भृष्टाचार का विषय किसी पद विशेष, व्यक्ति-विशेष, संस्था-विशेष अथवा शासकीय-तंत्र मात्र से ही जुड़ा हुआ नही है बल्कि आम जन-मानस की मानसिकता मे परिवर्तन लाये जाने का विषय है। देश के प्रत्येक व्यक्ति को इस हेतु दृंढ़ता के साथ अपने मन मे यह धारणां निर्मित करना होगी कि वह किसी भी प्रकार के गलत कार्य को नही करेगा और किसी अन्य को भी नही करने देगा तथा प्रत्येक स्तर पर भृष्टाचार का विरोध करेगा। भारत मे ज्यों-ज्यों भौतिकतावाद एवं उपभोक्तावाद की पृवŸिा बड़ेगी तथा अध्यात्मिकता का हृास होगा, त्यों-त्यों अपराध एवं भृष्टाचार मे बढ़ोŸारी होगी। इस हेतु देश मे प्रत्येक स्तर पर यह सन्देश पहुंचना चाहिये कि भृष्ट-आचरण, झूंठ और फरेब के माध्यम से हुए धनार्जन के कारण रोग, अशान्ति, असन्तोष तथा दुखों का आगमन भी परिवार मे होता है और जो लोग पारदर्शी होकर सत्य व ईमानदारी की कसौटी पर धनार्जन करते हैं, उनके घर में सुख-शान्ति के साथ शक्ति-स्वरूपा लक्ष्मी जी का आगमन होता है। भले ही इसे वर्तमान परिपेक्ष्य में असंगत मान लिया जाये लेकिन यह शास्वत सत्य है। काश, एक ऐसी नई सुवह आये जब इस देश की जनता का प्रत्येक वर्ग पूर्णतः पारदर्शिता और ईमानदारी के साथ यह संकल्प ले कि जीवन मे चाहे कितनी भी परेशानियां आयें, हम किसी भी कार्य के लिये घूस नही देंगे और जो घूस की मांग करेगा, ऐसे भृष्टाचार-रूपी राक्षस के आचरण को जड़मूल से नष्ट कर के ही रहेंगे।
भृष्टाचार को मिटाने के लिए जितनी चर्चायें और कार्य अभी तक हुये हैं, उनके सार्थक परिणाम अब तक सामने नही आ पाये और इसका कारण यह है कि जब किसी समूह मे भृष्टाचार मिटाने की चर्चायें होतीं है तो वह उपदेश देने और सुनने तक सीमित हो कर समाप्त हो जातीं हैं एवं उसके बाद सभी पूर्ववत अपने-अपने काम मे लग जाते हैं। भृष्टाचार समाप्त करो, भृष्टाचार नही होना चाहिये, ये बातें और नारे लगने और लगाने तक सीमित रह गईं हैं। भृष्टाचार समाप्त कांेन करेगा ? भृष्टाचार रोकना और ईमानदारी से कार्य करना, यह व्यक्तिशः गुंण है और इस गंुण को व्यक्तिगत मानते हुए ही आत्म-संतोष के साथ निर्वाह करने का आनन्द अनुभव योग्य है। लगातार नैतिक मूल्यों में हो रही गिरावट के साथ अर्थ-प्रधान दृष्टिकोंण ही इस देश को गर्त में ले जाने वाला है। शासकीय स्तर पर प्रत्येक पद का व्यवसायीकरण हो रहा है। इसी कारण भृष्टाचार रूपी यह दानव देश के समक्ष बड़ी हठधर्मी के साथ मुस्करा रहा है और इसका मुख्य कारण यह है कि आम जनमानस के अन्दर ‘‘कम से कम समय में अधिक से अधिक पैसा’’ अर्जित करने का ध्येय बन चुका है। एक चोर, अन्य दस चोरों के नाम बता कर अपनी चोरी को वाजिब प्रमाणित करते हुये कहता है कि ‘‘ऐसा कौन नहीं कर रहा है।’’ एक सुव्यवस्थित समाज के लिए जितना महात्वपूर्ण कानून है उससे भी अधिक महात्वपूर्ण है व्यक्ति का नैतिक स्तर और चरित्र निर्माण। देश मे अपराध और भ्रष्टाचार को सिर्फ कानून से रोका जाना सम्भव नहीं है। जो गिरफ्त में आ गया वह चोर है और जो पकड़ में नहीं आ पाता वह अपराध और भृष्टाचार करने में न तो डर रहा है और न ही उसे संकोच है। कोई व्यक्ति गलत काम कर रहा है तो वह अपनी तर्क और बुद्धि के बल पर यह कहकर संतुष्ट कर देता है ‘ऐसा तो सभी कर रहे हैं ।’ बस, यही बाक्य इस देश को दीमक की तरह लगा है । इस तरह एक अनैतिक और गलत कार्य को सही होने की मान्यता देने का प्रयास भृष्टाचारियों द्वारा किया जा रहा है। शासकीय स्तर पर भृष्ट-अधिकारी अपने पदों और पदस्थापनाओं को आय का साधन मान चुके हैं। पैसे से पद और पद से पैसा और इसी प्रकार राजनीतिक क्षेत्रों में भी पैसे से सत्ता और सत्ता से पैसा अर्जित करने का भी क्रम बन रहा है। कहां ले जायेंगे ये इतने पैसे को ? इनका कितना बड़ा ‘‘कल’’ है ? एक पीढ़ी ? दो पीढी़ ? कितनी पीढ़ियां ? स्वयं को कितना असुरक्षित मेहसूस करते हैं ये ? कितने भयभीत हैं ये ?
