संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने तालिबान और अल-क़ायदा केख़िलाफ़ जारी प्रतिबंधों को अलग-अलग कर दोनोंचरमपंथी संगठनों के ख़िलाफ़ भिन्न तरह के प्रतिबंधलगाने का फ़ैसला किया है.
अबतक दोनों संगठनों पर संयुक्त राष्ट्र ने एक ही तरह काप्रतिबंध लगाया हुआ था क्योंकि इन दोनों को एक मानाजाता था.
संयुक्त राष्ट्र की नई कारगुज़ारी का उद्देश्य अफ़गानिस्तानकी हामिद करज़ई सरकार की तालिबान के साथ सामंजस्य बढ़ाने की नीति को बढ़ावा देना है.
संयु्क्त राष्ट्र का कहना है कि वो तालिबान को ये संदेश भेजना चाहते हैं कि राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल होने का यहसही समय है.
अधिकारियों का कहना है कि इससे ये भी साफ़ हो जाता है कि सुरक्षा परिषद अफ़गानिस्तान में जारी समझौते कीकोशिश का समर्थन करता है.
बातचीत में शामिल होने के लिए तालिबान प्रतिबंधों को ख़त्म किए जाने की माँग करते रहे हैं.
'पारदर्शी और निष्पक्ष'
दूसरी तरफ़ अल-क़ायदा के ख़िलाफ़ लगाए गए प्रतिबंधों को भी और ज़्यादा निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने की कोशिशकी जा रही है.
कई यूरोपीय देशों की अदालतों ने इस मामले पर कड़े सवाल उठाए थे.
संयुक्त राष्ट्र में मौजूद बीबीसी संवाददाता बार्बरा पलेट का कहना है कि राजनयिकों ने नए प्रस्ताव को निष्पक्षता कोबढ़ावा देनेवाला बताते हुए कहा है कि ये क़दम इस सत्य को स्वीकरने की एक प्रक्रिया है कि दोनों संगठनों का उद्देश्यअलग-अलग है - जहाँ अल-क़ायदा दुनिय़ाँ भर में जिहाद करना चाहता है वहीं तालिबान का विद्रोह अफ़गानिस्तानके संदर्भ में है.
हालांकि ख़ुद पर लगे प्रतिबंध को पूरी तरह से समाप्त करवाने के लिए तालिबान को हिंसा का त्याग कर संविधान कोस्वीकार करना होगा. साथ ही इस बात का यक़ीन दिलाना होगा कि उसने अल-क़ायदा से संबंधों को समाप्त कर दियाहै.
नए प्रस्ताव में प्रतिबंधों को लागू करने की प्रक्रिया को स्पष्ट तौर पर बयान किया गया है. अब इस मामले मेंअफ़गानिस्तान की सरकार भी अपनी राय दे सकती है.
अबतक दोनों संगठनों पर संयुक्त राष्ट्र ने एक ही तरह काप्रतिबंध लगाया हुआ था क्योंकि इन दोनों को एक मानाजाता था.
संयुक्त राष्ट्र की नई कारगुज़ारी का उद्देश्य अफ़गानिस्तानकी हामिद करज़ई सरकार की तालिबान के साथ सामंजस्य बढ़ाने की नीति को बढ़ावा देना है.
संयु्क्त राष्ट्र का कहना है कि वो तालिबान को ये संदेश भेजना चाहते हैं कि राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल होने का यहसही समय है.
अधिकारियों का कहना है कि इससे ये भी साफ़ हो जाता है कि सुरक्षा परिषद अफ़गानिस्तान में जारी समझौते कीकोशिश का समर्थन करता है.
बातचीत में शामिल होने के लिए तालिबान प्रतिबंधों को ख़त्म किए जाने की माँग करते रहे हैं.
'पारदर्शी और निष्पक्ष'
दूसरी तरफ़ अल-क़ायदा के ख़िलाफ़ लगाए गए प्रतिबंधों को भी और ज़्यादा निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने की कोशिशकी जा रही है.
कई यूरोपीय देशों की अदालतों ने इस मामले पर कड़े सवाल उठाए थे.
संयुक्त राष्ट्र में मौजूद बीबीसी संवाददाता बार्बरा पलेट का कहना है कि राजनयिकों ने नए प्रस्ताव को निष्पक्षता कोबढ़ावा देनेवाला बताते हुए कहा है कि ये क़दम इस सत्य को स्वीकरने की एक प्रक्रिया है कि दोनों संगठनों का उद्देश्यअलग-अलग है - जहाँ अल-क़ायदा दुनिय़ाँ भर में जिहाद करना चाहता है वहीं तालिबान का विद्रोह अफ़गानिस्तानके संदर्भ में है.
हालांकि ख़ुद पर लगे प्रतिबंध को पूरी तरह से समाप्त करवाने के लिए तालिबान को हिंसा का त्याग कर संविधान कोस्वीकार करना होगा. साथ ही इस बात का यक़ीन दिलाना होगा कि उसने अल-क़ायदा से संबंधों को समाप्त कर दियाहै.
नए प्रस्ताव में प्रतिबंधों को लागू करने की प्रक्रिया को स्पष्ट तौर पर बयान किया गया है. अब इस मामले मेंअफ़गानिस्तान की सरकार भी अपनी राय दे सकती है.
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