ईश्वर ही प्रेम है ।आत्म प्रेम को त्याग दो ।वह सच्चा प्यार नही है।
अपने हृदय की कोमलता को आत्म प्रेम के रंग से रंगने की कोशिश न
करो। आत्म प्रेम से स्वार्थ बढ्ता है और जो स्वार्थी है वह कभी भी न
तो प्यार कर सकता है और ना ही वह प्यार की भावना रख्र सकता है।
प्यार ईश्वरीय सौगात है। इसकी विशेषता बहना है,जम जाना नही।
जितना जल्दी तुम दूसरो के लिये सोचना शुरु कर दोगे,तुम प्यार करना
सीख जाओगे। ऐसे ही प्रेम की भावना विस्तृत होगी और तुम्हे सम्पूर्ण् सृष्टि
से, और इसीतरह भगवान से जोडे़गी। मानवता से प्रेम ही ईश्वर से प्रेम है।
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