भाजपा के जनरल अगर संगठन के दावेदारों को हालिया विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी बनाते तो भाजपा को 12 सीटों पर विजयी मिलती और 31 का यह आंकड़ा 43 तक जा पहुंचता। यह कहना है राजनैतिक विश्लेषकों का। उनका कहना है कि खण्डूडी के अडियल रवैये के चलते भाजपा सत्ता के करीब आते-आते रह गई।
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि बद्रीनाथ सीट से यदि केदार सिंह फोनिया, कर्णप्रयाग से अनिल नौटियाल, थराली से जी.एल. शाह, टिहरी से ज्योति गैरोला, धर्मपुर से विनोद चमोली, हल्द्वानी से रेनु अधिकारी, नैनीताल से हेमा आर्या, यमुनोत्री से मनवीर चौहान, राजपुर से खजान दास, कोटद्वार से शेलैन्द्र रावत और पौड़ी से बृजमोहन कोटवाल को यदि टिकट दिया जाता तो ये सभी सीटें भाजपा की झोली में आ जाती। इतने में अधिकांश सीटों पर भाजपा के बागी प्रत्याशियों के रूप में से सब चुनाव लड़ चुके हैं और बहुत ही कम मतों से इनकी हार हुई थी। इतना ही नहीं कई सीटों पर भाजपा को हराने में इनका बहुत बड़ा योगदान रहा है। राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि जनरल के अडियल रवैये के चलते भाजपा संगठन को भी कई बार अपने निर्णय बदलने पड़े। इतना ही नहीं हालिया चुनाव में प्रत्याशी चयन के दौरान जनरल ने कई स्थानों पर जिताऊ नेताओं की जगह हल्के प्रत्याशियों को खड़ा करवाया। इससे कांग्रेस को बढ़त मिली है। इतना ही नहीं प्रत्याशी चयन के दौरान जनरल ने जहां पूर्व मुख्यमंत्री डा. निशंक के समर्थक प्रत्याशियों को एक किनारे से हटाकर उनके स्थान पर कमजोर प्रत्याशियों को खड़ा किया, यह भी भाजपा की हार का एक महत्वपूर्ण कारण है।
कर्णप्रयाग सीट पर रविन्द्र पुजारी जनरल की खास पसंद के रूप में चुनाव लड़े थे, लेकिन वह कांग्रेस के अनुसुया प्रसाद मैखूरी और निर्दलीय सुरेन्द्र सिंह नेगी के बीच में फंस गए। ठीक इसी तरह की स्थिति कई अन्य सीटों पर भी हुई। बद्रीनाथ सीट पर भाजपा प्रत्याशी केदार सिंह फोनिया और कांग्रेस के राजेन्द्र भण्डारी के बीच फंस गए, जबकि थराली क्षेत्र से जी.एल. शाह ने भाजपा का गणित बिगाड़ डाला। ठीक इसी तरह की स्थिति कई अन्य सीटों पर भी हुई जिसमें भाजपा के प्रत्याशियों को बागी भाजपा के प्रत्याशियों ने हरा डाला। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है यदि खण्डूडी संगठन और पूर्व मुख्यमंत्री निशंक के समर्थकों की सूची में फेरबदल न करते तो भाजपा आज सत्ता में होती।
(राजेन्द्र जोशी)

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