साहित्य से उठा छायावाद का ‘साया’ - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 9 अप्रैल 2011

साहित्य से उठा छायावाद का ‘साया’


(प्रख्यात साहित्यकार, कवि जानकी बल्लभ शास्त्री की स्मृति में...)

हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार और वयोवृद्ध कवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री अब हमारे बीच नहीं रहे। बेशक, उनके जाने से काव्य और साहित्य के ऊपर से छायावाद का छाया खत्म हो गया है। 96 वर्षीय शास्त्री का हृदय गति रुकने से 7 अप्रैल की रात मुजफ्फ़रपुर (बिहार) के निराला निकेतन में निधन हो गया। यूं कहें कि शास्त्री के निधन के साथ ही छायावाद साहित्य और कविता की लगभग साढ़े नौ दशक से निरंतर कायम एक अध्याय का अंत हो गया, जिसकी भरपाई इस युग में असंभव सा दिखता है। उनके परिवार में पत्नी छाया देवी और एक गोद ली हुई पुत्री है। बिहार सरकार ने शास्त्री को राजेन्द्र शिखर सम्मान और उत्तर प्रदेश सरकार ने भारत भारती सम्मान दिया था। भारत सरकार की ओर से उन्हें 2010 में पद्मश्री देने की घोषणा की गयी थी परंतु आचार्य ने इसे ठुकरा दिया था। छाया उनकी प्रसिद्ध रचना है। शास्त्री जी ने कई उपन्यास, कहानियां, गद्य पुस्तकें लिखी हैं। इनमें रूप-अरूप, तीर-तरंग, मेघगीत, तमाशा आदि पुस्तकें काफी लोकप्रिय हुईं।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के अनन्य प्रशंसक जानकी बल्लभ शास्त्री जीवनपर्यन्त इस कदर अनकहा निराला बने रहे कि उन्होंने कभी किसी विशिष्ठ जीवन दर्शन का पीछा नहीं किया। उस वेदांत और आध्यात्म का भी नहीं जिसके वह आजीवन प्रवक्ता रहे। शास्त्री के प्रशंसकों में पृथ्वीराज कपूर और राजकपूर प्रमुख थे। मेरा नाम जोकर के बाद बदहाली के दिनों में राजकपूर मुजफ्फ़रपुर में उनके घर निराला निकेतन में रूके थे। छायावाद के अंतिम स्तम्भ माने जाने वाले जानकी बल्लभ ने साहित्य की वर्तमान रूढियों पर प्रहार करते हुए लिखा था-क्यों इतिहास दरबारी-सरकारी नुक्कड भाटों तक के गुण गाता है और अपने युग प्रतीक काव्य पुरूषों को अनायास छोड़ देता है। सात अप्रैल की रात को इस युगपुरूष का मुजफ्फरनगर में देहावसान हो गया, जो हिन्दी साहित्य जगत के लिए की अपूरणीय क्षति है। मन की जागृत और स्वप्न अवस्थाओं से ऊंचे उठकर जिस आध्यात्मिक अंत:स्फूरण की अनुभूति शास्त्रीजी को हुई थी़, उसके अक्षर प्रमाण उनके काव्य में हैं। जीवन की उत्कृष्ट आस्था ने उन्हें बार-बार आध्यात्मिक शिखर से बौद्धिक भूमि पर उतारा़ जहां स्वतंत्र जीवनानुभूति का ऐसा चस्का लगा कि उन्होंने साहित्य के खुलत़े़ और बंद होते त्रिनेत्र पर अपने हाथ रख दिए। शास्त्री को छायावाद का अंतिम स्तम्भ माना जाता है। छाया उनकी प्रसिद्ध रचना है।

शास्त्रीजी हिन्दी और स्थानीय बोली के बड़े पैरोकार थे। भाषा और बोली के बारे में उनका मानना था कि भाषा खासतौर से आम उपयोग में बोलचाल और कठोर संघर्ष से मिलती है, जिसमें संवाद की उत्कट आकांक्षा निहित होती है़। खैर, जैसे-जैसे जानने और समझने का सिलसिला आगे बढ़ा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के प्रति शास्त्रीजी की आत्मीयता बढ़ती गई। निराला के प्रति अभिभूत होने के क्षणों में भी उन्होंने रवीन्द्र नाथ टैगोर की महत्ता को कम नहीं आंका। बेबाकी और सचाई के प्रवक्ता शास्त्री ने लिखा कि किसी कमरे में जहां सब लोग साजिश कर चुपचाप बैठे हों, वहां सचाई का एक शब्द पिस्तौल दागने जैसी आवाज करता है।

