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मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

अपने लिए जिए तो क्या जिए...

बाल विहार मूक वधिर स्कूल, जमशेदपुर











हमारी बातों को समझने की कोशिश करते हुए बाल विहार के मासूम बच्चे


बाल विहार के बच्चों को लिखकर अपनी बातें बताती हुई सरिता



आज बहुत दिनों के बाद बाल विहार गई थी. दरअसल अमेरिका से आने के बाद गई ही नहीं थी. मूक वधिर के इस स्कूल में जाती तो हूँ उनके साथ समय बिताने और उन्हें खुशियाँ देने पर मुझे जो खुशियाँ मिलती है वह कहीं उनकी खुशियों से अधिक है. उनके साथ कब समय बीत जाता है पता ही नहीं चलता.

इस बार जबसे आई हूँ तबियत पूरी तरह ठीक नहीं है इसलिए मेरा कहीं भी जाना आना कम हो रहा है या यों कह सकती हूँ नहीं के बराबर . आज अचानक बाल विहार से एक बच्चे ने किसी से फ़ोन करवाया तो अपने आप को नहीं रोक पाई और अपनी एक सहेली के साथ वहाँ पहुँच गई.

बच्चों की ख़ुशी देखने लायक थी. उन्हें तो उम्मीद ही नहीं थी हम अचानक पहुँच जाएँगे. हमें देख सभी अपनी अपनी जगह छोड़ हॉल में जो उनकी कक्षा भी है, पहुँच गए. ख़ुशी से कई कई बार नमस्ते करते, देखते देखते कुछ ही पलों में पूरी कक्षा में कुर्सियों को करीने से रख सारे बच्चे अपनी अपनी जगह बैठ गए . ऐसी अनुशासन तो मैंने अच्छे अच्छे स्कूलों में भी नहीं देखी, जो इस बाल विहार के बच्चों में है.

हमने करीब एक डेढ़ घंटे उनके साथ बिताई, पर उनके चहरे की ख़ुशी देख प्रतीत होता था मानो उन्हें दुनिया की सारी खुशियाँ मिल गई हो और उनको खुश देख हमें संतुष्टि. हम जब चलने लगे एक बच्चे ने हाथ पकड़ रुकने को कहा और जल्दी से बोर्ड पर कुछ लिखने लगा, मैं मुड़ी तो बोर्ड पर वह कुछ लिख रहा था. उसने लिखी थी "Kusum mam tommorow". मैं समझ गई , वह पूछ रहा था मैं कल आऊँगी या नहीं. मैंने उसे कहा हाँ आऊंगी. वह समझ गया और सभी ताली बजा बजाकर उछलने लगे. चलते समय सभी हमारी गाड़ी तक आ हाथ हिला हिलाकर फिर से आने का इशारा कर रहे थे.

रास्ते भर मैं सोचती रही भगवान जन्म देते हैं तो उन्हें निरीह बनाकर क्यों भेजते. अपनी बातों को समझाने के लिए ही उन्हें कितनी मेहनत करनी होती है. इतने मासूम बच्चे और अपने मन की सारी बातें सबसे नहीं कर पाते, लिखकर और इशारों से ही समझाना पड़ता है उन्हें .

खैर, आज फिर जाने की तीव्र इच्छा है ............

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