पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान सोमवार से शुरू हो गया। राज्य के 5.6 करोड़ मतदाता फैसला करेंगे कि 34 वर्ष से सत्ता संभाल रहे वाम मोर्चा की फिर वापसी होगी या शासन की बागडोर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस गठबंधन संभालेगी। मतदान छह चरणों में सम्पन्न होगा।
राज्य के चुनावी माहौल में चर्चा है कि 10 पार्टियों के गठबंधन वाम मोर्चा को इस बार कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा। वाम मोर्चा 1977 में उस वक्त सत्ता में आया था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी द्वारा देश में आपातकाल लागू किए जाने से क्षुब्ध लोगों ने वाम दलों को जबर्दस्त समर्थन दिया था।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा उसके बाद से सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को सबल बनाने की कोशिशों और बड़े पैमाने पर भूमि सुधार के जरिए ग्रामीण समुदाय में अपनी जड़ें जमाता चला गया। 1977 और 2008 के बीच गांवों और छोटे शहरों पर वाम मोर्चा की पकड़ कायम रही।
हाल के वर्षों में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन शुरू कर तृणमूल कांग्रेस ने ग्रामीण और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच अच्छी पैठ बना ली। वर्ष 2008 में हुए पंचायत चुनाव में उसे भारी सफलता मिली। वाम मोर्चा से टक्कर लेने के लिए पार्टी ने कांग्रेस की साझेदारी में एक साल बाद हुए लोकसभा चुनाव में अपनी स्थति मजबूत कर ली। लोकसभा की 42 सीटों में से तृणमूल को 19 और कांग्रेस को छह सीटें हासिल हुई थीं। वाम मोर्चा केवल 15 सीटों पर सिमट गया। सोमवार को राज्य के छह उत्तरी जिलों में विधानसभा की 54 सीटों के लिए मतदान होगा। इस चरण में 364 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। छह जिलों के कुल 97,48,839 मतदाता अपने मताधिकार का उपयोग करेंगे। ये जिले हैं- दार्जीलिंग, जलपाईगुड़ी, कूच विहार, उत्तरी दिनाजपुर, दक्षिणी दिनाजपुर तथा मालदा।
पहले चरण के मतदान में माकपा के 32, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के दो, फॉरवार्ड ब्लॉक के 10, रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट पार्टी (आरएसपी) के नौ, सोशलिस्ट पार्टी के एक, तृणमूल कांग्रेस के 26, कांग्रेस के 27, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के एक तथा भाजपा के 49 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला होना है। राज्य की 294 सीटों की विधानसभा के लिए मतदान 18 से 10 मई के बीच होगा। मतों की गणना एवं परिणामों की घोषणा 13 मई को होगी।

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