उत्तराखण्ड में सीएम पद को लेकर केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत की सोनिया गांधी को दी गई राजनैतिक चुनौती रावत के राजनैतिक जीवन पर भारी पड़ सकती है। सीएम पद पर सोनिया गांधी ने सांसद विजय बहुगुणा को उत्तराखण्ड के सातवें मुख्यमंत्री के रूप में पेश करने के बाद हरीश रावत सोनिया के इस फैसले को मानने से साफ मना कर डाला वही नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत ने भी हरीश के समर्थन में सोनिया गांधी के फैसले को चुनौती दे डाली। रावत के साथ अन्य विधायको के साथ सांसद प्रदीप टम्टा ने भी इस फैसले का खुलकर विरोध किया लेकिन राजनैतिक विश्लेषको का मानना है कि हरीश रावत को सोनियां गांधी के फैसले का विरोध नही करना चाहिए था इस विरोध के बाद वह सोनिया गांधी के सीधे निशाने पर आ गए है।
वहीं बहुगुणा को विधानसभा के भीतर विश्वास मत हासिल करने से राकने के रणनीति तय होनी शुरू हो गई है लेकिन हरीश रावत के इस फैसले में कितना दम है यह तो आने वाले दिनो में साफ हो जाएगा। माना जा रहा है कि हरीश रावत खेमा उत्तराखण्ड क्रान्ति दल का दामन थामकर भाजपा से तालमेल कर उत्तराखण्ड में नई सरकार का गठन कर सकते हैं लेकिन इन बातो में कितना दम है इसकी तस्वीर एक दो दिन में साफ हो जाएगी। उत्तराखण्ड के इतिहास में यह पहली बार है जब 70 विधानसभाओ के राज्य में मुख्यमंत्री पद को लेकर कांग्रेस के भीतर इस तरह की चुनौती हाईकमान को दी गई है। इससे पूर्व आज तक कांग्रेस हाईकमान के साथ साथ भाजपा हाईकमान को भी इस तरह की चुनौती उत्तराखण्ड में नही मिली है लेकिन इस विरोध के बाद कांग्रेस के भीतर कई खेमो में बंटी गुटबाजी भी पूरी तरह उजागर हो गई है। विजय बहुगुणा को उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनाने में प्रदेश प्रभारी चौधरी वीरेन्द्र ािसंह, केन्द्रीय मंत्री गुलाम नवी आजाद, अहमद पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। माना जा रहा है कि सीएम पद को लेकर विधायको में से किसी एक पर फैसला लगभग तय हो गया था लेकिन इन तीनो नेताओं की रणनीति के तहत सोनिया दरबार में विजय बहुगुणा के नाम को आगे कर सोनिया गांधी से इस फैसले को अमलीजामा पहनाया गया।
राजनैतिक विश्लेषक उत्तराखण्ड में हुए सीएम के फैसले के बाद यह मानकर चल रहे हैं कि अगर हरीश रावत ने अपने बगी तेवर पीछे खींच भी लिए तो इसके बाद भी उनका राजनैतिक जीवन सोनिया गांधी के निशाने पर बना रहेगा। उनका मानना है कि सोनिया गांधी के फैसले के खिलाफ आज तक किसी ने बोलने की हिमाकत नही की है और जिसने भी सोनिया के खिलाफ बगावत का बिगुल बजाया है उसका राजनैतिक जीवन वनवास की ओर भेज दिया गया है। उत्तराखण्ड में इस राजनैतिक ड्रामे के बाद 5 साल तक सरकार को चला पाना बेहद कठिन डगर के रूप में सामने आ गया है। अगर हरीश रावत ख्ेामा भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने में कामयाब हो पाता है तो यह हरीश रावत के लिए लड़ी गई लड़ाई का लाभाकारी फैसला होगा। वैसे इसकी सम्भावनाएं बेहद कम नजर आ रही हैं क्योकि कांग्रेस के दबाव के चलते हरीश रावत ने अपने बगी तेवर थाम लिए हैं और प्रदेश के नए सीएम विजय बहुगुणा भी दिल्ली पहुच कर कैबिनेट के विस्तार किए जाने को लेकर कांग्रेस हाइकमान के साथ साथ नाराज विधायको व सांसद से बात करने में जुट गए हैं। उत्तरखण्ड में 30 मार्च को राज्यसभा के लिए मतदान किय जाना है और उससे पहले ही कांग्रेस विरोध की इस आग को थाम देना चाहती है क्योकि अगर विरोध की यह आग नही थमी तो उत्तराखण्ड मे 30 मार्च को राज्यसभा के होने वाले मतदान में भाजपा हरीश रावत के साथ मिलकर बाजी मार सकती है। कांग्रेस अपनी आगामी रणनीति के तहत 30 मार्च को मतदान के लिए विहिप जारी करने के साथ कडे़ निर्देश की तैयारी में जुट गई है। कुल मिलाकर केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत के राजनैतिक जीवन की बिसात टर्निंग प्वाइंट पर जा पहंुची है जहां फैसला हरीश रावत को तय करना है कि उनका राजनैतिक जीवन कहां रहकर सुरक्षित रह सकता है क्योकि कांग्रेस के भीतर जिस तरह दबाव की राजनीति रावत गुट द्वारा की गई है इसके बाद पूरा खेमा सोनिया गांधी की आंखो में चढ़ गया है।

(राजेन्द्र जोशी)

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