सुप्रीम कोर्ट ने हेड कांस्टेबल प्रकाश कदम तथा अन्य पुलिसकर्मियों की अपील को खारिज करते हुए कहा है कि फर्जी मुठभेड कुछ नहीं है बल्कि खाकी वर्दी वालों द्वारा की गई क्रुर हत्याएं है। फर्जी मुठभेड़ में लिप्त पुलिसकर्मियों को मौत की सजा दी जानी चाहिए। ऐसे मामलों को दुर्लभतम में भी दुर्लभ मानना चाहिए क्योंकि यह और कुछ नहीं बल्कि क्रूरतापूर्वक की गई हत्या है।
शीर्ष कोर्ट ने पुलिसकर्मियों की ढेरों याचिकाएं खारिज कर दीं। जस्टिस मरकडेय काटजू तथा ज्ञानसुधा मिश्रा ने एक फैसले में कहा कि फर्जी मुठभेड़ और कुछ नहीं बल्कि खाकी वर्दी वालों द्वारा की गईं क्रूर हत्याएं हैं। जस्टिस काटजू ने कहा, यदि साधारण लोग कोई जुर्म करते हैं तो उन्हें सामान्य सजा दी जाए। लेकिन यदि जुर्म पुलिसकर्मी करते हैं तो उन्हें सख्त सजा देनी चाहिए क्योंकि ऐसा कृत्य उनकी ड्यूटी के विपरीत है।
बेंच ने कहा कि यदि किसी पुलिसकर्मी को किसी वरिष्ठ द्वारा फर्जी मुठभेड़ का आदेश दिया जाता है तो उसका कर्तव्य है कि वह ऐसे अवैध आदेश को मानने से इनकार कर दे। अन्यथा उसे हत्या का आरोपी माना जाएगा। दोषी पाए जाने पर उसे मौत की सजा मिलेगी। बेंच ने कहा, हमारा मानना है कि जहां भी पुलिसकर्मियों के खिलाफ फर्जी मुठभेड़ का मामला साबित हो जाए, उसे दुर्लभतम में भी दुर्लभ मानते हुए दोषियों को मौत की सजा दी जाए।–
शीर्ष कोर्ट ने यह फैसला हेड कांस्टेबल प्रकाश कदम तथा अन्य पुलिसकर्मियों की अपील खारिज करते हुए दिया। इन्होंने बांबे हाईकोर्ट द्वारा अपनी जमानत याचिका खारिज करने के फैसले को शीर्ष कोर्ट में चुनौती दी थी। अभियोजन का कहना था कि कथित एनकाउंटर विशेषज्ञ प्रदीप शर्मा तथा कुछ अन्य पुलिसकर्मियों ने रियल इस्टेट ऑपरेटर रामनारायण गुप्ता का 11 नवंबर 2006 को अपहरण किया था। फिर गुप्ता को फर्जी मुठभेड़ में मार दिया था। यह आरोप लगाया गया कि आरोपी पुलिसकर्मियों ने इस कृत्य को गुप्ता के सहयोगी जनार्दन भांगे के कहने पर अंजाम दिया था।
शीर्ष कोर्ट ने कहा, यदि पुलिसकर्मी तीसरे व्यक्ति के कहने पर किसी व्यक्ति को मारने लगे तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वे मुकदमा चलते समय खुद को बचाने के लिए अहम गवाहों या पीड़ित के रिश्तेदारों को निपटा सकते हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें