दूसरों के मत्थे न मढ़ें अपनी कमजोरी - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 18 मार्च 2012

दूसरों के मत्थे न मढ़ें अपनी कमजोरी


खुद का सही-सही मूल्यांकन करें

सफलता पाना हर आदमी का लक्ष्य है। इसके लिए लोग सारे जतन करते रहने में जिन्दगी खपा देते हैं। सफलता पाने के लिए महत्त्वाकांक्षी होना कोई खराब बात नहीं लेकिन उच्चांकाक्षा और स्वेच्छाचारिता ठीक नहीं। आत्मानुशासन और मानवीय मर्यादाओं की परिधि में रहकर किए जाने वाले ऐसे सारे प्रयास कालान्तर में समुचित फल प्रदान करते ही हैं। लेकिन आजकल ज्यादातर लोग बिना मेहनत किए जितना जल्दी हो सके, सफलता के शिखरों पर अपना कब्जा जमा लेना चाहते हैं। इसके लिए लोग वह सब कुछ कर देने को उतावले रहते हैं जो करना किसी भी व्यक्ति के लिए शोभाजनक नहीं कहा जा सकता।

अच्छा काम हो जाने पर इसे लोग अपने हुनर का कमाल बताते हैं। उस समय वह भगवान को भी भूल जाते हैं। कुछ भी बुरा हो जाने पर ईश्वर को तो कोसते ही हैं, इसके साथ ही उन लोगों को भी कोसना नहीं भूलते जिनका उनकी असफलता के पीछे कोई हाथ नहीं होता, न ही उन्हें कुछ पता होता है। लेकिन भ्रम और आशंकाओं के मकड़जाल में बुरी तरह उलझे हुए लोगों के लिए मकड़िया परिधि से बाहर निकल पाना बड़ा ही मुश्किल काम है। कूए के इन मेढ़कों और कबूतरों के लिए पूरी दुनिया उनके कूओं के आस-पास ही केन्द्रित रहती है। प्रतिभाएं तो तलाश लेती हैं आगे बढ़ने की धाराएं और उप धाराएं। लेकिन उन बेचारों का क्या, जिन्होंने अपने लिए गढ़ रखी है छोटी सी फ्रेम। इस संकीर्णता से वे उबरना भी चाहें तो नहीं उबर सकते।

इनके आस-पास भी ऐसे ही लोगों का घेरा रहता है जो उनकी फ्रेम की परिक्रमा करते हुए इनका झूठा जयगान करते रहते हैं। फिर अंधेरे कूओं में तो जयगान कुछ ज्यादा ही गूंजता है। जमाने भर को ये लोग अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं और मानते हैं कि वे ही हैं जो सर्वाधिक बुद्धिशील, चिंतक और भाग्य विधाता हैं। इन्हें नहीं पता कि ये लोग जहाँ हैं वहीं ठहरे हुए गन्दे पानी की तरह सडान्ध मार रहे हैं और जिन लोगों के बारे में वे नकारात्मक सोचते और टिप्पणियां करते रहे हैं वे लोग कितनी ऊँचाइयों को पाते जा रहे हैं। मिथ्या जयगान सुनने के आदी ये लोग कभी अंधे कूओं की दीवारों का चक्कर काटते हैं तो कभी कुछ-कुछ समय में मुण्डेर पर आकर झाँकने लगते हैं।

पुण्य क्षेत्र कहे जाने वाले अपने इलाकों में भी ऐसे अनगिनत मेढ़क और कबूतर हैं जिन्होंने संकीर्णताओं के अंधे कूओं में डेरा जमा रखा है। इनसे बाहर निकल कर जमाने की तरोताजा हवा, रोशनी और ताजगी को देखने की कोशिश भी इनके लिए बेमानी है। ये बाहर निकलना चाहें तब भी नहीं निकल पाते क्योंकि मुण्डेर पर बैठे जयगान करते हुए इनके चेले इन्हें अपने कूए को ही दुनिया मनवाने का भरम हमेशा बनाए रखते हैं। नकारात्मक लोगों का अपना कोई व्यक्तित्व नहीं होता, न इनमें खुद को बुलंद करने की कुव्वत होती है और न कोई हुनर। एकाध ब्लेड, चाकू-छुरी और कलम-दवात क्या मिल जाती है, जमाने भर को नसीहत देने लगते हैं। भीड़ का नेतृत्व करने के मोह में ये लोग यह तक भूल जाते हैं कि वे क्या हैं और कहाँ जा रहे हैं। इनके लिए कहीं कोई वर्जना नहीें होती। ये कुछ भी कह सकते हैं, कर सकते हैं

---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

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