किसी का तुला या उतारा हुआ न खाएं ! - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा I ह्रदय राखि कौसलपुर राजा II, हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥, मंगल भवन अमंगल हारी I द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी II, हरि अनंत हरि कथा अनंता I कहहि सुनहि बहुबिधि सब संता II, दीन दयाल बिरिदु संभारी । हरहु नाथ मम संकट भारी।I, माता पिता की सेवा करें....बुजुर्गों का ख्याल रखें...अपनी प्रतिभा और आचरण से देश का नाम रौशन करें...

बुधवार, 25 जुलाई 2012

किसी का तुला या उतारा हुआ न खाएं !


वरना पछतावा होगा जिन्दगी भर


हमारे प्राचीन ग्रंथों में सदियों से तुलादान और उतारा करने का जिक्र आता है। किसी अवसर विशेष पर अथवा बीमारी और दुर्भाग्य से मुक्ति पाने के लिए अपने भार के बराबर खाद्यान्न, पकवान आदि भोज्य सामग्री का दान करने की परंपरा रही है। पुण्य की प्राप्ति के लिए भी ऐसा किया जाता है। राजा-महाराजाओं के समय से ही तुलादान की प्रथा चली आ रही है जिसमें व्यक्ति विशेष को तराजू में बिठाकर उसके भार के बराकर अनाज तथा अन्य सामग्री तौल कर इसे गरीबों में बाँट देने अथवा पशुओं-पक्षियों को खिला देने का रिवाज रहा है। लेकिन आम तौर पर यह तुलादान दो कार्यों के लिए किया जाता है। एक तो पुण्यार्जन करने और दूसरा अपने कष्टों के निवारण के लिए। तुलादान के साथ ही किसी भी प्रकार की ग्रह बाधा और पापों के कारण समस्याओं से पीड़ित व्यक्तियों के शरीर से संबंधित अनिष्टकारक ग्रह के शमन के लिए उस ग्रह विशेष से जुड़ी वस्तुओं और खाद्यान्न, मिठाई, पकवान आदि का शरीर से विषम बार उतारा किया जाकर पशुओं को डाल देने का विधान भी हमारी प्राचीन पद्धतियों व टोनों-टोटकों में शुमार रहा है।

ग्रहों के शमन के लिए ग्रह से संबंधित रंग की वस्तुओं का दान करने और इस रंग से संबंधित मिठाई, अनाज, धान्य आदि खिलाने की परंपरा बनी हुई है। इसी प्रकार ग्रहों से संबंधित वस्तुओं के दान का भी विधान रहा है। तुलादान के लिए उस जमाने में कई मन्दिरों में कहीं लौह और कहीं पाषाण की तुलाएं बनी होती थी और इनका उपयोग अक्सर होता था। आम तौर पर जिस व्यक्ति के भार के बराबर सामग्री होती थी उसे पशु-पक्षियों को डाल दिया जाता था। यह मान्यता रही है कि तुलादान से पुण्य बढ़ता है और इससे कई समस्याओं, ग्रहजनित बाधाओं, बीमारियों तथा अनिष्टों से मुक्ति मेें मदद प्राप्त होती है और तुलादान के बाद व्यक्ति की समस्याओं और पीड़ाओं का समाधान होता है। यही वजह रही है कि पुराने जमाने में तुलादान की परंपरा काफी प्रचलित रही है लेकिन इसका अब ह्रास होता जा रहा है। इसी प्रकार कष्टों से पीड़ित व्यक्ति पर से पानी उतारकर फेंक देने, नज़र से बचाने वाली और ग्रहों से संबंधित सामग्री का उतारा कर पशु-पक्षियों में डालने का विधान भी काफी पुराना और प्रभावी है। आज भी यह परम्परा हर कहीं किसी न किसी रूप में अस्तित्व में है और लोग इन विधियों का प्रयोग करते हैं।

