अन्ना ने बड़ा आदोलन छेड़ने की धमकी दी. - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 16 मार्च 2012

अन्ना ने बड़ा आदोलन छेड़ने की धमकी दी.


मजबूत लोकपाल विधेयक के लिए बड़ा आदोलन छेड़ने की धमकी देते हुए गाधीवादी समाज सेवक अन्ना हजारे ने शुक्रवार को कहा कि अगर सरकार भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए कड़ा कानून नहीं बनाती तो उसे जाना होगा।  अन्ना ने कहा कि वह वर्ष 2014 में होने वाले अगले लोकसभा चुनावों तक मजबूत लोकपाल विधेयक के लिए आदोलन करेंगे और अगर तब तक कानून नहीं बनाया जाता तो वह चुनावों की घोषणा के तत्काल बाद रामलीला मैदान में धरने पर बैठ जाएंगे। 

 अन्ना ने कहा, उन्हें (सरकार को) यह कानून लाना होगा या फिर उन्हें जाना होगा। हम बड़ा आदोलन आयोजित करेंगे। यह दिल मागे नो मोर करप्शन सत्र में उन्होंने कहा कि अगर लोकपाल विधेयक संसद में पारित हो गया होता तो संप्रग सरकार के आधे से अधिक मंत्री जेल में होते। अन्ना ने कहा कि वर्तमान कानून इतना मजबूत नहीं है कि भ्रष्टाचार करने वाले को जेल भेजा जा सके। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार इसलिए कानून नहीं ला रही है क्योंकि उसे लगता है कि वर्तमान परिदृश्य में यह काम नहीं कर सकता।

74 वर्षीय गाधीवादी ने कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत विभिन्न मुद्दों पर सूचना मिलती है लेकिन इसके पास लोगों को जेल भेजने का अधिकार नहीं है जिसकी वजह से भ्रष्टाचार विरोधी एक कारगर कानून की जरूरत को बल मिलता है। अन्ना ने कहा, आरटीआई के तहत हमें भ्रष्टाचार के बारे में जानकारी मिलती है। कई दस्तावेज बाहर आए हैं। हमें आदर्श सोसायटी घोटाले और सुरेश कलमाड़ी के घोटाले के बारे में पता चला। लेकिन आरटीआई अधिनियम लोगों को जेल नहीं भेज सकता। इसके लिए हमें मजबूत लोकपाल की जरूरत है।

मुंबई में अन्ना ने जो आदोलन किया था उसका अधिक प्रभाव न पड़ने के बारे में पूछे गए एक सवाल पर समाज सेवक ने आरोप लगाया कि कुछ तत्व उनकी टीम में मतभेद पैदा करने और आदोलन को कमजोर करने का काम कर रहे थे। उन्होंने कहा, मेरे आदोलन के दौरान धूप से बचने के लिए कुछ लोग छाया में भी बैठे थे। अखबारों में तस्वीरें भी छपी हैं। उन्हें देखिए। बड़ी संख्या में लोग थे। यह कहना सही नहीं है कि लोग कम थे। टीम अन्ना की सदस्य किरण बेदी पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। इस बारे में गाधीवादी समाज सेवक ने कहा कि उन्होंने अपने लिए या अपने परिवार के लिए यात्रा भत्ता बढ़ा-चढ़ा कर नहीं बताया। उन्होंने कहा, जो कुछ उन्होंने किया, उसमें कुछ भी गलत नहीं है। उन्होंने यह समाज के भले के लिए किया।

संप्रग सरकार में मौजूद अच्छे लोगों का नाम पूछने पर उन्होंने कहा कि वह लोगों के नाम नहीं लेंगे क्योंकि इससे उन लोगों के लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी और जिनका नाम वह नहीं लेंगे उन्हें अच्छा नहीं लगेगा। साथ ही अन्ना हजारे ने यह भी कहा, कि वे राहुल को नहीं मनमोहन सिंह को युवा मानते हैं। मनमोहन सिंह मस्तिष्क से युवा है, इसलिए वह युवा हैं। वह [राहुल गाधी] युवा नहीं हैं। गाधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि राहुल गाधी को सिर्फ उम्र कम होने की वजह से युवा नहीं माना जा सकता।

1 टिप्पणी:

डॉ. मत्स्येन्द्र प्रभाकर ने कहा…

‘पेशेवर और बाजारू साथियों’ के घेरे में रहकर अन्नाजी ने वर्षों के संघर्ष और साधना से अर्जित दृढ़ता व शक्ति तथा मीडिया एवम आधुनिक सञ्चार माध्यमों के द्वारा बनाये गये अपने गुब्बारे की हवा स्वयं निकाल दी है. इसमें रहते हुए उन्हें अब कोई खास कामयाबी मिलने वाली नहीं है, उन्हें पहले देश और उसके जीवन-दर्शन को समझना होगा, राष्ट्र के भीतर ‘महाराष्ट्र’ के एक सीमित भाग की भांति अपना ‘विशाल देश भारत’ नहीं है. आन्दोलन आवेग से नहीं, सम्वेदना के संवेग से खड़े होते हैं. उनके पीछे चलने वालों में आवेग तथा साथियों में सम्वेदना का अस्वाभाविक और कारोबारी रुझान है जो किसी ‘अप्रकट’ को दुर्घटित होने से बचाने का प्रयत्न करते अधिक प्रतीत होते हैं. उद्देश्यविहीन नयी पीढ़ी अपनों की कमाई और समर्थन के बलबूते कुछ समय तक नारेबाजी तो कर सकती है, लेकिन उसमें लम्बे समय तक उसे झेलने की सामर्थ्य नहीं है. अन्नाजी की अपनी कमजोरी यह है की उनमें जिद और हठ तो है परन्तु ‘सत्याग्रही की दृढ़ता’ नहीं. देश के भाव-वैविध्य को जानने-समझने योग्य भाषा का न होना दूसरी बड़ी बाधा है. और फिर देश की समस्याओं का अध्ययन तो उनके वर्तमान किसी भी साथी में नहीं है, सब एक खास तरह की समस्या से ‘ग्रस्त’ हैं, ऐसे साथियों के रहते कोई उम्मीद मुझे तो दिखायी नहीं देती, यही कारण है कि डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने उनके साथियों की ‘जुण्टा’ और उनकी गतिविधियों को नक्सलियों के जैसा माना है. तरीका और शब्दों का प्रयोग गलत हो सकता है पर विचार को एकदम से खारिज नहीं किया जा सकता. देश की मुख्य समस्या भ्रष्टाचार नहीं, वह तत्व (स्वार्थ) है जो भ्रष्टाचार को पैदा और पोषित करता है. कितने लोग हैं जो स्वार्थ से मुक्त होने और इसके बाद भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई के लिये तैयार हैं?
प्रधानमंत्री को घेरे में लेगा लोकपाल, लेखपाल को कौन देखेगा, गाँव के प्रधान, प्राइमरी स्कूल के हेड मास्टर, ट्रेनों में आरक्षण से लेकर माल-परिवहन और तहसीलों-निचली अदालतों में ‘न्यायिक जगत के सभी वर्ग’ की ‘अघोषित गिरोहबन्दी’ के चलते रोज-ब-रोज होते अनैतिक कृत्य व लाखों-लाख के भ्रष्टाचार को कोई कैसे रोकेगा, काम तो सभी को और यथासम्भव शीघ्रातिशीघ्र करना/करवाना है ?