इस टीम के लोग पंजाब के मालवा क्षेत्र में कपास की प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना चाहते है। इस पहल को नाम दिया गया ‘नव-त्रिन्जन’। उन्होंने कहा, ‘‘इस पहल के तहत यहां रसायन का इस्तेमाल किए बिना जैविक कपास उगाई जाती है। यहां प्राकृतिक रंगों वाली कपास भी उगाई जाती है। इससे तैयार धागे और कपड़े को रंगने के लिए अलग से रसायन इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ती। आप कल्पना कर सकते हैं कि इससे पर्यावरण की कितनी अधिक मदद हो रही है।’’ कार्यक्रम के दौरान मोदी ने उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के लोगों के बारे में भी बात की जिन्होंने मिलकर ‘हेवल’ नदी को नया जीवन देने का प्रयास किया है। उन्होंने बताया कि कुछ समय पहले ‘हेवल’ नदी में पानी कम होने लगा था और आस-पास के प्राकृतिक जल-स्रोत भी सूख रहे थे।मोदी ने कहा कि ऐसे में स्थानीय प्रशासन और ग्रामीणों ने मिलकर ‘हेवल’ नदी को बचाने का अभियान शुरू किया। उन्होंने कहा, ‘‘इस प्रयास के दौरान बारिश का पानी रोकने के उपाय हुए, जमीन में पानी पहुंचाने के लिए काम हुआ और बड़ी संख्या में पौधे लगाए गए। आज इस प्रयास से ‘हेवल’ नदी को नया जीवनदान मिला है और साथ ही दर्जनों प्राकृतिक जल-स्रोतों के पुनर्जीवन में भी मदद मिली है।’’ प्रधानमंत्री ने अपने रेडियो प्रसारण में यह भी कहा कि उनके लिए ‘मन की बात’ देश के लोगों के प्रयासों को करीब से जानने और उनके योगदान को नमन करने की एक ‘‘तीर्थयात्रा’’ से कम नहीं है।
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने रविवार को अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में देश में दिवाली की तैयारियों के जोर पकड़ने के बीच नागरिकों से स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए गए उत्पादों को खरीदने और ‘वोकल फॉर लोकल’ पहल को मजबूत करने का आग्रह किया। अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय उत्पादों की सफलता पर भी प्रकाश डाला। मोदी ने बताया कि बिहार का ‘मखाना’ और कर्नाटक की ‘अरहर दाल’ को दुनिया भर में नए बाजार मिल रहे हैं जबकि महाराष्ट्र के आदिवासी उत्पादों को ऐसी पैकेजिंग के जरिए पहचान मिल रही है जो आदिवासी कला की समृद्धि को दर्शाती है। उन्होंने कहा, ‘‘खादी की लोकप्रियता बढ़ रही है जिससे उन कारीगरों को मदद मिल रही है जिनके हुनर से हमारी परंपराएं जीवित हैं। आइए स्थानीय कारीगरों के बनाए उत्पादों को चुनकर ‘वोकल फॉर लोकल’ पहल को मजबूत करें।’’ मोदी ने पंजाब में पारंपरिक खेती के तरीकों को फिर से अपनाने के बारे में भी बात की। उन्होंने कहा कि ‘खेती विरासत मिशन’ नामक संगठन ने जैविक खेती और पारंपरिक कृषि के तौर-तरीकों को नया जीवन देना शुरू किया।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें