खंडूरी कभी नहीं बन पाए चुनाव जिताऊ नेता - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 11 मार्च 2012

खंडूरी कभी नहीं बन पाए चुनाव जिताऊ नेता


आखिर ‘‘जनरल‘‘ नहीं तोड़ पाए हारने का ‘‘मिथक‘‘....

उत्तराखंड में हालिया विधानसभा चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। जहाँ एक ओर राज्य का मुख्यमंत्री ही चुनाव हार गया वहीं दो महीने पहले तक राज्य की सबसे लोकप्रिय बताई जा रही सरकार के पांच कैबिनेट मंत्री भी अपनी कुर्सी नहीं बचा पाए। लेकिन सबसे रोचक रहा ‘ज़रूरी मुख्यमंत्री‘ का हारना। जनरल खंडूरी अपनी ऐतिहासिक हार को नहीं टाल पाए और साथ ही नहीं टाल पाए उस मिथक को जो उनके राजनैतिक जीवन में साये की तरह उनके पीछे चलता आ रहा है। इस ‘ज़रूरी मुख्यमंत्री‘ के बारे में प्रचलित मिथक है की खंडूरी कभी भी चुनाव जिताऊ नेता साबित नहीं हुए। चाहे चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा गया हो या फिर उन्होंने किसी और को चुनाव लड़ाया हो और नतीजे सामने आने के बाद ये मिथक हकीकत में बदल गया।

वर्षों से राज्य की गढ़वाल लोकसभा सीट पर दबदबा रखने वाले जनरल खंडूरी अपने ही शहर पौड़ी में नगरपालिका की सीट तक नहीं जीता पाए थे। इस चुनाव में मातबर सिंह नेगी को पार्टी की तरफ से नगर पालिका अध्यक्ष का उम्मीदवार बनाया गया था। केंद्रीय मंत्री रहते हुए जनरल खंडूरी खुद अपने उम्मीदवार के लिए घर-घर वोट मांगने गए, लेकिन भाजपा उम्मीदवार की ज़मानत तक ज़ब्त हो गयी। इस चुनाव की रोचक बात ये रही की खुद जनरल खंडूरी के वार्ड से भाजपा का पार्षद उम्मीदवार तक चुनाव हार गया था।

2007 के विधानसभा चुनावों में जब भाजपा बहुमत के करीब पहुंची, तब भी जनरल खंडूरी को एक सियासी झटका लगा। पार्टी के स्टार प्रचारक होने के बावजूद वे अपने ही शहर पौड़ी की सीट नहीं बचा पाए। इस सीट से खंडूरी के खासमखास और राजनितिक गलियारों में ‘दत्तक पुत्र‘ कहे जाने वाले तीरथ सिंह रावत चुनाव मैदान में थे, जिनको निर्दलीय उम्मीदवार यशपाल बेनाम ने करारी शिकस्त दी। 2007 में मुख्यमंत्री चुने जाने पर उनको चुनाव लड़ना था। लेकिन इसे जनरल की ‘सियासी कमजोरी‘ कहें या कुछ और, उनको अपनी पार्टी के किसी विधायक ने सीट नहीं दी। तब एक और जनरल ही काम आया और सियासी जोड-तोड़ में माहिर मने जाने वाले डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने कांग्रेस सरकार में काबिना मंत्री रहे लेफ्टिनेंट जनरल टी पी एस रावत को भाजपा में शामिल करवा कर धूमाकोट विधानसभा सीट जनरल के लिए खाली करवाई। इसके एवज में जनरल खंडूरी ने अपनी परंपरागत गढ़वाल संसदीय सीट जनरल रावत की झोली में डाल दी। 

गढ़वाल संसदीय सीट पर उपचुनाव हुए, टी पी एस रावत ने कॉँग्रेस के उम्मीदवार सतपाल महाराज को मामूली वोटों से हराया। किन्तु इस बार भी जनरल का जादू नहीं चला। चुनाव तो जीते मगर जनरल खंडूरी के गृह नगर पौड़ी से टी पी एस रावत काफी पीछे रहे। 2009 में जब लोकसभा चुनाव हुए तो जनरल खंडूरी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव लड़ा गया। इस चुनाव में टी पी एस रावत भाजपा के उम्मीदवार थे। राजनीतिक रूप से जनरल इस अग्निपरीक्षा में भी असफल रहे। इन चुनावों में पार्टी का उत्तराखंड से सफाया हो गया और राज्य की पाँचों लोकसभा सीटें कांग्रेस की झोली में चली गयी। 15 वीं लोकसभा में पहली बार उत्तराखंड से भाजपा का कोई नामलेवा नहीं रहा। इस चुनाव में भी जनरल खंडूरी अपने घर पौड़ी की सीट को नहीं बचा पाए। इसका नतीजा ये हुआ कि जनरल के राजनीतिक कौशल पर भाजपा आलाकमान को भी शक होने लगा। आलाकमान का ये शक खंडूरी को कुर्सी से हटाने के फैसले के बाद यकीन में बदल गया।

2012 विधानसभा चुनावों से पहले भी राजनीतिक गलियारों में (स्वयं भाजपा कार्यकर्ताओं में भी) ये चर्चा जोर पकड़ने लगी है कि जिस जनरल के नेतृत्व में पार्टी अपने घर की नगरपालिका सीट तक नहीं जीत पाई, वो जनरल कैसे भाजपा को दोबारा सत्ता में लाने का दम रखते हैं? यहाँ भी जनरल का मिथक उनका पीछा कर रहा था। जनरल की काबिलियत पर खड़े सवालों को दरकिनार करते हुए पार्टी ने यह चुनाव न सिर्फ जनरल के नेतृत्व में लड़ा बल्कि ‘खंडूरी है जरुरी‘ का नारा देकर उन्हें फ्रंट में खड़ा कर दिया। खंडूरी ने भी अपने नेतृत्व में राज्य में 40 सीटें जीतने का दावा किया। किन्तु उनका चुनाव जिताऊ न होने का ‘मिथक‘ उनके दावों पर भारी पड़ गया। इस चुनाव में भाजपा 28 सीटों पर सिमट कर रह जाती किन्तु भला हो उन निर्दलियों का जिन्होंने भाजपा को तीन सीटें जित्वा दी। चौबट्टाखाल सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार यशपाल बेनाम ने कॉँग्रेस का गणित बिगड़ कर भाजपा को जितने मौका दिया। वहीँ लैन्सीडोन सीट पर रक्षा मोर्चा जबकि यम्केस्वर सीट पर कॉँग्रेस के बागी उम्मीदवार ने भाजपा की झोली में जीत डाल दी। ऐसे में सवाल ये उठता है की बार-बार खंडूरी के नेतृत्व में चुनाव हारने के बावजूद भाजपा ने जनरल को ‘जरूरी‘ क्यों बताया? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। लेकिन भाजपा को मिले सबक के बाद साफ़ है की शायद ही पार्टी भविष्य में जनरल के नेतृत्वा में चुनाव लड़ने का जोखिम मोल ले।


 (राजेन्द्र जोशी)

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