हर कहीं लिख मारने की लत !!!
समाज में हर किसम के लोग विद्यमान हैं। इनमें अति बुद्धिशालियों से लेकर बुद्धिजीवियों, मंदबुद्धियों और बुद्धिहीनों से लेकर हर प्रजाति के विक्षिप्तों, अर्द्धविक्षिप्तों, उन्मादियों और महाविक्षिप्तों तक की गौरवशाली मौजूदगी अपनी धरा को धन्य करती रही है। इनमें से मनोरोगियों की भी कई किस्में हैं। कोई चिल्लाता है, बकवास करता रहता है, कोई गाता रहता है और कोई किसी न किसी पर कीचड़ उछालता रहता है। कोई बेवजह दूसरों के कामों में दखल देने का आदी है, कोई अपनी बुद्धिहीनता को छिपाने के लिए तरह-तरह के उपदेशों की बरसात करने और अनचाहे ही नसीहतें देने का आदी हो गया है। कितने ही ऐसे हैं जो विघ्नसंतोषियों की परंपरा को धन्य कर रहे हैं तो कई ऐसे हैं जो पूरी दुनिया को अपनी अंगुलियों पर नचाने का अहंकार भरे हुए गुब्बारों की तरह इधर-उधर हवाई उड़ान भर रहे हैं। कुछ एकदम नाकार हैं जो ऐसे-ऐसे पेशों में घुस आए हैं जिनसे जनता भय खाती है या इनकी शक्ल और हरकतों को देख कर ही सामने वाले को भय लगने लगता है।
कुछ ऐसे हैं जिनके पास न कोई काम है, न वे किसी काम को करने लायक माद्दा रखते हैं, वे इधर-उधर घूमते रहकर अफवाहें फैलाने और ऐसी-ऐसी बातों में माहिर हैं जिनका कोई आधार ही नहीं हुआ करता। कुछ अपने आपको बुद्धिजीवी होने के भरम में हर कहीं माईक थामने के पागलपन से ग्रस्त हैं, कई सारे ऐसे हैं जो कभी लोगों का जयगान करते नहीं थकते, कभी निन्दा और आलोचना का ज्वार उमड़ा देते हैं। कइयों को रोजाना सम्मान और प्रतिष्ठा चाहिए और वे शालों, साफों और सम्मानों को ही अपने जीवन का मकसद मानकर चल रहे हैं। खूब सारे ऐसे जीव हैं जिन्हें यह पता ही नहीं है कि वे क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं? भेड़ों की रेवड़ की तरह इन्हें कहीं भी ले जाया जा सकता है। कुछ लोग तोप बने हुए घूम रहे हैं इनमें बारूद कोई और भरता है और टारगेट बताता कोई और है। खैर इन किसम-किसम के लोगों की भरमार के बीच अनेकता में एकता का राग अलाप रहे मेरे अपने क्षेत्र से लेकर भारतभूमि का हर कोना धन्य है इन सभी तरह के लोगों को अपनी पावन धरती पर सहेज कर।
बेतहाशा बढ़ती जा रही इसी भीड़ के बीच अपने आस-पास कई लोग आपको मिल जाएंगे जिन पर किसी न किसी तरह की सनक सवार होती है। ये देखने में भले ही सामान्य प्रतीत होते हैं मगर इनकी हरकतों को देखंे तो लग जाएगा कि कहीं न कहीं से अव्वल दर्जें वाले सनकी मिज़ाज़ के हैं। आजकल बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगांे की देखने में आ रही है जो कागज के पन्नों पर तो नहीं लिख पाते मगर जहाँ-तहाँ इनके हाथ लेखन में व्यस्त जरूर रहते हैं। दरअसल यह अपने आप में मीनिया (मनोरोग) का लक्षण है जो खुद के लिए तो पछतावे का कारण होता ही है, समाज को भी पीढ़ियों तक इसका ख़ामियाजा भुगतना पड़ता हैै। लिखने की अजीब लत वाले सनकियों ने दुनिया भर में अपनी हरकतों का दिग्दर्शन कराया है। अपने गाँव-शहर के आस-पास की बात हो या देश-दुनिया के किसी कोने की। हर कहीं प्राचीन महत्त्व के ऐतिहासिक, दर्शनीय स्थल, पर्यटन केन्द्र, धार्मिक धाम, रेल-बसों आदि से लेकर आधुनिक तीर्थ-उद्यान या इमारतों तक को आप गौर से देखें तो मनोरोगियांे के चेहरे इनकी दीवारों और फर्श से लेकर गुसलखानों तक में आपको नज़र आएंगे।
इन स्थलांे के आस-पास वालों और वहाँ पहुँचते रहने वाले सैलानियों ने अपनी सनक दिखाते हुए इनकी दीवारों, छत-गुम्बदांे, फर्श और जहाँ जगह दिखी, कुछ न कुछ इबारतें लिख ही डाली हैं। इन लोगों ने पेंट, रंग, कोयला, चॉक और जो कुछ मिला उसका इस्तेमाल कर अपनी विक्षिप्तता दिखा ही दी है। कुछ नहीं मिला तो नुकीले पत्थर से खरोंच कर ही सही। कहीं दिनांक के साथ नाम तो कहीं शेरो-शायरियाँ, तो कहीं बदसूरत चित्र ही बना डाले हैं। कई स्थलांे पर अश्लील शब्द और वाक्यों के साथ नंगे चित्रांे का ही चित्रण कर डाला है। अब सनकियों ने पुरा स्मारकांे, मंदिरों, धर्मस्थलों, सत्संग भवनांे, उद्यान, बांध, पुल और सार्वजनिक इमारतों, दफ्तरांे आदि से लेकर जहाँ जगह दिखी, अपनी सनक वहाँ उण्डेल दी है। सार्वजनिक पेशाबघरों, शौचालयों व सुलभ कॉम्प्लेक्स की दीवारों पर जो चित्रात्मक लेखन दिखता है उससे सर शर्म के मारे झुक ही जाता है। और तो और इन मनोरोगियांे ने प्रतीक्षालयों, रेल्वे और बस स्टैण्ड्स, बसों की सीटों, भारतीय मुद्रा, श्मशान घाटों तक को नहीं छोड़ा है अपनी विलक्षण लेखन कला का हुनर दिखाने से।
इन सनकियों की करतूतांे से सार्वजनिक महत्त्व के स्थल बदरंग होते जा रहे हैं। ख़ासकर उन स्थलों की हालत ज्यादा खराब है जो बस्ती से दूर, उपेक्षित या एकांत में हैं। इनकी दीवारों पर जिस तरह की गंदी भाषा में नंगे चित्रों के साथ जो कुछ लिखा गया है उसे समाज का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है। इस तरह की हरकतों से सार्वजनिक सम्पदा को बचाए रखने के लिए गंभीरतापूर्वक प्रयास नहीं हो पाए तो ये स्थल इन सनकियों की वजह से लगातार बदरंग व बदसूरत होते चले जाएंगे और सैलानियों को इनमें भौण्डापन, अश्लील तस्वीरों और घृणित इबारतों के सिवा कुछ नहीं मिलने वाला। इसके साथ ही यह जरूरी है कि हर कहीं लिख मारने की लत रखने वाले मनोरोगियों का ईलाज भी करवाया जाए। अब ऐसे लोगों का किस तरह से ईलाज होना चाहिए, इस बारे में किसी को कुछ बताने की जरूरत नहीं है।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
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