अभिषेक बिहार के नवोदित हैं, पत्रकारिता सीख रहे हैं और इसी क्रम में अनुभवों का समंदर समेटने की कोशिश भी करते हैं. हाल ही में संपन्न एक बैठिकी में पटना के शीर्ष पत्रकार की एक बैठकी में पत्रकारिता की वास्तविकता का हाले बयाँ जो अभिषेक ने दिया उन्ही के शब्दों में......
क्या इस पोस्ट को भी मुझे हटाने को कहा जाएगा?
कल पटना में मीडिया की कई हस्तियों ने मीडिया पर बोला. जिनमें मुकेश कुमार (वरिष्ठ पत्रकार), आनंद प्रधान (आइआइएमसी), मणिकांत ठाकुर (वरिष्ठ पत्रकार, बिहार), परंजय गुहा (वरिष्ठ पत्रकार), अकु श्रीवास्तव(हिंदुस्तान, स्थानीय संपादक) प्रमुख थे. इन लोगों ने खास कर बिहार के हालात पर मीडिया की जिम्मेदारी पर भी बोला.
मेरे पास सारे लोगों के वक्तव्य हैं, हूँ बहु. बिलकुल बेबाक. हां समय की कमी, या कुछ अन्य काम के कारण सारे लोगो की सारी बातो को एक साथ मैं आप तक उपलब्ध नहीं करा पा रहा हूँ. मेरा मकसद सिर्फ ये हैं की इनकी बातों को आप भी जाने, सुने, समझने की कोशिश करें, अगर आप उस समय उन्हें नहीं सुन पाए, तो ये टेक्नोलॉजी का उपयोग करें. खासकर तमाम मीडिया स्टूडेंट उसमें भी जो पत्रकारिता में ज्यादा रूचि रखते हो.
क्या इस पोस्ट को भी मुझे हटाने को कहा जाएगा? इसका मतलब सिर्फ इतना हैं की जब कल मैंने एक पत्रकार जिन्होंने वहां बोला था, एकदम बेबाक, कटु सत्य, कड़वी सच्चाई. उनकी बातचीत को मैंने जस का तस इंटरनेट पर उपलब्ध करा दिया था, पर मुझे कहा गया कि इसे फिलहाल पूरी दुनिया के सामने उस रूप में न लाया जाए, भविष्य के लिए रखा जाये.
आपका नेट अगर धीमी गति का हो, अगर आप वीडियो नहीं देख पा रहे हो तो उन्होंने क्या कहा इसे नीचे पढ़े, हूँ बहु, जस का तस.
...धीरे धीरे ऐसा कहनेवालों की संख्या कम होती जा रही है| ऐसे बोलने वाले लोग हैं भी तो उनकी आवाज़ दबा दी जाती है| आज हम मीडिया की भूमिका और मीडिया के सामने जो चुनौतियां हैं, उनकी चर्चा हम ऐसे समय में कर रहे हैं जब पूरा मीडिया, मीडिया के गटर का ढक्कन खुल गया है और वहाँ से वो तमाम बदबूदार चीज़ें दिख रही हैं जो उसमे अरसे से बह रही थी हमें पता नहीं थी| यह हममें से बहुत कम लोग जानते थे और बहुत कम लोग उसकी चर्चा करते थे. आजकल मजाक में पूछा जा रहा है की आप मीडिया से हैं या राडिया से. मतलब पत्रकारों का विभाजन हो गया है| आप राडिया शैली की पत्रकारिता करते हैं या मीडिया में, मीडिया की भूमिका समझी जाती है, जो उसकी भूमिका निर्धारित की गयी हैं उसके पक्ष में हैं| ये बहुत ही कठिन समय है अगर आप इसे धंधेबाजी के आधार पर तय करना चाहें या उसपर बातचीत करना चाहे की अखबारों के सर्कुलेशन बढ़ सकता हैं, कैसे टेलीविजन की टीआरपी आ सकती हैं, तो व्यवहारिक अर्चनो की बात करके आप शांत हो सकते हैं, लेकिन जब आप मीडिया के चरित्र को खंकालने जायेंगे तो आपको पुरे सिस्टम की बात करनी पड़ेगी. इस पूरी व्यवस्था में मीडिया की भूमिका क्या हैं, किनके हाथो में हैं? कौन चला रहा हैं? उसके उद्देश्य क्या हैं?