1916 में गया जिले के मैग्रा उर्फ मायाग्राम गांव मे एक साधारण ब्राह्मण परिवार में जन्मे आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री वर्ष 1939 में मुजफ्फरपुर संस्कृत महाविद्यालय में संस्कृत शिक्षक के रूप में आये और मुजफ्फरपुर के ही होकर रह गए थे। 5 जनवरी 1953 को संस्कृत महाविद्यालय से अवकाश ग्रहण कर शास्त्री उन्होंने राम दयालु सिंह महाविद्यालय में हिन्दी और संस्कृत विभागाध्यक्ष के रूप में अपना योगदान दिया और 1978 में यहां से अवकाश ग्रहण किया। आचार्य शास्त्री ने 1938 में 'काकली' नामक संस्कृत काव्य संग्रह की रचना कर साहित्य जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। लगभग 90 हिन्दी और संस्कृत में कविता, गीति नाट्य़ महाकाव्य आदि पुस्तकों की रचना कर वे एक मूर्धन्य साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हो गए थे। 1935-1945 के बीच आचार्य शास्त्री ने 55 कहानियां भी लिखीं। इनके साथ ही उन्होंने कई पुस्तकों और पत्रिकाओं का संपादन भी किया। उन्होंने संस्कृत और हिन्दी की दर्जनों पुस्तकों की रचना की थी। इसके लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों से नवाजा गया। बिहार में भागवत झा आजाद के मुख्यमंत्रित्व काल में शास्त्री को बिहार रत्न से सम्मानित किया गया। उस सम्मान समारोह में शास्त्री की कही हुई दो पंक्तियां आज भी लोगों के मानस पटल पर झलकती रहती है। वे हैं-

मैं आया नहीं हूं लाया गया हूं, खिलौने देकर बहलाया गया हूं।

तमाम प्रलोभनों को एक झटके से नकारने की यह अदा उनकी मौलिक अदा थी, इसे उन्होंने बाद के दिनों में भी पद्मश्री ठुकराकर साबित किया। हिंदी साहित्य में छायावाद के अवसान के बाद जो रिक्तता आई थी उसकी भरपाई करनेवालों में हरिवंश राय बच्चन, नरेंद्र शर्मा, रामधारी सिंह दिनकर और गोपाल सिंह नेपाली आदि के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण नाम जानकी बल्लभ शास्त्री का भी था। शास्त्री का जाना इस मायने में हिंदी की एक गौरवशाली काव्य परंपरा के आखिरी स्तंभ का ढहना भी है। वैसे तो शास्त्री के साहित्यिक अवदान पर बहुत चर्चा हो चुकी है, पर अब भी बहुत बाकी है। एक गद्यकार के रूप में उनके उपन्यास 'कालिदास' को और उनके संस्मरण 'एक असाहित्यिक की डायरी' को हिन्दी साहित्य का इतिहास सम्मान और श्रद्धा के साथ रेखांकित करता रहेगा। हिंदी समाज अगर आज हिंदी को साठ से ज्यादा उत्कृष्ट कृतियों का तोहफा देनेवाले जानकी बल्लभ शास्त्री का अनुग्रह जानता और मानता है तो यह सर्वथा स्वाभाविक है। मगर शास्त्री को अमरता प्रदान करते हैं उनके गीत जो सामान्य जन की जुबान पर लोकगीतों की तरह काबिज देखे जा सकते हैं। मेघगीत की इन पंक्तियों के जरिए उनके संपूर्ण काव्य-व्यक्तित्व की अनुगूंज हिंदी पट्टी में पार्श्व संगीत की तरह लगातार बजती रही है और अनंत काल तक बजती रहेगी-

'ऊपर ऊपर पी जाते हैं जो पीने वाले हैं, कहते ऐसे ही जीते हैं जो जीनेवाले हैं'

उनकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार है-

कहाँ मिले स्वर्गीय सुमन, मेरी दुनिया मिटटी की,
विहस बहन क्यों तुझे सताऊं,कसक बताकर जी की।
बस आखिरी विदा लेता हूं, आह यही इतना कह,
मुझसा भाई हो न किसी का, तुझ सी बहन सभी की!!




मैं मगन मझधार में हूं , तुम कहां हो!
दीप की लौ अभी ऊंची, अभी नीची
पवन की घन वेदना , रुक आंख मीची
अन्धकार अवंध, हो हल्का की गहरा
मुक्त कारागार में हूं , तुम कहां हो
मैं मगन मझधार में हूं, तुम कहां हो !

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संपर्क:-

---राजीव रंजन तिवारी---

16, नगरपालिका फ्लैट
(जैन इंटर कालेज के सामने)
मीनाक्षी चौक, मुजफ्फरनगर
उत्तर प्रदेश. फोन- 09837099509

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