उत्तर बिहार के सुपौल, मधेपुरा और सहरसा ज़िलों में बाहर से प्रवेश का एकमात्र मुख्य सड़क मार्ग साल भर से पंगु पड़ा है. इसका कारण बना है राष्ट्रीय राजमार्ग 107 का वह क्षतिग्रस्त बीपी मंडल सेतु, जिसे ज़्यादातर लोग 'डुमरी पुल' के नाम से जानते हैं. जले पर नमक छिड़कने जैसा एक वैकल्पिक पुल 19 करोड़ की लागत से पिछले ही महीने बनाया तो गया लेकिन मात्र 19 दिन ही चालू रहकर 20वें दिन बंद हो गया.
कोसी और बागमती नदियों की संयुक्त धारा के ऊपर लगभग एक किलोमीटर लंबे डुमरी पुल के दक्षिणी छोर वाले तीन पाए अब से ठीक एक साल पहले थोड़ा धंस गए थे. तब से इस पुल पर साइकिल और मोटर साइकिल को छोड़ बाक़ी सभी वाहनों का आवागमन रुका हुआ है. कोसी प्रमंडल के तीनों ज़िलों में लगभग साठ लाख की आबादी इससे बुरी तरह प्रभावित है. चूँकि इस पर कोई उग्र जनविरोध नहीं उभरा है इसलिए सरकारी सुस्ती बनी हुई है. इस बार बरसात शुरू होने से पहले वहाँ क्षेत्रीय नाविकों ने 58 नौकाओं को जोड़कर और उस पर बांस बिछाकर जो लचका पुल बनाया था, उसके ज़रिये पांच महीनों तक वाहनों का आवागमन संभव हो सका. वे नाविक नदी पार करने वाले निजी वाहन से तीन सौ रूपए वसूलते थे, जबकि सरकारी वाहनों को मुफ़्त में नदी पार करने की सुविधा मिली हुई थी. यही नौका-पुल संचालक स्थानीय प्रशासन पर शोषण का आरोप लगा रहे हैं. इनका कहना है कि वायदे के मुताबिक़ भुगतान नहीं किए जाने से इनकी रोज़ी-रोटी पर चोट पहुँची.
अब हालत ये है कि वहाँ ना तो लचका पुल है और ना ही बिहार राज्य पुल निर्माण निगम की ओर से बनाए गए 'शीट-पाइल' पुल का विकल्प काम आया. आयरन-स्टील की चादर और खम्भों से बने इस पुल पर 17 करोड़ रूपए और इसके पहुँच पथ पर दो करोड़ यानी कुल 19 करोड़ रूपए निगम ने ख़र्च किए, लेकिन यह पुल सिर्फ़ 19 दिनों में ही ठप पड़ गया. सरकारी तौर पर बताया गया कि नदी का बहाव तेज हो जाने से पुल के पाए के नींचे मिट्टी की पकड़ ढीली हो गयी और पुल को बंद करना पड़ा. लोगों का आरोप है कि जैसे-तैसे खड़ा कर दिए गये इस पुल के कमज़ोर पाये की बुनियाद में ही भ्रष्टाचार के कीड़े लग गए होंगे.
अब राज्य के पथ निर्माण मंत्री नंद किशोर यादव कहते हैं, ''इस डुमरी पुल की समस्या का स्थायी समाधान अगले दो-तीन वर्षों में भी तभी हो सकेगा, जब केंद्र सरकार इस बाबत राज्य सरकार के दो-दो निर्माण प्रस्तावों में से किसी एक को मंज़ूरी देगी.'' राज्य के पुल निर्माण निगम ने वैकल्पिक व्यवस्था के तहत जो मात्र 19 दिनों तक टिक पाने वाला पुल बनाया, उसके निर्माण के समय राज्य के पथ निर्माण मंत्री ने पुल के पूरी तरह कारगर होने का दावा किया था. सवाल उठ रहे हैं कि इस बाबत सारी ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार पर थोपने वाली राज्य सरकार को क्या सहरसा, मधेपुरा और सुपौल ज़िलों में रहने वालों के दुख-दर्द का अहसास है?
कोसी प्रमंडल के तहत आने वाले इन तीनों ज़िलों को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ने वाली जीवन रेखा जैसी एकमात्र सड़क के इस सबसे बड़े पुल का एक साल से बंद रहना पूरे कोसी अंचल के जन-जीवन पर आघात जैसा पीड़ादायक है. इस पुल के बंद रहने से उपभोक्त-सामग्रियों की आपूर्ति करने वाले वाहनों को पूर्णिया और मुरलीगंज होते हुए लगभग सौ किलोमीटर का अतिरिक्त चक्कर लगाकर मधेपुरा, सुपौल और सहरसा पहुंचना पड़ता है. लिहाजा परिवहन का ख़र्च बढ़ने से इन इलाक़ों में चीज़ों की क़ीमतें और भी ऊंची हो गई हैं. अब ये भी ख़बर आ रही है कि मुरलीगंज वाली सड़क इतनी जर्जर हो चुकी है कि उस पर आवागमन कभी भी रुक जा सकता है. हालात इतने गंभीर होते हुए भी उस क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की इस पर ख़ामोशी या उदासीनता देख-समझ रहा कोई आम आदमी चुनाव से पहले उनका क्या बिगाड़ सकता है?

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