किसी भी व्यक्ति के भार के बराबर तौली हुई सामग्री को पशु-पक्षियों को डाले जाने का विधान सदियों से चला आ रहा है। लेकिन कुछ दशक से किसी न किसी रूप में बड़े माने जाने वाले लोगों को खाद्य सामग्री, फलों, गुड़ आदि से तौलने और यह सामग्री आमजन में वितरित कर दिए जाने की परंपरा बढ़ती जा रही है। इससे तौले हुए व्यक्ति की बीमारी, विभिन्न प्रकार की पापराशि, समस्याएं, खराब नज़र, अनिष्टकारी ग्रहों का प्रभाव आदि सब कुछ तो शमन हो जाता है लेकिन जो लोग इस सामग्री का भक्षण करते हैं उन्हें समस्याओं से ग्रस्त होना पड़ता है। क्योंकि इस सामग्री में ही उस व्यक्ति के सारे दोष और ग्रह बाधाएं आ जाती हैं जो पूरी सामग्री में अपने अनुपात में विभक्त होकर खाने वालों के पेट में पहुंच जाती हैं और उसके पाचन से उत्पन्न रसादि में मिलकर शरीर में संचरित हो जाते हैं। वैसे भी हर व्यक्ति की मलीनता और पाप उसके अन्न में समाहित होते हैं। हालांकि यह नकारात्मक प्रभाव सूक्ष्म रूप में होता है लेकिन असर तो करता ही है। लोग भले ही बड़े कहे जाने वाले लोगों को तराजू में बिठाकर ससम्मान तौलें और इससे उन महान लोगों को खुश करने की कोशिश करें लेकिन तंत्र शास्त्रीय परंपरा में यह आत्मघाती कदम ही होता है। 

इसी प्रकार इन बड़े लोगों को तौला जाकर इनके भार के बराबर उतरने वाले सिक्कों का उपयोग भी मनुष्यों के लिए नहीं किया जाकर पशु-पक्षियों के किसी काम के लिए किया जाना चाहिए ताकि इस पैसे में व्याप्त दोष का प्रभाव समाज पर न पड़े। इन सिक्कों की राशि का उपयोग न तो सार्वजनिक महत्त्व के काम में किया जाना उचित रहता है न मन्दिरों में, क्योंकि देवता और मनुष्यों सभी को जो सामग्री समर्पित की जानी चाहिए, वह शुद्ध होनी चाहिए, किसी व्यक्ति विशेष की पीड़ाओं और समस्याओं के निवारण या सम्मान के लिए बटोरी हुई नहीं, क्योंकि ऐसा होने पर यह सामग्री और राशि दोनों ही उच्छिष्ट और निर्माल्य की श्रेणी में आते हैं। जब स्वयं शिवलिंग पर चढ़ी हुई सामग्री को ग्रहण करने का अधिकार पुजारी या भक्तों को नहीं होता और इसे निर्माल्य माना जाता है, फिर व्यक्ति के निर्माल्य को ग्रहण कर लेना कहाँ तक उचित है? ऐसा करने से मलीनता और दोषों का ही संचार होता है और सामने वाले के पापों का अंशतः विभाजन होकर यह ग्रहण करने वाले को भुगतना पड़ता है। लोग भले ही उस समय इसके प्रति बेपरवाह रहें मगर इसका कुप्रभाव न सिर्फ उन पर बल्कि उनकी आने वाली पीढ़ियोें पर भी पड़ता है।

इससे तो अच्छा है कि ऐसी सामग्री का उपयोग मनुष्यों द्वारा नहीं किया जाए। कई बार गुप्त रूप से होते रहने वाले महान पापों की निवृत्ति के लिए भी कई लोग चुपचाप ऐसे टोने-टोटके करवाते रहते हैं और तब इसका बुरा असर उन लोगों पर भी होता है जो इसकी वास्तविकता से अनजान होते हैं क्योंकि इस प्रकार की सामग्री में उन लोगों के पापों का प्रतिशत भी होता है जो बिना किसी अवरोध के सीधा ही ग्रहण करने वालों के पाले में आ जाता है। अच्छा यह होगा कि इस प्रकार की गतिविधियों से स्वयं को दूर रखा जाए और अपने जीवन में ऐसा कोई अवसर सामने न आए जिसमें परायी ऐसी सामग्री को ग्रहण करना पड़े, अन्यथा इससे परोक्ष-अपरोक्ष रूप से जो अनिष्ट होता है उसके लिए हमें जिन्दगी भर पछतावा करना पड़ सकता है।


---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

कोई टिप्पणी नहीं: