विशेष आलेख : संकट पानी का नहीं, उसके उचित प्रबंधन का है - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 2 नवंबर 2026

विशेष आलेख : संकट पानी का नहीं, उसके उचित प्रबंधन का है

Water-management
राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में गर्मी का मौसम केवल तापमान बढ़ने का समय नहीं होता, बल्कि यह पानी की उपलब्धता और उसके प्रबंधन की सबसे बड़ी परीक्षा भी होती है। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, गांवों में कुओं, तालाबों और जलाशयों का पानी कम होने लगता है। कई जगह हैंडपंप और नलकूप पर्याप्त पानी नहीं दे पाते। इसका असर केवल लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर नहीं पड़ता, बल्कि पशुपालन और खेती भी इससे प्रभावित होते हैं। राजस्थान के लूणकरणसर जैसे शुष्क क्षेत्रों में पानी की कमी का अर्थ है कि ग्रामीण परिवारों को पीने के पानी से लेकर पशुओं के लिए चारा उगाने तक, हर स्तर पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यहां यह समझना जरूरी है कि राजस्थान में वर्षा का वितरण असमान है। राज्य के पश्चिमी हिस्से में बारिश कम और अनिश्चित होती है। कई बार अच्छी बारिश के बावजूद पानी का बड़ा हिस्सा बहकर निकल जाता है या तेज गर्मी के कारण जल्दी वाष्पित हो जाता है। दूसरी ओर, भूजल पर लगातार बढ़ती निर्भरता ने स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बनाया है।


Water-management
केंद्रीय भूजल बोर्ड के वर्ष 2024 के आकलन के अनुसार, राजस्थान में सालाना भूजल दोहन की दर 148.77 प्रतिशत थी। राज्य की 302 आकलन इकाइयों में से 216 को अत्यधिक दोहन की श्रेणी में रखा गया था। इसका अर्थ है कि जितना भूजल प्राकृतिक रूप से उपलब्ध हो रहा है, उससे कहीं अधिक निकाला जा रहा है।इस दिशा में सबसे जरूरी कदम वर्षा जल का संचयन है। राजस्थान में पारंपरिक रूप से पानी जमा करने के कई तरीके प्रचलित रहे हैं। टांका, जोहड़, नाड़ी, खड़ीन, बावड़ी और कुंड जैसी व्यवस्थाएं स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों और कम वर्षा को ध्यान में रखकर विकसित की गई थीं। इन परंपरागत संरचनाओं को आधुनिक तकनीक के साथ फिर से मजबूत करने की जरूरत है। गांवों में घरों की छतों से बारिश का पानी पाइप के माध्यम से टांकों और भूमिगत टंकियों तक पहुंचाया जा सकता है। पंचायत स्तर पर तालाबों की सफाई, गहरीकरण और उनके आसपास जलग्रहण क्षेत्र का विकास किया जाना चाहिए। खेतों में छोटे जलाशय और फार्म पॉन्ड बनाकर बारिश के पानी को जमा किया जा सकता है। इससे एक ओर भूजल का पुनर्भरण होगा, वहीं दूसरी ओर गर्मियों में पशुओं और खेती के लिए पानी उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। राजस्थान सरकार ने जल संकट से निपटने के लिए मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान 2.0 शुरू किया है। फरवरी 2024 में शुरू की गई इस योजना के तहत अगले चार वर्षों में राज्य के 20 हजार गांवों में पांच लाख जल संग्रहण और संरक्षण संरचनाएं बनाने का लक्ष्य रखा गया है। राज्य सरकार की 2024-25 की बजट घोषणा में इस अभियान के लिए लगभग 11,200 करोड़ रुपये का प्रावधान बताया गया था।


Water-management
पेयजल उपलब्धता के लिए केंद्र सरकार की जल जीवन मिशन योजना भी महत्वपूर्ण है। जुलाई 2026 में प्रकाशित जानकारी के अनुसार राजस्थान के लगभग 1.07 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से करीब 63.64 लाख परिवारों को नल कनेक्शन उपलब्ध कराया गया था। यह कुल ग्रामीण परिवारों का लगभग 59.11 प्रतिशत था। राज्य के सामने शेष परिवारों तक कनेक्शन पहुंचाने के साथ जल स्रोतों को टिकाऊ बनाए रखने की चुनौती भी है। खेती में पानी की खपत कम करना भी जल संकट के स्थायी समाधान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। राजस्थान में बड़ी संख्या में किसान सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भर हैं। पारंपरिक तरीके से खेतों में पानी भरकर सिंचाई करने से काफी पानी व्यर्थ चला जाता है। इसके स्थान पर ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देना चाहिए। राजस्थान सरकार प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत किसानों को ड्रिप और स्प्रिंकलर लगाने के लिए अनुदान दे रही है। राज्य के आर्थिक समीक्षा दस्तावेज 2025-26 के अनुसार सामान्य किसानों को 70 प्रतिशत और अनुसूचित जाति-जनजाति, महिला, छोटे एवं सीमांत किसानों को 75 प्रतिशत तक अनुदान का प्रावधान है। इसके बावजूद छोटे किसानों तक इन तकनीकों की पहुंच बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए पंचायत स्तर पर प्रदर्शन खेत विकसित किए जा सकते हैं, जहां किसान इन प्रणालियों को देखकर और समझ कर अपना सकें।


पानी की कमी से जूझ रहे दूसरे राज्यों और देशों के अनुभव भी राजस्थान के लिए उपयोगी हो सकते हैं। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले का हिवरे बाजार गांव इसका एक अच्छा उदाहरण है। कभी पानी की गंभीर कमी से जूझने वाले इस गांव में ग्रामीणों ने जलग्रहण क्षेत्र का विकास, वर्षा जल संचयन, छोटे बांधों और मिट्टी-पानी संरक्षण के कार्यों को सामुदायिक भागीदारी से आगे बढ़ाया। लगभग 400 मिलीमीटर सालाना बारिश वाले इस गांव ने पांच वर्षों में अपनी जल उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार किया। इस बदलाव में सरकारी योजनाओं और पंचायत के संसाधनों के साथ ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यह उदाहरण बताता है कि कम बारिश वाले क्षेत्रों में भी सही योजना और सामुदायिक प्रयास से पानी की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है। इसी तरह इजरायल ने सीमित जल संसाधनों के बावजूद कृषि क्षेत्र में ड्रिप सिंचाई और शोधित अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग को व्यापक स्तर पर अपनाया है। वहां शहरी क्षेत्रों से निकलने वाले गंदे पानी को शोधित करके खेती में इस्तेमाल किया जाता है। राजस्थान में भी शहरों और कस्बों के सीवेज को उचित तकनीक से साफ करके गैर-खाद्य फसलों, बागवानी और औद्योगिक जरूरतों के लिए इस्तेमाल करने की संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं। इससे भूजल और मीठे पानी पर निर्भरता कम होगी। दरअसल, राजस्थान के गांवों में पानी की समस्या का समाधान केवल नए जल स्रोत बनाने में नहीं, बल्कि उपलब्ध पानी को बचाने, जमा करने और जरूरत के अनुसार इस्तेमाल करने में छिपा है। यदि वर्षा जल संचयन, आधुनिक सिंचाई तकनीक, पारंपरिक जल संरचनाओं के पुनर्जीवन और सामुदायिक भागीदारी को एक साथ आगे बढ़ाया जाए तो स्थिति में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।







Mamju-team-ganv-ki-awaz

मन्जू

लूणकरणसर, राजस्थान

टीम, गाँव की आवाज़

(यह लेखिका के निजी विचार हैं)

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