अपने कार्यों को बुद्धिमत्ता पूर्ण तरीके से करो, किसी के
प्रभाव में नहीं; आत्म-अनुशाषित बनो; ईश्वर की संतान
जो उसका अपना ही स्वरूप है, इस दैवीय विरासत में
विश्वास करो; अच्छी संगत में रहो और उन प्रणालियों का
अभ्यास करो जिससे तुम्हें ईश्वर की वास्तविक अनुभूति हो सके|
(श्री परमहंस योगानंद)
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