हम जहाँ से भेजे गए हैं और जिसने हमें भेजा है उसे हम भूलते जा रहे हैं और यहाँ आकर छोटी-छोटी इच्छाओं का दासत्व स्वीकार कर उलटे-सीधे धंधों में इस कदर रमे हुए हैं कि हमें अपनी मंजिल का भान तक नहीं होता। हर रोज हम कभी बाहरी चकाचौंध तो कभी भीतर हिलोरें ले रहे इच्छाओं के महासागर से इच्छित वस्तु को ढूंढ़ लाने की कोशिशों में लग जाते हैं। तकरीबन हर कोई रोजाना उठते ही ऐषणाओं की फेहरिश्त बनाना शुरू कर देता है और दिन भर इसी उधेड़बुन में गुजारता हुआ मानसिक उद्विग्नताओं के साथ कुछ न कुछ पाने की जिज्ञासा में तीव्र आतुरता दर्शाता हुआ शाम ढलने तक पस्त हो जाता है।
कुछ पा जाते हैं, कुछ आधे रास्ते पहुंच जाते हैं और कोई असफलताओं से निराश होकर अपने आपको ठगा सा महसूस करते हुए नींद के आगोश में खो जाते हैं। कुछ लोग दिन उगते ही प्लानिंग बनाना शुरू कर देते हैं और बढ़ चलते हैं पुरुषार्थ की डगर, तो कई लोग बिना मेहनत के मिल जाने वाली चीजों की आस में गिद्ध की तरह झपट्टामार हुनर का सहारा लेते हुए दिन भर इधर-उधर भटकते रहते हैं अलग-अलग जात के डेरों में। इस किस्म के लोग कुछ न कुछ हासिल करके ही घर लौटते हैं। भगवान ने इन्हें इतना तो हुनर दिया ही होता है कि लोग इनकी चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर खुद लुट जाने को तैयार हो जाते हैं। आदमियों की एक किस्म ऐसी ही है जो कभी कहीं से खाली हाथ नहीं लौटती, जब भी लौटेंगे, कुछ न कुछ हथिया कर ही।
इनके बारे में जनश्रुति है कि कत्लखानों की वजह से पशुओं की आत्माएं जब बड़े पैमाने पर ऊपर पहुंची तो ऊपर वाला घबरा गया। इन्हें फिर पशु योनि मिली तो बार-बार कटते रहकर ऊपर आ जाएंगे और टाईम बरबाद करते रहेंगे। ऐसे में भगवान ने अक्ल लगायी। इन्हें मनुष्य योनि से नवाज दिया और कई हुनर इनमें डाल दिए ताकि जल्दी वापस नहीं लौटें और धरती पर ही, जहाँ रहे वहाँ आस-पास जैसे-तैसे भी कमा खाएं। भगवान की अतिरिक्त कृपा या विवशता से मानव योनि पाने वाले ऐसे खूब लोग हमारे इलाकों में भी कहाँ कम हैं। भारतवर्ष से लेकर पूरी दुनिया तक में इनका अस्तित्व हर कहीं दिखने में आ ही जाता है। चींटी को कण और हाथी को मण की ही तर्ज पर भगवान भी इन पर पूरी कृपा बनाए रखते हुए इन्हें जीवनयापन के साधन उपलब्ध करा दी देता है। फिर चाहे इन साधनों का कोई सा प्रकार क्यों न हो।
यह स्थिति समाज-जीवन के कई क्षेत्रों में विद्यमान है। कोई क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है जो ऐसे हुनरमन्दों से जुदा हो। पवित्र कहे जाने वाले पेशे भी इनसे मुक्त नहीं हैं। इन सभी पर कलियुग की छाया पड़ी है। पूरे देश में इन हुनरमन्दों को दो किस्मों में बाँटा जा सकता है। एक वे हैं जो बाबा बने फिरते हैं और दूसरे वे हैं जिन्हें बाबा बनाया जा रहा है। सब एक-दूसरे को बना रहे हैं। कोई वशीकरण मंत्र फूंक रहा है, कोई बीमारियां दूर भगा रहा है, कोई समृद्धि की डगर बता रहा है तो कोई दूसरे-तीसरे कामों में माहिर है। टोनों-टोटकों और डोरे-ताबीजों ये लेकर उन तमाम प्रयोगों को हम पर आजमाया जा रहा है जिनसे निचोड़ कर कुछ प्राप्ति हो सके। कहावत भी है कि जब तक लोभी जिन्दा हैं तब तक धूतारे भूखे नहीं मरते।
