कामगारों की सेहत और जीवन के लिए खतरा बढ़ा रहे हैं। रिपोर्ट कहती है कि बहुत से कृषि कामगारों को चरम मौसम से बचाव के लिए बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। IPES-Food के पैनल विशेषज्ञ मामादू गोइटा ने इसे सीधे श्रमिक अधिकारों से जोड़ा है। उनका कहना है कि हाल की हीटवेव दिखाती हैं कि जलवायु परिवर्तन अब श्रमिकों के अधिकारों का भी संकट बन रहा है। खेतिहर कामगार पहले से कम मजदूरी, जहरीले कीटनाशकों और बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। बढ़ती गर्मी उनके काम को और खतरनाक बना रही है। गोइटा के मुताबिक सरकारों को कामगारों के लिए छांव, आराम और पीने के पानी जैसी जीवन बचाने वाली बुनियादी सुविधाओं की गारंटी देनी चाहिए। रिपोर्ट में तकनीक से जुड़े नए जोखिमों की भी बात की गई है। डिजिटल निगरानी और एल्गोरिदम आधारित प्रबंधन का इस्तेमाल कामगारों पर नियंत्रण और काम की रफ्तार बढ़ाने के लिए किया जा रहा है। ऑटोमेशन से कुछ नौकरियां खत्म होने के साथ स्वास्थ्य और सुरक्षा के जोखिम भी बढ़ सकते हैं। अमेरिका और ब्राजील के मीटपैकिंग उद्योगों का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट कहती है कि वहां कामगारों को चोट और बीमारी की दर राष्ट्रीय औसत से 3 से 10 गुना तक ज्यादा है। फूड डिलीवरी जैसे ऐप आधारित काम में भी जोखिम और असुरक्षा का बड़ा हिस्सा कामगारों पर डाल दिया जाता है।
प्रवासी कामगारों की स्थिति और कठिन है। खेती, खाद्य प्रसंस्करण, डिलीवरी और हॉस्पिटैलिटी जैसे क्षेत्रों में इनकी बड़ी भूमिका है। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक कई देशों की प्रवासन नीतियां उन्हें कानूनी अनिश्चितता में रखती हैं। नियोक्ता से जुड़े वर्क परमिट, अनियमित कानूनी स्थिति और देश से निकाले जाने का डर उन्हें शोषण के खिलाफ आवाज उठाने से रोक सकता है। रिपोर्ट का कहना है कि कई सरकारें श्रम मानकों को लागू कराने की तुलना में प्रवासन पर निगरानी के लिए ज्यादा संसाधन लगाती हैं। IPES-Food के पैनल विशेषज्ञ एरोल श्वाइज़र ने कहा कि खाद्य व्यवस्था प्रवासी श्रमिकों के बिना चल ही नहीं सकती, फिर भी इन्हीं कामगारों को शोषण, चोट और मौत के सबसे ज्यादा जोखिमों में रखा जाता है। उनके मुताबिक सरकारी प्रवासन और श्रम नीतियां कामगारों को और असुरक्षित बनाती हैं, जबकि नियोक्ताओं की निगरानी उतनी सख्ती से नहीं होती। रिपोर्ट इन स्थितियों की एक वजह खाद्य व्यवस्था में मजदूरी की लागत को लगातार कम रखने के दबाव को मानती है। उसके मुताबिक बड़ी और ताकतवर खाद्य कंपनियां मजदूरी दबाने, ठेके और सब-कॉन्ट्रैक्टिंग के जरिए काम और जोखिम दूसरे स्तरों पर डालने और शेयरधारकों के रिटर्न को प्राथमिकता देने की स्थिति में हैं। दूसरी तरफ कामगार बेहतर वेतन और सुरक्षित काम की शर्तों के लिए संघर्ष करते हैं। IPES-Food के पैनल विशेषज्ञ राज पटेल के मुताबिक भोजन हमारी प्लेट तक पहुंचाने वाले लोग दुनिया के सबसे ज्यादा शोषित कामगारों में हैं। उन्होंने खेतिहर मजदूरों, रसोइयों और डिलीवरी राइडरों का उदाहरण देते हुए कहा कि इन्हें लगातार कम वेतन, असुरक्षित काम, दुर्व्यवहार और अस्थिर रोजगार का सामना करना पड़ता है। पटेल के मुताबिक खाद्य क्षेत्र के कामगार जब संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं, तो बेहतर वेतन, सुरक्षित कार्यस्थल और मजबूत अधिकार हासिल कर सकते हैं।
IPES-Food के सह-अध्यक्ष ओलिवियर डी शूटर ने कहा कि सरकारों ने खाद्य क्षेत्र के एक बहुत बड़े कार्यबल को श्रम कानूनों की सुरक्षा से बाहर रहने दिया है। उनके मुताबिक खाद्य कामगारों को वेतन, सुरक्षा और सामूहिक सौदेबाजी जैसे बुनियादी मानकों से अक्सर बाहर रखा जाता है। जहां अधिकार कागज पर मौजूद हैं, वहां भी निरीक्षण की कमी और अनौपचारिक रोजगार के कारण उनका पालन नहीं हो पाता। उन्होंने श्रम कानूनों की इन खामियों को दूर करने और उनके बेहतर अमल की जरूरत बताई। रिपोर्ट का निष्कर्ष केवल समस्या बताने तक सीमित नहीं है। IPES-Food का कहना है कि खाद्य कामगारों का संगठन और सामूहिक सौदेबाजी बेहतर वेतन, मजबूत सुरक्षा और सुरक्षित कार्यस्थल हासिल करने में मदद कर सकती है। रिपोर्ट सरकारों से मजबूत ट्रेड यूनियन, सामूहिक सौदेबाजी, लागू किए जा सकने वाले श्रम मानक, प्रवासी कामगारों के लिए समान अधिकार और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला में कंपनियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग करती है। खाने की कीमत, खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन पर चर्चा अक्सर फसल, उत्पादन और बाजार तक सीमित रहती है। IPES-Food की यह रिपोर्ट उस तस्वीर में एक और हिस्सा जोड़ती है। दुनिया का भोजन खेत से हमारी प्लेट तक पहुंचाने वाले लोगों की काम की परिस्थितियां भी खाद्य व्यवस्था की मजबूती का हिस्सा हैं। और जैसे-जैसे गर्मी, बाढ़ और दूसरी जलवायु घटनाएं काम की परिस्थितियों को कठिन बना रही हैं, खाद्य सुरक्षा का सवाल उन लोगों की सुरक्षा से भी जुड़ रहा है जो भोजन पैदा करते और हम तक पहुंचाते हैं।

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