HMT चावल आज सभी बडे घरों में शौक के साथ बनवाया जाता है और बडी रूचि से खाया जाता है। और इसी HMT की नई से नई किस्मों का निर्माण करने वाले दादाजी खोब्रागडे, फ़ोर्ब्स की सूची में अपनी जगह बना चुके है। लेकिन जानकर आश्चर्य होता है कि आज यह परिक्रमा करनेवाले दादाजी भूमिहीन हैं। एक पत्रिका ने हाल ही में देश के सात सबसे शक्तिशाली ग्रामीण भारतीय उदयमियों की सूची प्रकाशित की जो ‘Inventions are changing lives’ इस वाक्य से प्रेरित थी| उस फोबर्स की सूची में एक नाम था चंद्रपुर के किसान दादाजी खोब्रागडे| आज इनको हम किसान नहीं कह सकते क्योंकि ये भूमिहिन है इनके पास खेती के लिए जमीन ही नहीं हैं इनको धान की एक अलग किस्म की प्रजाति विकसित करने की वजह से इस सूची में स्थान मिला इसकों HMT नाम दिया गया जो पारंपरिक किस्म के धान से 80प्रतिशत प्रतिशत अधिक उपज देता है।चंद्रपूर जिले के नागभीड तहसील के नांदेड़ (फकीर) नामक गांव मे दादाजी आज फकिरी का जीवन गुजर रहें है। आज उनके द्वारा अविष्कारित प्रजाति द्वारा देश में लाखों हेक्टर खेती की जाती है लेकिन इनके पास एक इंच भी खेती शेष नहीं है। आज दादाजी के घर में एक रैक पुरस्कार से भरा है, लेकिन वह पुरस्कार क्या दादाजी को एक दिन का खाना दे सकता है क्या? यह सवाल सोचनीय है।
दादाजी को अपनी तीन एकड़ जमीन बेचनी पड़ी क्योंकि उनके बेटे के इलाज के लिए पैसे नहीं थे। दादाजी खोब्रागडे पूर्णत: निरक्षर तो नहीं कहे जायेंगे वह तीसरी कक्षा तक पढे है। बचपन से ही खेती में नए-नए प्रयोगों को दादाजी करते थे, अल्पभूधारक किसान होने के कारण और पूंजी की कमी के कारण बडे संशोधन तो वह नहीं कर सके लेकिन फिर भी संशोधन की होड़ में उन्होंने चावल की नई किस्म का प्रजनन शुरू किया कई अथक परिश्रम और परिक्षण के सालों बाद पारंपारिक चावल के बदले एक नई प्रजाती जो HMT के नाम से पहचान में आ गयी उसका अविष्कार दादाजी ने किया HMT नाम के पीछे की कहानी भी मजेदार है दादाजी ने जब इस प्रजाति को विकसित किया तब इनके एक मित्र जो अपने कलाई पर HMT की घड़ी पहनते थे उन्होंने इस नाम का सुझाव दादाजी को दिया और उन्होंने भी यह स्वीकार कर लिया सन 1989 में संशोधित HMT के अविष्कार ने किसानों को मानों नव संजीवनी दे दी| इस किस्म के उपज इतनी अद्भुत थी कि उसकी विविधता की वजह से इसकी मांग उस समय आसमान छू रही थी।
अनेक संघर्षों के बाद भी दादाजी खोब्रागडे ने अपना संशोधन कार्य शुरू रखा दादाजी खोब्रागडे ने पंजाबराव देशमुख कृषि विद्यापीठ पर यह आरोप भी एक बार लगाया था कि वह इस प्रजाति को PKV नाम से बेचते है। दादाजी खोब्रागडे को आज तक कई पुरस्कार मिले जिसमें प्रमुखता से राष्ट्रपति पूरस्कार, राज्यसरकार का कृषिभूषण पुरस्कार, राष्ट्रीय अभिनव फाऊंडेशन द्वारा कृषिमित्र पुरस्कार आदि सहित कई पूरस्कार मिले। मीडिया ने भी दादाजी का जमकर प्रचार-प्रसार किया| कई स्टोरिया, आलेख, खबरे प्रसारित और प्रकाशित की गई| लेकिन प्रसिध्दि और पुरस्कार के बावजूद भी खोब्रागडे की वित्तिय स्थिति बहुत खराब है। वह अपनी पत्नी, बेटा, बहू और पोतों के साथ आज गरीबी का जीवन जी रहे है।
दादाजी खोब्रागडे को जिला प्रशासन द्वारा पर दस एकड़ की जमीन देने के लिए कहा गया था सन 2008 में इसका आवेदन भी अग्रेषित हुआ लेकिन दादाजी कहते है आज तक इसके बारे में कुछ भी निर्णय नहीं हुआ है। तहसील कृषि अधिकारी कहते है कि 'कुछ प्रक्रियात्मक कारणों की वजह से उनका जमीन आवंटन रोका गया है जल्द ही तहसीलदार से चर्चा कर उसको आवंटित किया जायेगा' खोब्रागडे अभी भी उम्मीद लगाये बैठे हैं|
सरकार द्वारा कृषिभूषण पूरस्कार में दादाजी को स्वर्णपदक मिला लेकिन पता चला की वह चांदी का बना हुआ है प्रकृति की मार, कमजोर सरकार और कई समस्या ओं के बाद भी दादाजी आज भी संशोधन के कार्य में लगे हुए हैं। आज HMT चावल बाजार में 3200 से 3500 रूपये प्रति क्विंटल बेचा जाता है लेकिन यहाँ दादाजी के घर में कभी-कभी खाने में चावल नहीं होता वाकई यह कितनी विरोधाभास की स्थिति नजर आती है।
निलेश झालटे
स्वतंत्र पत्रकार
09822721292
nileshzalte11@gmail.com
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