चीन की बढ़ती ताकत से अमेरिका भी चिंतित ! - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

चीन की बढ़ती ताकत से अमेरिका भी चिंतित !

चीन पर शिकंजा कसने के लिए अमेरिका ने भारत सहित उन तमाम देशों को लामबंद करने की पहल तेज कर दी है, जिनके साथ चीन का कोई न कोई विवाद है। अमेरिका भारत को एशिया में अपनी भूमिका और बढ़ाने के लिए बढ़ावा देना चाहता है।

एशिया, खास कर दक्षिण एशिया में चीन की बढ़ती ताकत से अमेरिका भी चिंतित है। इसलिए वह भारत को उसके मुकाबिल खड़ा करने की नीति पर काम कर रहा है। अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा की नवंबर में भारत यात्रा से ऐन पहले एक वरिष्‍ठ अमेरिकी अधिकारी ने कहा है कि वे चाहते हैं कि भारत दक्षिण एशिया से आगे निकल कर व्‍यापार, राजनीति और रक्षा सहयोग के क्षेत्र में ‘सक्रिय भूमिका’ निभाए। भारत को भी पाकिस्‍तान, म्‍यांमार, नेपाल और श्रीलंका के साथ चीन के बढ़ते व्‍यापारिक रिश्‍तों से चिंता है। ऐसे में अमेरिका का यह रुख उसे काफी राहत दे सकता है।

अफ्रीकी देशों के साथ चीन की बढ़ती कारोबारी करीबी पर भी अमेरिका ने भारत को साथ लेकर चलने की नीति बनाई है। भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा अफ्रीकी देशों में अपनी कुछ साझी परियोजनाओं का ऐलान कर सकते हैं। अफगानिस्‍तान में भी कृषि से जुड़ी कुछ परियोजनाओं पर भारत-अमेरिका एक साथ काम करने वाले हैं। अमेरिका और चीन के बीच मुद्रा, व्यापार और सुरक्षा के मसलों को लेकर तनाव रहा है। हाल ही में चीन ने इस आग में घी डालने का काम किया। चीन ने अमेरिका को हो रहे उन खनिजों के निर्यात पर अस्थाई रोक लगा दी, जिनका इस्तेमाल अमेरिका लक्ष्यभेदी मिसाइल बनाने में करता है। इससे खफा अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा कड़ा रवैया अपनाने के पक्ष में हैं।

अमेरिका अब चीन के उग्र तेवरों के मद्देनजर अपने सहयोगी देशों के साथ संयुक्त नीति तैयार कर रहा है। चीन से निपटने की नीति में ओबामा प्रशासन भारत को भी अहम स्‍थान दे रहा है। निश्चित तौर पर इससे भले ही अमेरिका का हित सधेगा, लेकिन भारत को भी चीन से मुकाबला करने में मदद मिलेगी। भारत के साथ चीन का सीमा विवाद है और चीन लगातार भारत विरोधी हरकतें करता रहता है।

चीन अपनी मुद्रा युआन का सही मूल्यांकन नहीं करता है और अमेरिका इसे लेकर उसे कई बार चेतावनी दे चुका है। चीन युआन की कीमतों में डॉलर के मुकाबले फेरबदल करता रहता है, जिससे अमेरिका और दूसरे देशों को व्यापार में काफी नुकसान हो रहा है। हाल ही में दक्षिण कोरिया में बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों की बैठक हुई थी। उसमें अमेरिका ने इस मुद्दे पर सभी देशों का सहयोग मांगा। अमेरिका ने चीन पर तत्काल कुछ पाबंदिया लगाने का प्रस्ताव रखा लेकिन जर्मनी, इटली और रूस ने इससे असहमति व्यक्त की। पिछले दो सालों में चीन और अमेरिका के बीच अविश्वास पैदा हुआ है और इसीलिए विश्व के प्रमुख मुद्दों जैसे मौसम परिवर्तन, वैश्विक अर्थ व्यवस्था को लेकर दोनों के बीच तालमेल नहीं है। दोनों देशों के बीच ताजा विवाद का मुख्य कारण चीन का अमेरिका को खनिजों के निर्यात में कमी करना है। अमेरिका इन खनिजों का इस्तेमाल मिसाइल बनाने में करता है।

अमेरिका चीन को थामने के लिए जापान और दक्षिण कोरिया से संबंध मजबूत बना रहा है। अमेरिका एशिया में लगातार अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन चार महीने में दूसरी बार वियतनाम की यात्रा पर इस सप्ताह जा रही हैं। इस यात्रा में वह पूर्वी एशियाई देशों के सम्मेलन में भी भाग लेंगीं। अगले महीने राष्ट्रपति बराक ओबामा एशिया के चार प्रमुख देशों – भारत, जापान, इंडोनेशिया और दक्षिण कोरिया की यात्रा करेंगे। इन देशों के नेताओं के साथ बातचीत में चीन एक अहम मुद्दा रहने वाला है।

जुलाई में अपनी हनोई यात्रा के दौरान विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने प्रस्ताव रखा कि अमेरिका चीन के दक्षिणी हिस्से की जल सीमा में उसके जिन जिन देशों से विवाद हैं उन्हें सुलझाने में मदद कर सकता है। बाद में खुलासा हुआ कि इस प्रस्ताव के समर्थन में अमेरिका के साथ 12 और देश भी थे। साफ तौर पर अमेरिका चीन को संदेश दे रहा है कि उनके पास एशिया में और भी बेहतर मित्र देश हैं।

जानकार मानते हैं कि घरेलू मोर्चे पर भी अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा को चीन का विरोध जनता का समर्थन जुटाने में मदद कर सकता है। अमेरिका में हो रहे चुनावों में कई उम्मीदवार अपने प्रचार में दावा कर रहे हैं कि अमेरिका में बढ़ती बेरोजगारी के लिए अप्रत्यक्ष रूप से चीन दोषी है। चीन और भारत के बीच अगले कुछ समय में संबंध सुधरने के आसार हैं। भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ से अगले सप्ताह हनोई में मिल रहे हैं। सिंह 11 या 12 नवंबर को दक्षिण कोरिया में चीन के राष्ट्रपति हूं जिंताओ से भी मिलेंगे। इसी बीच चीन के दो प्रमुख नेता- उत्तरी कोरिया और तिब्बत मामलों पर राष्ट्रपति के सलाहकार जुओ योंगकांग और 2012 तक प्रधानमंत्री पद के सशक्त दावेदार लि कैक्वेंग भारत आ रहे हैं। ये प्रतिनिधि विवादास्पद मामलों पर चर्चा करेंगे, जिससे दोनों देशों को काफी लाभ होगा।‘

चीन भारत के साथ सीमा विवाद सुलझाना ही नहीं चाहता है। यदि चीन की यह मंशा होती तो 50 के दशक में सीमा विवाद आसानी से हल हो जाता। चीन को लगता है कि एशिया में चीन के महाशक्ति बनने में भारत सबसे बड़ा रोड़ा है। चीन भारत के बीच संबंध तभी सुधर सकते हैं जब चीन के कब्जे में भारत का जो हिस्सा है उसका कोई हल निकले।‘

'2008 में विश्व में फैली आर्थिक मंदी के बाद चीन अपनी अर्थव्यवस्था को अमेरिका की तुलना में जल्दी ही पटरी पर ले आया। इससे दुनिया में संदेश गया है कि अमेरिका कमजोर हो रहा है और चीन दुनिया की उभरती शक्ति है। अमेरिका की चीन विरोधी प्रतिक्रिया का एक कारण यह तथ्य भी है।'


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