दो चीजे बहुत इम्पोर्टेंट, मनुफैक्चरिंग ऑफ कंसेंट, सहमती का निर्माण, मीडिया का जो वर्तमान मीडिया हैं उसका एक बड़ा काम ये हैं, कि वो बाजार के हक में सहमती का निर्माण करे. बाजार की जरुरत क्या हैं उसके हिसाब से खबरों का चयन करे, खबरों को गढे. और खबरों को प्रस्तुत करे, पूरा खेल मीडिया का ये बारीक पदावली में समाया हुआ हैं, और एक दूसरा हैं, प्रोपेगेंडा थियुरी, मीडिया का काम वस्तुतः मशीनरी के तौर पर हैं, उसका इस्तेमाल सरकार भी करती हैं, बाजार भी करती हैं. अब इन पदों के सन्दर्भ में आप मीडिया की परख करने की कोशिश करे, आपको सारी चीजे साफ़ नज़र आएँगी, कि मीडिया का काम हैं, बाजार कि जरूरतों को पूरा करना उसके हिसाब से सहमतियों का निर्माण करना, बाजार अगर किसी चीज को समाज में खपाना चाहता हैं तो उसके लिए भूख पैदा करना, और दूसरा ये की ऐसी चीजों को प्रोपेगेट करना, जिनसे एक जो सत्ता और बाजार का गठजोड हैं, उसको कही से कोई खतरा पैदा ना हो, वो धरल्ले से चलता रहे, तो जब ये दो काम निर्धारित कर दिए हैं, तो आप किसी तीसरी भूमिका की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं. मीडिया को चौथा खम्भा कहा जाता हैं लोकतंत्र का. लेकिन हकीकत ये हैं कि आज सही मायनों में, ना तो चौथा खम्भा हैं न लोकतंत्र हैं. इन दोनों का अभाव हो चूका हैं. बाजार के द्वारा और कही सरकार के द्वारा इसीलिए पूरा मीडिया कही बाजार आश्रित हैं कही सरकार आश्रित हैं, सरकारे पसंद नहीं करती.
माफ कीजियेगा कल सुशील मोदी, जब ये कह रहे थे कि 11 परसेंट की ग्रोथ बिहार टाइम्स ने उसपर शक क्यों जाहिर किया, वे कोई सलाह नहीं दे रहे थे, उसमें एक चेतावनी छिपी थी, एक धमकी छिपी हुई थी, कि जब पूरा मीडिया सरकार को दिए हुए आकड़े पर गुणगान कर रहा हैं, तो आप क्यूं शक पैदा कर रहे हैं, उन्होंने ये नहीं बताया कि पिछले साल ग्रोथ रेट क्या थी, 4.7% पूरा मीडिया पचा गया इसको, और आप कहें कि कुछ चीजों को छोड़ दें, क्या हर्ज हैं? बहुत स्पेस हैं हमारे पास खेलने के लिए. ये सेलेक्टिव चीजे हैं आप लगातार मीडिया में देख रहे होंगे. इस आकड़े को पूरा गायब कर दिया गया हैं मीडिया से, इस पर कोई चर्चा नहीं, क्यों? क्योंकि वो 80 करोड़ बटें थे मीडिया में यहां. उन अस्सी करोड़ के नीचे दबा मीडिया कैसे 4.7% ग्रोथ रेट खड़ा करके 11% के दावे के सामने प्रश्न चिन्ह लगाता?
अजय कुमार जी ने गलती की हैं, अब पता नहीं उन्हें इसकी क्या क्या सजा भुगतनी पड़े अगले पांच साल तक, भुगते. लेकिन जिन्हें पत्रकारिता करनी हैं, वो इसकी परवाह नहीं करते.
रीढ़ की हड्डी रखना भर काफी नहीं हैं, उसका इस्तेमाल भी करना चाहिए, वो दिखनी भी चाहिए, कई बार लोग खुशफहमी में जीते हैं कि उनकी रीढ़ की हड्डी हैं.