अपनी समस्या यह है कि हर कोई किसी न किसी बीमारी से परेशान है। कहीं मानसिक है तो कहीं शारीरिक। वैसे कुछ दिखने का पागलपन तो सभी के मन में बसा हुआ है। हर आदमी किसी न किसी समस्या से त्रस्त है। और ऐसे में उसे जहाँ आशा की किरण दिखाई देने लग जाती है उधर वह बिना कुछ सोचे समझे बढ़ चलता है। उसे लगता है कि उसकी समस्या और पीड़ाओं का अंत शायद वहीं पर हो। हम लोग शुरू से ही भोले शंकर के उपासक हैं और इसलिए भोले-भाले हैं। हमें कोई भी, कभी भी बरगला सकता है। तभी तो सदियों से दूसरों के बरगलाने के स्वभाव को आज तक छोड़ नहीं पाए हैं। पहले गौरे अंग्रेजों ने हमें खूब बरगलाया और अब काले अंग्रेज अपनी कसर निकाल रहे हैं।
काले नकाबधारियों से लेकर सफेदपोशों तक और लाल-काले-हरे-पीले लिबासों से लेकर भांति-भांति के रंगों और लुभावने इश्तहारों से हमें भरमाया जा रहा है। हमारे आस-पास से लेकर दूर-दूर तक विचित्र वेशभूषाओं और अजीब मुद्राओं वाले ठगों की भरमार है जिनका एकमेव मकसद पैसा बनाना रह गया है। कई छोटे हैं तो कई बड़े ठग। सबके ठगी करने के तौर-तरीके भी नायाब हैं। सामने वाले को पता भी नहीं चल पाता और जेब कट जाती है, इतना लुट जाता है कि पछतावे की पूंजी के सिवा उसके पास कुछ बचता ही नहीं। एक और जहाँ कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा हथिया लेने की मानसिकता है वहीं दूसरी और परायी शक्ति और इल्म से कुछ पा लेने के फेर में लोग जहाँ कुछ सुनते हैं उधर दौड़े चले जाते हैं। इस अंधी दौड़ और स्वार्थ की यात्रा में लोग अपना भी सब कुछ भूल-भाल जाते हैं जिनके सहारे उनके पूर्वजों ने काफी कुछ हासिल किया था।
वह जमाना बीत गया जब लोग सर्वशक्तिमान की आराधना के मार्ग को पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ अपनाते हुए जीवन गुजार देते थे और ईश्वर की कृपा के साथ ही सफल जीवन का आशीर्वाद भी पाते थे। मूल मार्ग को पूरी दृढ़ता से थामे रखे हुए हमारे पुरखों ने वह सब कुछ पा लिया जो आदमी को आनंददायी जीवनयात्रा के लिए जरूरी होता है। लेकिन हमने स्वार्थ और कामनाओं को पूरा करने के लिए मूल मार्ग को त्याग दिया और उन परंपराओं को छोड़ दिया जिनसे हममें जीवनीशक्ति का संचार होता था। केन्द्र से भटक कर या यों कहें कि ईश्वरीय कृपा-आशीर्वाद और आराधना भरी महानदियों की मुख्य धारा से भटक कर हम छोटे-छोटे पोखरों को श्रद्धा पात्र मान बैठे हैं।
ईश्वर की बजाय हमने जब से व्यक्तिपूजा का दौर शुरू कर दिया है तभी से हमारा समाज और हम समस्याओं से घिरते जा रहे हैं। हमारे आस-पास ईश्वर कहलाने वाले लोगों की भी भरमार हो गई है। व्यक्तिनिष्ठ सामाजिक रूढ़ियाँ हमेशा समाज और देश को पीछे धकेलती रही हैं।हमारा पागलपन कहें या दुर्भाग्य, हम उन लोगों को समर्थ और सर्वशक्तिमान, सम्प्रभुतासम्पन्न मान बैठे हैं जो वास्तव में पूजने योग्य या अनुकरणीय कभी नहीं हो सकते। हम प्राचीन परम्पराओं, भारतीय संस्कृति और विभिन्न धर्मों के महापुरुषों के जीवन और उपदेशों से अनभिज्ञ हैं इसलिये हम आज यहां तो कल वहां दौड़ लगाते हैं और अन्ततः पछताते रहते हैं। इनसे उबरने के लिए जरूरी है कि हम जिस किसी धर्म-सम्प्रदाय, मत-मतान्तर और पंथ आदि के हों, उनमें वर्णित सर्वशक्तिमान की आराधना करें, पुरानी गौरवशाली परंपराओं और आत्मानुशासन को अपनाएं और फिर ईश्वरीय कृपा का अनुभव कर जीवन को सँवारें, समाज और देश को बनाएं...।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
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