भ्रष्टाचार के खिलाफ बहुप्रतीक्षित तथा विवादास्पद लोकपाल विधेयक गुरुवार को लोकसभा में पेश किया जाएगा. अरसे से अटका पड़ा लोकपाल बिल अब हक़ीक़त बनने की राह पर है. सरकार आज लोकसभा में लोकपाल बिल पेश करेगी. हालांकि कारगर लोकपाल के लिए लड़ाई लड़ने वाले अन्ना हज़ारे और उनकी टीम के लिए ये ज़ोर का झटका है, क्योंकि प्रधानमंत्री को प्रस्तावित लोकपाल के दायरे से बाहर रखा गया है.
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने लोकपाल विधेयक के सरकारी मसौदे को 28 जुलाई को स्वीकृति दे दी थी, जिसमें प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा गया है. इसमें कहा गया है कि प्रधानमंत्री से जुड़े मामलों की जांच उनके पद छोड़ने के बाद ही की जा सकेगी. अन्ना हजारे के नेतृत्व में सामाजिक कार्यकर्ता इसका विरोध कर रहे हैं. वे प्रधानमंत्री को भी इसके दायरे में लाने की मांग कर रहे हैं. अन्ना हजारे ने इसे लेकर मंगलवार को सांसदों को खुला पत्र लिखा और उनसे समर्थन की मांग की.
भारतीय जनता पार्टी ने भी कहा है कि वह प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में रखने के पक्ष में है. पार्टी नेता वेंकैया नायडू ने कहा कि इसके अन्य पहलुओं के बारे में भाजपा अपनी राय सदन में इस पर चर्चा के दौरान रखेगी. देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक स्वतंत्र संस्था (लोकपाल) बने जहां पर सभी मामलों की सुनवाई निष्पक्ष रूप से हो सके. सरकार के लोकपाल बिल में प्रधानमंत्री को उनके कार्यकाल के दौरान इसके दायरे से बाहर रखा गया है.
प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ने के बाद वह इसके दायरे में आ जाएंगे. लोकपाल विधेयक में एक कमेटी का गठन होगा. जिसके अध्यक्ष वर्तमान या रिटायर जज होंगे. इसमें आठ सदस्य होंगे जिसमें से चार अनुभव प्राप्त कानून को जानने वाले लोग होंगे. लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने के लिए एक संयुक्त समिति बनाई गई थी. इसमें सरकार के मंत्री और नागरिक प्रतिनिधि शामिल थे. दोनों पक्षों के बीच लंबे विचार-विमर्श के बाद भी सहमति नहीं बन पाई थी.
प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने को लेकर दोनों पक्षों में मतभेद उभरकर आ गए हैं.
नागरिक समाज के प्रतिनिधि अन्ना हज़ारे ने लोकपाल विधेयक को कैबिनेट की मंज़ूरी मिलने के बाद ही विधेयक की कड़ी आलोचना की थी. वह सरकार के इस विधेयक से खुश नहीं हैं. इसके खिलाफ वह 16 अगस्त से आमरण अनशन करने की घोषणा कर चुके हैं.

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