रीढ़ की हड्डी का जिक्र करते हैं की कहीं ये लोग न मान ले की उनकी रीढ़ की हड्डी नहीं हैं, लेकिन रीढ़ की हड्डी बहुत टेढ़ा काम हैं, पेड न्यूज़, बहुत चर्चा सुना होगा आपने. कम से कम इस बार के चुनाव में दो बड़े अखबारों ने अपनी आचार संहिता बनाई थी, की हम पेड न्यूज़ का कारोबार नहीं करेंगे, अकु श्रीवास्तव जी का अखबार भी उनमें से एक हैं हिन्दुस्तान. लेकिन बड़े पैमाने पर यहां पेड न्यूज़ का कारोबार हुआ, और खबरे तो यहां तक हैं कि कुछ एक ने जिन्होंने आचारसंहिता जारी की उसके बावजूद पेड न्यूज़ भी किया, वो भी एक परदे का काम किया उसने. एक मुहावरा मैं वापस लौटता हूँ, की जो मूल चरित्र हैं, मीडिया का, उसको पहले हम समझ लें. जिसका धन होता हैं उसी की बात चलती हैं, जिसकी पूंजी लगी होती हैं, वो जैसा चाहता हैं वैसा मीडिया चलता हैं, जो पूंजी होती हैं, वो कोई धर्मशाला चलाने के लिए नहीं होता हैं, वो प्रोफिट कमाने के लिए लगाता हैं, उसका सीधा सा उद्देश्य हैं, मुझे इससे पैसा कमाना हैं, और पैसा जब कमाने की बात आती हैं, तो ये देखता हैं की सरकार से कितना मिलेगा, बाजार से कितना मिलेगा, उसके लिए जो कम्प्रोमाइज करना हैं, करेंगे. तो जब ये इसका आधार ही हैं, पूंजी और पूंजी पर नियंत्रण जिसका हैं वही तय करेगा की मीडिया का चरित्र, चाल चेहरा क्या होगा, तो पत्रकारों की नैतिकता का सवाल उठाना, मुझे लगता हैं, अगर पूरी तरह नहीं तो काफी हद तक बेमानी होगी. नैतिकता कोई हवा से पैदा नहीं होती, आप पत्रकार से अपेक्षा करते हैं कि वो गणेश शंकर विद्यार्थी और वगैरह वगैरह बना रहे. कुछ कोशिश करके बने भी रहते हैं, लेकिन नैतिकता व्यवस्था सापेक्ष होती हैं. 91 में जिस तरह की आर्थिक नीतियां हमारे यहां लागू की गयी, और जिनका, जिनको हमारे व्यापर उद्योग जगत, बहुत तारीफों की पुल बांधता हैं, और जिससे मध्यम वर्ग जिससे बहुत लाभान्वित हुआ हैं, वो भी अपना समर्थन सहयोग देता हैं. ये आज मुक्त बाजार की व्यवस्था के जरिये आया, मुक्त भ्रष्टाचार व्यवस्था, कायम हो गयी. और ये केवल मीडिया में नहीं, हमारी व्यवस्था के हर अंग में हैं, राजनीति में बढ़ा हैं, समाज में बढ़ा हैं, अफसरशाही में बढ़ा हैं, हर अंग में बढ़ा हैं, आप पत्रकार कैसे अछूता रह सकता हैं, अब बातें खुल रही हैं, इसलिए, थोडा थोडा सामने आ रहा हैं, लेकिन ये अचानक नहीं हुआ हैं, पहले से चल रहा था, 91 से बहुत तेजी से, गति मिली.
