हमेशा से सामाजिक मुद्दों पर आधारित फिल्में बनाने वाले डायरेक्टर प्रकाश झा ने इस बार 'आरक्षण' का मुद्दा उठाया है। 'आरक्षण' डा. प्रभाकर आनंद (अमिताभ बच्चन) की कहानी कहती है जो भारत के सर्वश्रेष्ठ कॉलेजों में से एक को 30 वर्षों से अपने आदर्शवादी सिद्धांतों और नियमों से चला रहे हैं।
आरक्षण के कानून पर उनकी टिप्पणी उन्हें मुसीबत में डाल देती है। यहां तक कि उन्हें बेघर भी होना पड़ता है। दीपिक कुमार (सैफ अली खान) अपने आनंद सर के लिए कुछ भी करने को तैयार है। क्योंकि वह प्रभाकर आनंद की बेटी पूर्वी (दीपिका पादुकोण) से प्यार करता है।
आरक्षण का मुद्दा इनकी लव लाइफ को भी प्रभावित करता है। कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है आपको डा. प्रभाकर आनंद के आदर्शवादी सिद्धांतों, निर्णय व आरक्षण पर उनके दृष्टिकोण का पता चलता है। जिसके माध्यम से ही वह अपना खोया गौरव और सम्मान वापस पाते हैं।
'आरक्षण' ने रिजर्वेशन जैसे विवादास्पद और संवेदनशील मुद्दे को उठाया तो है लेकिन इसका उद्देश्य किसी भी स्थायी समाधान देने का नहीं है। हालांकि यह डिस्कसन और इंटरप्रिटेशन के लिए एक प्लेटफॉर्म जरूर खोलती है। आदर्शवादी प्रिंसिपल डॉ.प्रभाकर आनंद के रोल में अमिताभ बच्चन ने जबरदस्त एक्टिंग की है। वह मेरिट में तो विश्वास करते हैं साथ ही समाज की निचली जातियों के योग्य छात्रों को भरपूर मौका देने से नहीं हिचकिचाते। सैफ ने काफी अच्छी एक्टिंग की है और सपोर्टिंग लीड में दीपिका का काम भी अच्छा है। निगेटिव किरदार को मनोज बाजपाई ने इतनी बखूबी निभाया है कि आपको वह जीवंत लगने लगता है। कुल मिलकर देखा जाए तो सभी किरदारों को इतनी मजबूती से पेश किया है कि यह आपको सोचने पर मजबूर कर देते हैं और दिल को छू जाते हैं।
प्रकाश झा का निर्देशन काफी सधा हुआ है हालांकि फिल्म 'आरक्षण' जैसे गंभीर मुद्दे की और ध्यान आकर्षित करती है प्रकाश झा ने सामाजिक - राजनैतिक से भरपूर विषय में ड्रामा भी डाल दिया है क्लाइमेक्स काफी अच्छा है। संगीत शंकर-एहसान-लॉय की तिकड़ी ने दिया है साथ ही खास बात यह है कि सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र ने पहली बार किसी हिन्दी फिल्म के लिए अपनी आवाज दी है।

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