जो लोग विपन्न हैं वे रोजी-रोटी, कपड़ा और मकान के जुगाड़ मंें दिन-रात खोए हुए हैं फिर भी मस्त हैं। दूसरी ओर जिनके पास खाने-पीने, रहने आदि को सब कुछ है वे राग-द्वेष और ईर्ष्या तथा वैरभाव में व्यस्त हैं। जब पेट भरा हो, आदमी के पास फालतू दिमाग होता है तब वह शैतानी के काम करने लग जाता है अथवा शैतानी गलियारों की कल्पनाओं में खोया रहता है। तभी तो कहा गया है-खाली दिमाग शैतान का घर। फिर अपने यहाँ तो शैतान अब उन जगहों पर महल बनाने लगा है जिन्हें दिमागदार कहा जाता है।
पेट की आग बुझाने के फेर में बहुसंख्य लोगों को यह भी पता नहीं चलता कि समय कहाँ जा रहा है? कल क्या होगा इसकी चिन्ता उन्हें नहीं सताती। न उन्हें किसी पराये के सुख से जलने की फुरसत है, न अपनी मान-बड़ाई के लिए वे सब जतन करने की जरूरत है जो आज के आदमी करने लगे हैं, और न ही उन्हें कहीं कोई नापाक समझौतों की कोई आदत पड़ी होती है। ये तो हमीं हैं जो कभी चैन से बैठ नहीं पाते। हमें सब कुछ सहज में मिल रहा है जो पेट भरने को काफी है। लेकिन हमारी तलाश उन चीजों के लिए होने लगती है जिनसे हमारा दिन, पेट और दिमाग सब कुछ एक साथ भर जाता है।
हम उन सभी के बारे में जानना, आलोचना व निंदा करना तथा कहना और करना चाहते हैं जिनसे हमारा कोई संबंध है ही नहीं। हर आदमी को अपने-अपने रास्ते चलना चाहिए, अपनी हदों में रहना चाहिए और मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखाओं का सम्मान भी करना चाहिए। लेकिन कितने लोग ऐसा कर पाते हैं? आम लोग तो छोटी-मोटी क्षम्य गलतियों वाले काम भले ही अनजाने में कर डालें मगर अपने आपको बुद्धिजीवी, समझदार और नेतृत्व करने वाले, मदारियों के इशारों पर नाचने वालों से लेकर नचवाले वाले और छोटी-मोटी जलेबियों के लिए दौड़ लगाने के आदी लोग सब कुछ जानते-बूझते हुए भी ऐसे-ऐसे काम करने लगते हैं जिनसे लगता है ईश्वर ने भूल से कहीं न कहीं कोई कमी रख दी है।
जमाने को अगस्त्य की तरह पी जाने और सारी दुनिया का माल अपनी हदों में खींच लाने की तमन्ना रखने वाले लोगों की हमारे यहाँ भरमार है। ये लोग पुरुषार्थ का इस्तेमाल करते हुए कुछ भी करें इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता मगर बहुसंख्य लोग अपने आपको लोकप्रिय, समृद्ध और प्रतिष्ठित मनवाने के लिए जो जतन करने लगते हैं वे अपने आप में ऐसे हैं जिनसे परहित, परमार्थ, परोपकार, प्रेम, सहिष्णुता और समन्वय के आदर्शों की कल्पना नहीं की जा सकती।
लोग बिना पुरुषार्थ सब कुछ हासिल करना चाहते हैं और इस अंधी दौड़ में वे जिन उपकरणों का प्रयोग करते हैं उन सभी में राग-द्वेष, ईर्ष्या और वैर भाव कूट-कूट कर भरा हुआ होता है। कुछ लोग तो ईर्ष्या और द्वेष से इतने भरे होते हैं कि वे जहां कहीं रहेंगे वहां वैर भाव अपने आप पसरा हुआ रहता है। दुश्मनी पाल लेने वाले कुछ लोग तो किसी भी हद तक जाकर वैर भाव प्रकट करने को ही महानता समझ बैठे हैं। ईर्ष्या और द्वेष भरे माहौल में कुछ लोग सिर्फ इसीलिये तथाकथित लोकप्रिय बने हुए हैं कि वे दूसरों के कान फूँकने और मौके की नज़ाकत को भाँप कर झाण्णी लगाने और करवणी बाँटने में या कि मौली बाँधने माहिर भौंपे हो गए हैं ।
वैरभाव वाले लोगों में से अधिकतर क्षणिक सुख और आनंद की प्राप्ति के लिए बैंजीन रिंग की तरह पाले बदलते रहते हैं। उनका यह ऐरोमेटिक स्वभाव इसीलिये रह रहकर अलग-अलग प्रकार की गंध का अहसास कराता रहता है। कँधों, बँदूकों और तोपों की तलाश में जुटे रहने वाले गोला-बारूद के भण्डारी ये लोग कभी किसी के नहीं हो सकते। कभी किसी के साथ नापाक रिश्ता, फिर तलाक और फिर किसी लोभ-लालच में मैत्री, इस किस्म के लोग हमेशा किसी न किसी षड़यंत्र में व्यस्त रहते हैं। ये षड़यंत्र ही हैं जो उन्हें जिन्दा रखने की सारी ऊर्जा का इंतजाम करते रहते हैं।
