वरना जन्मों तक नसीब न होंगे ये !!
जो लोग जिन ओहदों पर बैठे या जमे हुए हैं उन सभी का लक्ष्य यही होना चाहिए कि अपने ओहदों से जुड़े हुए कामों को पूरी निष्ठा और लगन के साथ करें, कर्म और व्यवहार में माधुर्य तथा ईमानदारी का परिचय दें और जिन लोगों के लिए उन्हें ओहदे सौंपे गए हैं उन्हें पूरी मदद करें, समय पर काम करें और अपनी कत्र्तव्यनिष्ठा तथा ओहदों से जुड़े कार्यकाल को यादगार बनाएं। जो लोग ओहदों पर होते हुए जिम्मेदारियों का ढंग से निर्वहन नहीं कर पाते हैं और टालमटोल तथा निकम्मेपन को अपना लेेते हैं, दूसरों के इशारों पर कठपुतलियों की तरह नाचते हैं, भ्रष्टाचार और बेईमानी का सहारा लेते हैं, औरों के कहने पर चलते हैं या ओहदों की गरिमा को धूल धुसरित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, उन लोगों को आने वाले कई जन्मों तक ओहदेदार या समृद्ध होने की बात तो दूर है, आदमी के रूप में अवतरित होने तक की भी संभावनाएं तक भी नहीं हुआ करती। ओहदों का सुख व्यक्ति के परिश्रम और पूर्वजन्म के पुण्यों के फलस्वरूप प्राप्त होता है और ऎसे में जो लोग अपने ओहदों व कर्मयोग के साथ न्याय कर पाते हैं उन्हें ही लोगों की सद्भावनाएं और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं तथा इससे संचित होने वाले पुण्य की वजह से इस जन्म में भी, और आने वाले जन्म में भी इन लोगों के ओहदे तरक्की करते रहते हैं।
ओहदों के साथ न्याय करने वाले और अपने कार्यों से संबंधित लोगों के प्रति संवेदनशील रहने वाले व्यक्ति अपने जीवन में सदैव मस्त और बिंदास रहते हैं और उनके चेहरे पर हमेशा अलग ही तरह की मस्ती छायी रहती है। परोपकारी और सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित व्यक्तित्वों को अपने भविष्य की चिन्ता नहीं हुआ करती क्योंकि इन लोगों की अपने कर्म और ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास का भाव होता है और यह भाव ही इतना प्रधान होता है जिसकी वजह से इन लोगों के जीवन में इस प्रकार की कोई समस्याएं आती ही नहीं जिनकी वजह से इन्हें कभी उल्लूओं की तरह अर्थ संग्रह नहीं कर पाने का मलाल रहे। ईश्वरीय अनुकंपा और इनके कार्यों की वजह से निरन्तर प्राप्त होती रहने वाली सद्भावनाएं और दुआएं इनके जीवन की सारी समस्याओं का स्वतः ही समाधान कर लेती हैं। यों भी जो लोग सद्मार्ग पर चलते हैं और मानवीय मूल्यों के परिपालन के साथ ही मानवता की सेवा के लिए समर्पित होते हैं उनके कार्यों में ईश्वर स्वयं मददगार सिद्ध होता है और इन्हें अच्छे कर्मों के लिए ऊर्जा और शक्ति प्रदान करता रहता है।
इसके विपरीत श्वानों और उल्लूओं की तरह धन-वैभव के पीछे वे ही लोग हमेशा बदहवास से भागते-फिरते हैं, जिन्हें न अपने पर विश्वास है, न अपनी वंश परंपरा के गौरव पर, न ईश्वर पर, और न ही मानवता पर। ऎसे लोग अपने भविष्य के लिए हमेशा आशंकित रहते हैं और पग-पग पर शंकाओं और अविश्वासों भरे माहौल के बीच जीते हुए भविष्य को असुरक्षित मानते हुए वैध-अवैध संग्रहण और छल-कपट के साथ अपनी जेबें और अपने घर भरने में लगे रहते हैं। इसके साथ ही ये ही वे लोग होते हैं जो हमेशा सुरक्षा कवच तलाशने के लिए ऎसे-ऎसे लोगों की चम्पी और चरणवंदना करते रहते हैं जिन्हें सज्जन लोग आदमी तक होने लायक नहीं मानते। ओहदेदार लोगों की यों तो कई किस्में होती हैं लेकिन मुख्य रूप से जो प्रजातियां हमारे सामने हैं उनमें दो-तीन तरह के लोग हैं। आम तौर पर देखा जाता है कि जो लोग निरन्तर संघर्ष और परिश्रम के साथ योग्यता और प्रतिभाओं के अनुरूप कोई स्थान पा लेते हैं वे सामने वालों के दर्द को समझते हैं, और ये ही लोग अपने ओहदों और ड्यूटी के साथ न्याय कर पाते हैं। वहीं कई सामंती और शोषक वृत्ति वाले लोग ऎसे होते हैं जो ओहदों को पाकर अपने आपको जमाने का सिकंदर मान लेते हैं, और फिर चमड़े के सिक्के चलाते रहते हैं।