जैसे जैसे उदारवादी नीतियां अपनाई गयी, वैसे वैसे भ्रष्टाचार के लिए बहुत गुंजाइश बनने लगी. इसमें पत्रकारिता के सारे नियम कानून बदल डाले, एडिटर खत्म हो गया, कहने के लिए एडिटर हैं, ये हम भी जानते हैं, अकु जी भी जानते हैं, की एडिटर की सत्ता, कितनी कमजोड हो गयी हैं, एडिटर के हाथ में कितने काम पावर हैं, खबरों के चयन को लेकर, खबरों को दिखाने के मामलों में, तो अब संपादक बस नाम के लिए हैं, वो कई जगह तो नाम भी बदल दिया गया, संपादक होते ही नहीं, अब सीईओ हो जायेंगे, डाइरेक्टर हो जायेंगे, मैनेजिंग एडिटर हो जायेंगे, पूरी तरह से एक संपादक किसी चैनल में किसी अखबार में, बहुत कम होता हैं, ये एक ट्रेडिशनल या मेन स्ट्रीम मीडिया की स्थिति. हमलोग बहुत सारी, उन चीजों का जिक्र नहीं कर रहा हूँ क्योंकि वक्त भी बहुत नहीं हैं, और भी लोगों को बोलना हैं, टीआरपी हैं ये हैं वो हैं, उसके धंधे हैं, बहुत सारे, हथकंडे हैं, इन सब सारी चीजें मेरे ख्याल से बहुत सारे लोग जानते हैं, उसे दोहराने की जरुरत नहीं हैं. इसका जो दूसरा अल्टरनेटिव मीडिया की बात की, एक तरफ तो टेकनोलोजी की बात हुई दूसरी तरफ अरविन्द जी ने उसके कंटेट, अल्टरनेटिव कंटेट की तरफ हमारा ध्यान खिंचा. मुझे लगता हैं कि अल्टरनेटिव मीडिया को लेकर भी हम बहुत सारी खुशफहमियां पाल रहे हैं, आज ये नया मीडिया हैं, कुछ एक वेबसाईट हैं जो बड़ा काम कर रही हैं, लेकिन कल वही पूंजी जब देंखियेगा की ये बड़ा अस्त्र हैं और इसे हमें अपने कब्जे में रखना हैं, इसे हमें उन दो चीजों के लिए मनुफैक्चरिंग कंसेंट और प्रोपेगेंडा के लिए, इस्तेमाल करना हैं, तो यही सब, इन्ही सब पर उनका भी कब्ज़ा होगा, ये कोई बहुत युग नहीं लगने वाले हैं इसमें, अगले पांच दस पन्द्रह साल में देखिएगा, बल्कि इस तरह की कोशिशे शुरू हो चुकी हैं, बड़े-बड़े आयेंगे समूह बड़ी-बड़ी वेबसाईट लॉन्च करेंगे, तरह तरह के कंटेंट ऐसे देंगे, जो पूरा जो इन्टरनेट का पाठक वर्ग वहां सिमट जाएगा, मीडिया जैसे डाक्यूमेंट्री बनाने वाले मुश्किल में, हाशिए पर हैं, जैसे अच्छी फ़िल्म बनाने वाले हाशिए पर हैं, जैसी अच्छी पत्रिकाएं निकालने वाले हाशिए पर हैं, वैसे ही अच्छी वेबसाईट चलाने वाले भी हाशिए पर होंगे. जब तक पूंजी पर नियंत्रण नहीं बदलेगा, कम्युनिटी रेडियो, कम्युनिटी टीवी, अखबार इस तरह की कोई चीज संभव नहीं हो पाएगी. तब तक मीडिया का जो चरित्र चेहरा आज हम देंख रहे हैं, वही देंखने के लिए हम बाध्य हैं, वही हमारी मजबूरी हैं, हमारी विवशता हैं, और यही हमारा भविष्य हैं.
ये पूरा का पूरा वक्तव्य एक पत्रकार का है, इस वक्तव्य में बहुत कुछ है मगर पत्रकारिता की हकीकत भी. क्या पत्रकारिता सिर्फ व्यवसायियों के लिए कमाने का जरिया मात्र रह गयी है या फिर राडिया पत्रकारिता के पत्रकारों के माध्यम से राष्ट्र के बिचौलियों के लिए कमी के लिए एक सशत्र....
अभिषेक आनंद
अभिषेक अंतरजाल पर सक्रिय रहते हैं,
उनसे संपर्क facebook.com/abhishek.letters
पर किया जा सकता हैं.
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