देश के दो बड़े प्रतीकों (संसद और लाल किला) पर हमला करने वाले आतंकवादियों को फांसी दिए जाने का रास्ता बुधवार को साफ हो गया। 2001 में संसद पर हुए हमले की साजिश रचने वाले अफजल गुरु की दया याचिका गृह मंत्रालय ने राष्ट्रपति को भेज दी है। ऐसी खबर आ रही है कि मंत्रालय ने कहा है कि अफजल को फांसी दिए जाने पर उसे कोई ऐतराज नहीं है। दूसरी ओर, सर्वोच्च न्यायालय ने लाल किले पर हमला करने के दोषी लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादी मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक की फांसी की सजा बुधवार को बरकरार रखी।
अफजल गुरु ने राष्ट्रपति के पास मौत की सज़ा से बचने के लिए दया याचिका दायर की थी। 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने अफजल की सज़ा पर मुहर लगा दी थी। तब से वह तिहाड़ जेल में बंद है। भाजपा उसे जल्द से जल्द फांसी दिए जाने की मांग करती रही है। अब इस मामले में जल्द कार्रवाई के आसार हैं। गृह मंत्रालय की सिफारिश मिलने के बाद उम्मीद है कि राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जल्दी ही अफजल की दया याचिका निपटा देंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने 4 अगस्त, 2005 को अफजल गुरु की फांसी की सजा बरकरार रखने का फैसला सुनाया था। 3 अक्तूबर, 2006 को उसकी ओर से दया याचिका दायर की गई। गृह मंत्री चिदंबरम पहले कहते रहे हैं कि उनका मंत्रालय सिलसिलेवार ढंग से दया याचिकाओं पर सिफारिशें करता है। गृह मंत्रालय के रिकॉर्ड के मुताबिक अफजल गुरु की पत्नी द्वारा दायर दया याचिका का नंबर 18वां था। कुछ महीने पहले विकीलीक्स के हवाले से यह खुलासा हुआ था कि सोनिया गांधी की पार्टी (कांग्रेस) के नेता और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री गुलाम नबी आज़ाद ने अफजल गुरु को माफ किए जाने की सिफारिश की थी। कलाम और सोनिया के बीच अफजल गुरु के मामले में मतभेद की एक बड़ी वजह यही थी।
अफजल गुरु को संसद पर हमले के मामले में दोषी ठहराते हुए 18 दिसंबर 2002 को दिल्ली की एक स्थानीय अदालत ने फांसी की सजा दी थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने 29 अक्तूबर 2003 को दिए अपने फैसले में इस सजा को बरकरार रखा। इसके बाद अफजल गुरु ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की जो 4 अगस्त 2005 को नामंजूर हो गई। सेशन जज ने तिहाड़ जेल में उसकी फांसी की तारीख (20 अक्तूबर 2006)भी तय कर दी थी। मगर, उसके बाद उसने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर कर दी जहां से इसे गृह मंत्रालय के पास भेजा गया। मंत्रालय ने अभी तक याचिका अपने पास ही रखी है।
13 दिसंबर, 2001 को संसद सत्र के दौरान ही पांच बंदूकधारियों ने संसद परिसर पर हमला बोल दिया था। इस हमले में पांचों आतंकवादी ढेर हो गए थे। आतंकवादियों से मोर्चा लेते हुए सात सुरक्षाकर्मी और संसद के कर्मचारी भी शहीद हो गए थे। जबकि 18 लोग ज़ख्मी हुए थे। शहीद सुरक्षा कर्मियों और संसद के कर्मचारियों के परिवार वाले अफजल गुरु की फांसी में देरी के खिलाफ कई बार प्रदर्शन कर चुके हैं। मोहम्मद अफजल गुरु को इस हमले का मास्टर माइंड बताया जाता है। हमले के पीछे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठनों का हाथ बताया जाता है। उस समय देश में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार थी।
गृह मंत्रालय ने अंतत: संसद पर हमले के लिए फांसी की सजा पाए अफजल गुरु की दया याचिका को अपनी राय के साथ राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील के पास भेज दी है, मगर राष्ट्रपति के लिए इस पर फैसला लेने की कोई समय-सीमा नहीं होती है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने भास्कर को बताया कि हालांकि अपने दो पूर्ववर्ती राष्ट्रपति के आर नारायणन और एपीजे अब्दुल कलाम के विपरीत प्रतिभा पाटील ने दया याचिकाओं के निपटारे में कुछ तेजी दिखाई है, लेकिन कानून उनसे किसी समय-सीमा के तहत फैसले लेने की उम्मीद नहीं करता। राष्ट्रपति के पास सभी लंबित मामलों में अफजल गुरु की याचिका राजनीतिक रूप से सबसे संवेदनशील है। इसके पहले देवेन्द्र पाल सिंह भुल्लर की दया याचिका खारिज करने के राष्ट्रपति पाटिल के फैसले से पंजाब का सियासी माहौल गरमाया हुआ है और कई राजनीतिक तथा सामाजिक समूहों ने फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है।
भुल्लर को 1991 में पंजाब में एसएसपी सुमेध सिंह सैनी पर आतंकी हमले और फिर 1993 में तत्कालीन युवक कांग्रेस अध्यक्ष मनिन्दर सिंह बिट्टा पर आतंकी हमले, जिसमें 12 लोगों की जान गई थी, के लिए फांसी की सजा सुनाई गई है। सूत्रों के मुताबिक, राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने जब पदभार ग्रहण किया तो 29 दया याचिकाएं उनके फैसले का बाट जोह रही थीं। वे 12 दया याचिकाओं पर फैसला ले चुकी हैं। इनमें 10 मामलों में फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया जबकि पंजाब के भुल्लर और गुवाहाटी के महेन्द्रनाथ दास की याचिकाएं खारिज की जा चुकी हैं। भुल्लर और दास की दया याचिकाएं मई के अंत में खारिज हुईं। इस तरह 2004 के बाद पहली दफा किसी राष्ट्रपति ने कोई दया याचिका खारिज की। 2004 में तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने धनंजय चटर्जी की दया याचिका खारिज की थी।

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