छत्तीसगढ़ की एक अदालत ने सामाजिक कार्यकर्ता बिनायक सेन से उनका पासपोर्ट सौंपने को कहा है. जमानत के लिए पासपोर्ट सहित सेन को 50,000 रुपयों की राशि भी देनी पड़ेगी.
अतिरिक्त जिला और सेशंस जज बीपी वर्मा ने आदेश दिए कि सेन को एक निजी मुचलके और 50,000 रुपये की राशि के बदले रिहा किया जाए. साथ ही अदालत ने कहा है कि सेन भारत छोड़ नहीं सकते और मामले के सिलसिले में समन मिलने पर उन्हें उच्च न्यायालय के सामने पेश होना पड़ेगा. अदालत में सुनवाई के दौरान मौजूद सेन की पत्नी ईलीना ने कहा, "हमने बहुत संघर्ष किया है. हम आदिवासियों के लिए काम करते रहेंगे."
इससे पहले सेन के वकील महेंद्र दूबे ने जिला अदालत में सुप्रीम कोर्ट के आदेश जमा किए थे. शुक्रवार को सर्वोच्च अदालत ने फैसला किया था कि सेन को जमानत दे कर रिहा किया जा सकता है. उन पर आरोप है कि उन्होंने नक्सलवादियों की मदद कर भारत के खिलाफ साजिश रचने की कोशिश की है. छत्तीसगढ़ की अदालत ने साजिश के मामले में सेन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी जिसके बाद 61 साल के सेन पिछले साल दिसंबर से छत्तीसगढ़ की जेल में बंद है.
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केवल जमानत की अर्जी पर अपना फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट के जजों ने जमानत के लिए सुनवाई के दौरान कहा था कि सेन के खिलाफ सारे सबूत बेबुनियाद हैं और उनके खिलाफ साजिश के आरोप नहीं लगाए जा सकते. साथ ही जजों ने कहा, माओवादी किताबों के रखने से कोई भी व्यक्ति माओवादी नहीं बन जाता. कैद की सजा के खिलाफ सेन ने छत्तीसगढ़ की अदालत में अपील की है. मामले की सुनवाई अभी बाकी

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to saump de na, problem kya hai
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