कभी वैध-अवैध संबंधों और कभी भविष्य में लाभ पाने की दूरदर्शिता और दुनिया को अपने हक़ में इस्तेमाल करने जैसी प्रवृत्तियों वाले लोग न स्थायी मित्र हो पाते हैं न स्थायी शत्रु। इस सारी यात्रा से उन्हें कुछ हासिल हो न हो, मगर इतना जरूर है कि इनकी मानसिकता ऐसी विकृत हो जाती है कि रोजाना इन्हें तलाश होती है लक्ष्य की। आज इसके पीछे तो कल उसके। लोग अपने वजूद को बनाए रखने के लिए दूसरों का अस्तित्व समाप्त कर डालने तक की तैयारी के साथ मैदान में भिड़े होते हैं। कुछ को इनकी परवाह होती है, कुछ को नहीं। प्रतिक्रियाओं के प्रोटीन, विटामिन ही तय करते हैं इनके जीवन की दशा और दिशा।
ऐसे नकारात्मक माहौल के बीच प्रेम का माहौल स्थापित करने मात्र से सारी स्थितियां उलट सकती हैं। प्रेम समाप्त करता है संवादहीनता और कटुता के माहौल को। धुर विरोधियों के बीच भी आपसी संवाद की निरन्तरता बनी रहे तो संबंधों में माधुर्य और प्रगाढ़ता का संचार हो सकता है। आज हर कहीं वैर भाव और एक-दूसरे को पछाड़ कर आगे बढ़ने और हथिया लेने की जिस मानसिकता का तेजी से विस्तार हो रहा है, उसे रोकने और सामाजिक संबंधों के अनुकूल माहौल की स्थापना के लिए काम करने की जरूरत है।
आज जो लोग उखाड़-पछाड़ के षड़यंत्रों और झूठे कहानी-किस्सों के चक्कर में पड़ कर एक-दूसरे की छवि खराब करने और नुकसान पहुंचाने के कारनामों में अपनी जितनी ऊर्जा खपा रहे हैं उनकी आधी भी यदि समाज के रचनात्मक कार्य में लगाएं तो समाज बदलता दिखे। समाज और अपने क्षेत्र के लिए भले नहीं, खुद को सुधारने और सर्वस्पर्शी व्यक्तित्व विकास के लिए भी कुछ काम करना शुरू कर दें तो वह दिन दूर नहीं जब नकारात्मक भावों की बजाय सकारात्मक छवि वाले ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण हो जाए, जिसे सभी लोग पसंद करने लगें। लेकिन झूठी तारीफ करते हुए वाह-वाह और जयगान करने वाले लोगों की संख्या भी कहाँ कम है। ये किसी को सुधरने देना ही नहीं चाहते, हर बार कोई न कोई नई बात लाकर बरगला देते हैं और ये तमाशे जीवन भर यों ही चलते रहते हैं।
प्रेम का ब्रह्मास्त्र थाम लिया जाने पर ये इस प्रकार की सभी विकृतियों और शंका-आशंकाओं के भ्रमों से हर किसी को मुक्त कर सकता है। कोई कितना ही विरोध करे, अपशब्द कहे और मूर्खतापूर्ण हरकतें करें, अपने मन में उसके प्रति वैरभाव नहीं होगा तो उसका कितना ही बड़ा वैर हो, अपने आप समाप्त हो जाएगा। कुछ वैरभाव पूर्व जन्म के होते हैं जो अकारण सामने आ जाते हैं। उस स्थिति में कुछ भी प्रतिक्रिया न की जाए तो इसका असर स्वतः समाप्त हो जाता है। इसकी बजाय प्रतिक्रिया व्यक्त करने से नए प्रारब्ध का निर्माण होता है और फिर जन्म-जन्मान्तरों तक यही क्रम चलता रहता है। इसलिये भलाई इसी में है कि जो अपना अकारण विरोध करे, उसके प्रति दया भाव रखें। एक न एक दिन पछतावा होगा और प्रायश्चित उसे ही करना पड़ेगा।
जो केवल विरोध के लिए विरोध करते हैं उनके प्रति चिंतित न हों, क्योंकि यह उनके जीवनयापन की आदत और अभिनय की अपनी शैली है। आज आपके सामने ये नहीं होंगे तो कोई दूसरे अभिनयकर्त्ता होंगे। इन सभी किस्मों के लोगों के प्रति बेपरवाह होकर रहें तथा नेक-नीयत से काम करें तो कोई अपना कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। फिर जो खुद असुरक्षित हैं वे औरों को न तो सुरक्षाकवच दे सकते हैं, न औरों के सुरक्षाकवच को भेद पाने की सामर्थ्य रख पाते हैं।
जीवन में सफलता पाने के इच्छुकों को चाहिए कि वे सभी के प्रति प्रेमभाव बनाएं रखें। जो लोग हमें अपना विरोधी मानने की भूल कर रहे हैं उनके प्रति भी प्रेम, करुणा और दया का भाव रखें और उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना करें। सर्वशक्तिमान कभी न कभी तो उन्हें सद्बुद्धि देकर सत्य का अहसास कराता ही है। इस जनम में न सही तो उनके अगले जन्म में भी......।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें