उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या केवल 105 घटनाओं के सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध हैं और बाकी फुटेज कहां हैं? कांग्रेस नेता ने राम मंदिर ट्रस्ट के तत्कालीन महासचिव चम्पत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव को गवाह बनाए जाने पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि गवाह और दोषी होने में बड़ा अंतर है, लेकिन जिन लोगों के अधीन पूरी व्यवस्था काम कर रही थी, उनकी प्रशासनिक जिम्मेदारी और घटनाओं के समय उनकी भूमिका की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए थी। रमेश ने बीते चार जून को 2.25 लाख रुपये की नकदी मिलने का वीडियो तत्कालीन महासचिव चम्पत राय तक पहुंचने और पांच जून को उन्हें सीसीटीवी फुटेज दिखाए जाने का उल्लेख करते हुए पूछा कि प्राथमिकी 25 जून को क्यों दर्ज की गई। उन्होंने कहा, ‘‘इन 21 दिनों में क्या हुआ? किसने कार्रवाई रोकने या टालने का फैसला किया?’’ रमेश ने 2020 की ऑडिट रिपोर्ट और बाद की ऑडिट रिपोर्ट में दान के रिकॉर्ड तथा वित्तीय नियंत्रण को लेकर उठाई गई आपत्तियों का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक, सीसीटीवी रिकॉर्डिंग की अवधि 45 दिन होने और 180 दिन का बैकअप रखने की सिफारिश लागू नहीं किए जाने पर भी सवाल उठते हैं। उन्होंने सवाल किया कि पहले से चेतावनी मिलने के बावजूद व्यवस्था दुरुस्त क्यों नहीं की गई और क्या किसी वरिष्ठ अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई।
कांग्रेस महासचिव ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने एसआईटी की जांच को पूर्ण बताकर पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की जरूरत को नजरअंदाज किया। उन्होंने कहा कि एसआईटी राज्य सरकार की पुलिस एजेंसी है और ऐसे गंभीर मामले में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए उच्चतम न्यायालय की निगरानी में जांच होनी चाहिए। रमेश ने यह भी कहा कि दो नवंबर को उत्तर प्रदेश सरकार ने उच्चतम न्यायालय में जांच पूरी होने और आरोपपत्र दाखिल किए जाने की जानकारी दी थी तथा शीर्ष अदालत ने याचिकाओं का निस्तारण करते हुए आरोपों के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी और याचिकाकर्ताओं को मजिस्ट्रेट की सहायता करने की अनुमति दी। उन्होंने कहा कि अदालत के इस आदेश को किसी भी पक्ष के लिए क्लीन चिट नहीं माना जा सकता। कांग्रेस नेता ने ट्रस्ट के गठन से अब तक चढ़ावे, नकदी, बैंक खातों, सोने-चांदी, बहुमूल्य वस्तुओं, जमीन और निर्माण व्यय का स्वतंत्र एवं व्यापक फॉरेंसिक ऑडिट कराने तथा ट्रस्ट के गठन से पहले श्रद्धालुओं से एकत्र चंदे का हिसाब सार्वजनिक करने, ऑडिट रिपोर्टों में दर्ज आपत्तियों पर हुई कार्रवाई का ब्योरा देने और वरिष्ठ पदाधिकारियों समेत सभी स्तरों पर प्रशासनिक एवं वित्तीय जवाबदेही तय करने की मांग भी की। रमेश ने ट्रस्ट के पुनर्गठन की मांग करते हुए कहा कि श्रद्धालुओं का चढ़ावा किसी पदाधिकारी या ट्रस्ट की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की अमानत है। उन्होंने कहा, ‘‘आठ लोगों के खिलाफ आरोपपत्र इस अमानत का पूरा हिसाब नहीं है। जवाबदेही तय होने तक यह मामला खत्म नहीं माना जा सकता।’’

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