सार्वजनिक स्थलों की गरिमा बनाएं रखें !!! - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा I ह्रदय राखि कौसलपुर राजा II, हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥, मंगल भवन अमंगल हारी I द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी II, हरि अनंत हरि कथा अनंता I कहहि सुनहि बहुबिधि सब संता II, दीन दयाल बिरिदु संभारी । हरहु नाथ मम संकट भारी।I, माता पिता की सेवा करें....बुजुर्गों का ख्याल रखें...अपनी प्रतिभा और आचरण से देश का नाम रौशन करें...

शनिवार, 28 जुलाई 2012

सार्वजनिक स्थलों की गरिमा बनाएं रखें !!!


टाईमपासिंग सेन्टर या सराय न बनाएं


लोग अपना उद्देश्य भटकते जा रहे हैं। कइयों के लिए जिन्दगी टाईमपास होकर रह गई है, कई दूसरों की चापलुसी और चमचागिरी करके समय निकाल रहे हैं और मावा-मेवा भी डकार रहे हैं, कुछ दलाली करते हुए खुद टकसाल की शक्ल में ढल गए हैं और कई ऐसे हैं जो बातूनी प्रजाति में शामिल होकर दिन-रात बकवास में रमे रहने लगे हैं। कइयों के पास कहने को कोई काम नहीं है और वे कभी इधर तो कभी उधर भटकते हुए झूठन खाते फिर रहे दिन गुजार रहे हैं। कहीं कोई पराया माल उड़ा रहा है तो कोई उच्छिष्ट पर मुँह मार रहा है। बहुत सीमित संख्या में ऐसे लोग भी हैं जो बेचारे गंभीर होकर जीवन की सच्चाइयों से रूबरू होते हुए कर्मयोगी बने हुए हैं। कुछ झूठे डेरे वाले लोगों के लिए पूरा जहाँ धर्मशाला और सराय ही है जहाँ वे मौके बेमौके अपना टाईमपास करते हुए जमे रहते हैं जैसे कि इन पर उन्हीं का अधिकार हो और वे ही इन सरायों और धर्मशालाओं के मालिक हों।

नवरे और नुगरे लोग हर कहीं बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। इनके पास अपना कहने को कोई काम नहीं होता बल्कि ये लोग उन सारे कामों को पूरा मन लगाकर करते हैं जिनमें मानवीय गंध का अभाव हो अथवा मनुष्य के करने लायक नहीं हों। अपने इलाके में भी ऐसे खूब सारे लोग हैं जिनके पास कोई काम नहीं है सिवाय छिद्रान्वेषण और झूठन चाटने के लिए इधर-उधर घूमने के। इनके हुलिये और कामों को देखो तो साफ लगेगा कि आवारा लोग भी इनके आगे बौने हैं। गन्दी मिठाई पर चाँदी का वरक लगा देने से मिठाई का स्वाद भले ही अच्छा न हो मगर दिखती जरूर अच्छी है। यही स्थिति इन फालतू और पालतू लोगों की होती है। दिल और दिमाग से खोखले होने के बावजूद पीपों की तरह हर कहीं बजते हुए अपनी मौजूदगी का भान कराते रहते हैं।

पिछले कुछ दशक से फालतू और बातूनी बकवासी लोगों की संख्या में निरन्तर इजाफा हो रहा है और ये लोग कहीं भी डेरे लगाकर चर्चाओं में व्यस्त देखे जा सकते हैं। कई बार सार्वजनिक स्थल और सरकारी-गैर सरकारी दफ्तरों तक में ऐसे लोगों का जमावड़ा बना रहता है और तब लगता है जैसे सब्जी मण्डियां ही हों। बिना लक्ष्य के अनर्गल प्रलाप करते रहने वाले लोगों का जमावड़ा किसे भाता होगा। यों देखा जाए तो आदमियों की एक किस्म ही ऐसी हो गई है जिसे न घर में रहना पसंद है, न कोई काम करना। बल्कि दिन उगते ही ये लोग निकल पड़ते हैं और कहीं न कहीं अपनी तरह के लोगों का समूह देखकर जम जाते हैं। इन लोगों के जीवन का एक ही मकसद होता हैकि जितना अधिक से अधिक बोल सकते हों, बोलें और अपना टाईमपास करें। भले ही इनकी वजह से कई जरूरी काम न हो पाएं, बाधाएं आएं, और वे लोग भी परेशान होते रहें जिनके लिए ये भवन बने हैं, मगर इससे इन बकवासी और निठल्ले लोगों का कोई लेना-देना नहीं।

इनके लिए तो ये स्थल किसी सराय या धर्मशाला से कम नहीं हैं। चाहे जहां जमकर बतियाने लगो, परिसरों में चाहे जहां अपने वाहनों को पार्क करो और जितना इन भवनों और परिसरों का इस्तेमाल कर सकते हो, करो, यही इनका एकमेव लक्ष्य होता है। हर पराये और परायी वस्तु को इस्तेमाल करने पर नज़र गड़ाए बैठे इन लोगों का भगवान ही मालिक है। अपने इलाके में ही कई सारे लोग ऐसे हैं जिन्हें यहां-वहां फालतू चर्चा करते हुए देखा जा सकता है। इन लोगों का जीवन ही इसके लिए बना होता है कि बकवास करें। किसी दिन इन लोगों को बकवास का समय न मिले, या इनके जैसे नुगरे और निठल्ले संगी-साथी नहीं मिलें तो ये लोग अधमरे और बीमार हो जाते हैं, जैसे इनके प्राण ही किसी ने नोंच लिये हों।

सभ्यता, अनुशासन, मानवता और संवेदनशीलता से कोसों दूर रहने वाले ये लोग अपने आपको उस प्रतिष्ठा के साथ ही देखते हैं जैसे गली का प्रतिनिधि जानवर। काम-धाम के नाम पर कुछ नहीं और चर्चाएं करवाओ तो अमेरिका और रूस से लेकर अपनी गली तक की बातें करते रहेंगे और वह भी नॉन स्टाप। जहां कहीं ऐसे बकवासी लोगों के दर्शन करें, मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दें कि उसने न तो हमें उन्मादी या विक्षिप्त बनाया है और न ही बकवासी। वरना हम भी इनकी तरह जिन्दगी का अर्थ भुला बैठते।


---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

कोई टिप्पणी नहीं: