दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि बाल विवाह मानवाधिकार का उल्लंघन है और उसने एक मामले में नाबालिग लड़की के बालिग होने तक उसे और उसके 40 वर्षीय पति को शारीरिक संबंध स्थापित करने से रोक दिया।
न्यायमूर्ति एके सिकरी की अध्यक्षता वाली पीठ ने अदालत के पिछले फैसलों से हटते हुए कहा कि 17 वर्षीय दुल्हन अपने माता-पिता के साथ रहेगी न कि अपने पति के साथ। पिछले फैसलों में नाबालिग दुल्हन को अपने पति के साथ रहने की इजाजत मिलती रही है।
पीठ ने कहा कि दरअसल बाल विवाह मानवाधिकार का उल्लंघन है और इससे लड़कियों का विकास प्रभावित होता है। अदालत ने एक गैर सरकारी संगठन की याचिका पर यह आदेश दिया। एनजीओ ने यह कहते हुए शादी को खारिज करने की मांग की थी कि 17 वर्षीय चांदनी जबर्दस्ती 40 वर्षीय यशपाल से ब्याह दी गई।
हालांकि पीठ ने इस शादी को खारिज करने से इनकार कर दिया क्योंकि नाबालिगों से जुड़ी शादी की कानूनी वैधता पर वृहत पीठ विचार कर रही है, लेकिन उसने पति को उसके साथ वैवाहिक संबंध रखने से मना कर दिया। पीठ ने कहा कि छोटी उम्र में ब्याह दी जाने वाली महिलाओं के घरेलू हिंसा की चपेट में आने की अधिक संभावना होती है और उसका उन पर गंभीर मनौवैज्ञानिक एवं शारीरिक असर पड़ता है।
न्यायमूर्ति एके सिकरी की अध्यक्षता वाली पीठ ने अदालत के पिछले फैसलों से हटते हुए कहा कि 17 वर्षीय दुल्हन अपने माता-पिता के साथ रहेगी न कि अपने पति के साथ। पिछले फैसलों में नाबालिग दुल्हन को अपने पति के साथ रहने की इजाजत मिलती रही है।
पीठ ने कहा कि दरअसल बाल विवाह मानवाधिकार का उल्लंघन है और इससे लड़कियों का विकास प्रभावित होता है। अदालत ने एक गैर सरकारी संगठन की याचिका पर यह आदेश दिया। एनजीओ ने यह कहते हुए शादी को खारिज करने की मांग की थी कि 17 वर्षीय चांदनी जबर्दस्ती 40 वर्षीय यशपाल से ब्याह दी गई।
हालांकि पीठ ने इस शादी को खारिज करने से इनकार कर दिया क्योंकि नाबालिगों से जुड़ी शादी की कानूनी वैधता पर वृहत पीठ विचार कर रही है, लेकिन उसने पति को उसके साथ वैवाहिक संबंध रखने से मना कर दिया। पीठ ने कहा कि छोटी उम्र में ब्याह दी जाने वाली महिलाओं के घरेलू हिंसा की चपेट में आने की अधिक संभावना होती है और उसका उन पर गंभीर मनौवैज्ञानिक एवं शारीरिक असर पड़ता है।

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