कई ऎसे हैं जिन्हें जाने किस पुराने पुण्य या भाग्य से कोई ओहदा मिल जाता है, तब ये उस ओहदे का इतना रस निकाल लेते हैं कि यह ओहदा न रहकर शहद का छत्ता ही बना रहता है। ऎसे लोग जहाँ रहेंगे, जाएंगे वहाँ अपनी चूषक वृत्ति का परिचय देेते हुए शोषण की सारी सीमाएँ लाँघते रहते हैं। ऎसे चूषकिया मूषकों को इन्हीं की तरह के दूसरे चूषक भी सौभाग्य से मिल ही जाते हैं। जो किसी न किसी ओहदे पर बिराजमान हैं उन सभी को सोचना चाहिए कि उनके जीवन का लक्ष्य क्या है और उनके ओहदों का मकसद क्या है। एक बार ये दोनों ही लक्ष्य समझ में आ जाने पर थोड़ी-बहुत बौद्धिक क्षमता रखने वाले लोग भी अपने आपको बदलने का रास्ता पा सकते हैं।
बहुत बड़ी संख्या में ऎसे लोग भी हमारे सामने हैं जिन्हें न खुद की गरिमा से मतलब है, न अपने ओहदों की गरिमा को जानते हैं। कई अपने ओहदों तक को सोने के अण्डे देने वाली मुर्गियों के रूप में पाकर पूरी मुर्गियां ही हलाल करने में लगे हुए हैं। कई तो ऎसे हैं जिन्हें यह भरम बना हुआ है कि ओहदे पाकर वे सर्वशक्तिमान और संप्रभु हो चुके हैं और वे ही हैं जिनके इशारों पर जमाना चलता है। कई ऎसे हैं जिन्होंने कभी इतना सारा वैभव देखा नहीं, न उनकी पीढ़ियों ने ही देखा है, ऎसे में जितना ज्यादा से ज्यादा बटोर सकें, बटोरने में भिड़े हुए हैं। कइयों को लगता है जैसे मरने के बाद भी ये ओहदे और कुर्सियाँ उन्हें साथ ही नवाजी जाएंगी।
ओहदों पर बैठने के बाद मानवता को वे ही लोग नहीं भूल पाते, जो ईश्वर की पसंद हुआ करते हैं। वरना बहुसंख्य लोग तो ऎसे हैं जो ओहदे पा कर मानव जीवन की सारी हदें पार करने में गौरव और गर्व का अनुभव करते हैंं। ओहदों का अहंकार पूरे समाज और परिवेश पर आज धुँध की तरह छाया हुआ है। अहंकार और संवेदनहीनता उन्हीं ओहदेदारों में होते हैं जो या तो संस्कारहीन हों या ओहदों के लायक नहीं हों। आजकल तो ओहदेदार होने का मतलब है चाहे जो जुल्म ढा लेना या मनमर्जी का खुला खेल खेलना। जिनमें न मानवीय संवेदनाएं होती हैं, न कोई दर्द और न ही कोई वंश गौरव का भान। इन लोगों को लगता है जैसे वे अमर बूटी खा कर आए हैं और जिन्दगी भर उनके भ्रम इसी प्रकार बने रहने वाले हैं। हमसे पहले खूब बड़े-बड़े ओहदेदार आए, जिनके पास पूरी दुनिया का साम्राज्य और वैभव था, वे भी चले गए। फिर हम कहाँ रहने वाले हैं जो जिन्दगी भर भिखारी बने हुए, जहाँ-तहाँ जात-जात की भीख ले लेकर वैभवशाली होने के सफर पर हैं। हमसे भी बड़े-बड़े अहंकारी और वैभवशाली लोग आए और चले गए। उनके साथ न कुर्सियाँ गई, न धन-वैभव और न ही उनका अपना अहंकार। नंगे-भूखे आये थे, जिन्दगी भर नंगे होने का स्वाँग रचते हुए खूब जमा किया और फिर जाना पड़ा, और वह भी आखिर में नंगा ही, जैसे आये थे। सभी ओहदेदारों को सोचना होगा कि वे कौन हैं, क्यों आये हैं और क्या साथ ले जाने वाले हैं। यह हम सभी अभी नहीं सोचेंगे तो फिर कब? मुर्दाें में सोचने की क्षमता तक नहीें होती, सिर्फ जलने और खाक होने का माद्दा ही शेष बचा रहता है।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
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