कई इलाके में एमसीडी मतदान का बहिष्कार. - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 15 अप्रैल 2012

कई इलाके में एमसीडी मतदान का बहिष्कार.


तीन भागों में विभाजित दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के लिए रविवार को हुए मतदान का कई इलाकों में मतदाताओं ने बहिष्कार किया। उनके विरोध का कारण इलाकों में सुविधाओं का कथित अभाव था। राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार, उत्तरी दिल्ली के लाडपुर और सनोठ तथा बाहरी दिल्ली के काजीपुर गांव में बहिष्कार की सूचना है। 
वैसे अब तक एमसीडी चुनाव में दिल्ली वाले एकतरफा वोट करते रहे हैं। या तो भाजपा या कांग्रेस । कभी ऐसे हालात नहीं आए कि कांटे का मुकाबला हो, एक दो सीट से फैसला हुआ हो। हर बार नतीजा साफ रहा है। लेकिन कभी भी तीसरे दल को यहां जगह नहीं मिली। दिल्ली के लिए खैरियत है कि यहां कोई राजद-बसपा की तरह किसी दल को व्यापक समर्थन नहीं मिला। कुछ स्थानों में सपा की थोड़ी पकड़ है। न ही कभी क्षेत्रिय दल उभरे। 

बदले प्रारूप में दिल्ली में एमसीडी का चौथा चुनाव होने जा रहा है। तीन में दो बार बीजेपी सत्ता में रही है। 1997 में 134 वार्डों की एमसीडी में बीजेपी 78 सीटें जीतकर टाउन हाल पहुंची थी। 2002 में कांग्रेस ने 134 में 108 सीटों से जीती थीं। 2007 में फिर बीजेपी बहुमत से लौटी और 272 वार्ड में 164 सीटें दिल्ली वालों ने उसकी झोली में डाली।

विधानसभा के नतीजों में भी मतदाताओं ने हमेशा एकतरफा समर्थन दिखाया है। 1993 में विधानसभा की शुरूआत भाजपा से हुई थी। 70 सदस्यों वाली विधानसभा में 49 विधायक भाजपा के थे। 1998, 2003 और 2008 से लगातार तीन बार कांग्रेस विधानसभा में काबिज है।  1998 में 53, 2003 में 48 और 2008 में 43 विधायक जीतकर आए हैं। एमसीडी और विधानसभा की तरह लोकसभा की सातों सीटों के लिए भी दिल्ली वालों का मूड लगभग एक जैसा दिखा है। पिछली पांच लोकसभा चुनावों के नतीजे देखें तो 2009 में सातों सीटें कांग्रेस, 2004 में छह कांग्रेस एक बीजेपी, 1999 में सातों सीटों पर बीजेपी, 1998 में छह बीजेपी एक कांग्रेस और 1996 में 5 बीजेपी 2 कांग्रेस के खाते में रही हैं। इस बार एक नहीं तीन एमसीडी हैं, इसलिए बदले प्रारूप में दिल्ली वाले क्या नतीजा देंगे यह भी दिलचस्प है। पूर्व की तरह ही किसी एक पार्टी पर विश्वास जताया तो आश्चर्य नहीं होगा। अगर दोनों पार्टियों के बीच तीन एमसीडी का बंटवारा हुआ तो दिल्ली वालों के लिए नया अनुभव होगा। 

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