भारत की धार्मिक, सास्कृतिक, आध्यात्मिक पृष्ठभूमि को दृष्टि मे रखते हुये यदि हमें भृष्टाचार का अकुंश लगाना हैं तो देश मे इस चिन्तन का प्रचार व प्रसार करना होगा कि ‘धन’ का तात्पर्य सिर्फ, कागज के कुछ रुपये, जमीन-जायदाद अथवा किसी भौतिक-वस्तु तक ही सीमित नही है, बल्कि बुद्धि, विवेक, प्रेम, दया, भक्ति, लोकप्रियता, सन्तोष, आनन्द रुपी गुणों का भाव जिस व्यक्ति मे है, वह सर्वाधिक धनाढ्य है। ऐसे गुणों का धारण करने वाला हमेशा सुखी रहता है। उसका ये गुंण रुपी ‘धन’ शास्वत है जो एक जन्म से दूसरे जन्म तक साथ रहता है। लेकिन इस हेतु प्रथमतः आवश्यक यह है कि ईमानदारी की ही कसौटी पर पारदर्शिता के साथ भौतिक-वस्तु-रुपी ‘धन’ का अर्जन किया जाये।
भारत का प्रत्येक जागरूक नागरिक राजनीति की वर्तमान गतिविधियों के कारण चिन्तित है। प्रत्येक स्तर पर भृष्टाचार अनियंत्रित है और शनैः-शनैः राष्ट्रीयता की भावना का ह्रास हो रहा है। क्या यह सच नही है कि दिन-प्रतिदिन प्रत्येक स्तर पर नैतिक मूल्यों मे ह्रास हो रहा है ? अधिकांश व्यक्ति एवं विशेष रूप से राजनीतिक क्षेत्रों मे मिथ्याभाषी हो गये हैं। अधिकांश राजनेता एवं शासकीय अधिकारी अपने पदों के माध्यम से धनार्जन के व्यापार मे लगे हुए हैं। ऐसी धारणां विकसित हो रही है कि उच्च स्तर पर पदस्थ अनेकों अधिकारीगंण अवैध-कार्यों के माध्यम से धनार्जन करने मे लगे हैं, उन्हीं को अपना आदर्श मानते हुये उन्हीं के अनुरूप गलत-कार्य करने वाले आधीनस्थ अधिकारी भी अपने आप को युक्तियुक्त पूर्ण बताने लगते हैं। शासकीय अधिकारियों को हम देख रहें हैं कि वे राजनेताओं की स्वार्थपूर्ति के पुर्जे बन चुके हैं और अप्रत्यक्ष रूप से वे स्वयं राजनीतिज्ञ भी बन गये हैं। इस प्रकार राजनेताओं एवं शासकीय अधिकारियों के मध्य कदाचरण और आपसी सामन्जस्य का यह खेल इस देश के लिये वास्तविक बीमारी हैं और आम जनता मे वर्ग-विभाजन व देश के बुद्धिजीवियों की उदासीनता इसमें और अधिक सहायक हो रही हैं।
राजेन्द्र तिवारी,
नोट:- लेखक एक वरिष्ठ अभिभाषक एवं म.प्र.शासन के शासकीय अभिभाषक हैं।
फोन- 07522-238333, 9425116738

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