आखिर कौन थे ब्रह्मेश्वर मुखिया !!!! - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 1 जून 2012

आखिर कौन थे ब्रह्मेश्वर मुखिया !!!!


ब्रह्मेश्वर मुखिया

बिहार में जाति संघर्ष के दौरान रणवीर सेना की स्थापना 1995 में की गई थी। ऊंची जातियों के लिए संघर्ष करने वाली इस रणवीर सेना के संस्थापक सदस्यों में से एक थे ब्रह्मोश्वर सिंह उर्फ बरमेसर   ब्रह्मोश्वर । मध्य बिहार के भोजपुर जिले के बेलाऊर गाव में जन्मी रणवीर सेना का शुरुआती नाम रणवीर किसान महासंघ था। जिसे बाद में नक्सलियों ने रणवीर सेना का नाम दिया। रणवीर सेना के जन्म के पीछे भी भोजपुर जिले में आतंक का पर्याय बना नक्सली गुट भाकपा माले [लिबरेशन] था। जिसके अत्याचारों से तंग जमीदारों ने अपनी भूमि की रक्षा के लिए इस संगठन का निर्माण किया था। भूमिहार किसानों की निजी सेना कहलाये जाने वाले इस संगठन के गठन में खोपिरा के पूर्व मुखिया ब्रह्मोश्वर सिंह उर्फ बरमेसर मुखिया, बरतियर के काग्रेसी नेता जनार्दन राय, एकवारी के भोला सिंह, तीर्थकौल के प्रोफेसर देवेंद्र सिंह, भटौली के युगेश्वर सिंह, बेलाउर के वकील चौधरी, धनछूहा के काग्रेसी नेता डॉ. कमलाकात शर्मा और खण्डौल के मुखिया अवधेश कुमार सिंह ने प्रमुख भूमिका निभाई थी।

रणवीर सेना की खूनी भिड़ंत अक्सर नक्सली गुटों से हुआ करती थी। बाद में खून खराबा इतना बढ़ा कि राज्य सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया था। नब्बे के दशक में रणवीर सेना और नक्सली गुटों ने एक-दूसरे के खिलाफ कई बड़े नरसंहारों को अंजाम दिया। जिसमें एक दिसंबर 1997 को हुए लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार ने पूरे देश को हिला दिया था। इस नरसंहार में 58 दलित मारे गए थे। बाथे नरसंहार के बाद पूरे विश्व के सामने बिहार की जातिगत समस्या उजागर हुई थी। बाथे नरसंहार का मुख्य आरोपी मुखिया ही था। ये नरसंहार 37 ऊंची जातियों की हत्या से जुड़ा था जिसे बाड़ा नरसंहार कहा जाता है। बाड़ा में नक्सली गुटों ने ऊंची जाति के 37 लोगों की हत्या कर दी गई थी। जिसके प्रतिवाद में बाथे नरसंहार को अंजाम दिया गया।

इसके अलावा मुखिया बथानी टोला नरसंहार में अभियुक्त थे जिसमें उन्हें 29 अगस्त 2002 को पटना के एक्सीबिजन रोड से गिरफ्तार किया गया। मुखिया पर पाच लाख का इनाम था और वह जेल में नौ साल तक रहा। बथानी टोला मामले में सुनवाई के दौरान पुलिस ने कहा कि मुखिया फरार हैं, जबकि मुखिया उस समय जेल में था। इस मामले में मुखिया को फरार घोषित किए जाने के कारण सजा नहीं हुई और वह आठ जुलाई 2011 को रिहा हुआ। बाद में बथानी टोला मामले में उसे हाईकोर्ट से जमानत मिल गई।

277 लोगों की हत्या से संबंधित 22 अलग-अलग आपराधिक मामलों [नरसंहार] में मुखिया आरोपी था। इनमें से 16 मामलों में उसे साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया था। बाकी छह मामलों में वह जमानत पर था। जेल से छूटे के बाद मुखिया ने 5 मई 2012 को किसानों की हितों की लड़ाई के लिए अखिल भारतीय राष्ट्रवादी किसान संगठन के नाम से एक संस्था का गठन किया। मुखिया का आरोप था कि राज्य सरकार द्वारा किसानों पर हुए अत्याचारों पर लगातार अनदेखी के कारण ही रणवीर सेना का गठन किया गया था। जिसे सरकार ने उग्रवादी गुट घोषित कर लगातार इससे जुड़े लोगों को प्रताड़ित किया था। जबकि किसान लगातार नक्सली गुटों की हिंसा का शिकार हो रहे थे।

भोजपुर में इसके गठन के बाद पहला नरसंहार सरथुआ गाव में हुआ था, जहा एक साथ पाच मुसहर जाति के लोगों की हत्या कर दी गई थी। बाद में तो नरसंहारों का सिलसिला ही चल पड़ा। बिहार सरकार ने सवर्णो की इस सेना को तत्काल प्रतिबंधित कर दिया, लेकिन हिंसक गतिविधिया जारी रही। एक तरफ भाकपा माले का दस्ता खून बहाता रहा तो प्रतिशोध में रणवीर सेना भी खून की होली खेलती।

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