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शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

भारतीय भाषाएँ नदियाँ, हिन्दी महानदी.


राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने हिन्दी दिवस के अवसर पर ‘भारतीय भाषाओं को नदियां और हिन्दी को महानदी’ बताया. शुक्रवार को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने विज्ञान भवन में आयोजित एक समारोह में कहा कि अगर हम चाहते हैं कि हमारा लोकतंत्र शक्तिशाली और प्रगतिशील बना रहे, तो हमें केन्द्र सरकार के कामकाज में राजभाषा हिन्दी और राज्यों के कामकाज में उनकी प्रांतीय भाषाओं का सम्मान करना होगा। 

 हिन्दी दिवस के अवसर पर उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास में आज का दिन गौरव का है, क्योंकि हमारे संविधान में हिंदी को 1949 में आज ही के दिन भारत की राजभाषा के रूप में पहचान मिली थी. भारत में अनेक भाषाएं बोले जाने का जि़क्र करते हुए मुखर्जी ने कहा, विविधता के बीच एकता ही हमारे देश की विशेषता है और   हिन्दी देश की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। 

 हिन्दी के उपयोग को बढ़ाने के लिए सरकार की कई योजनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इन प्रयासों से  हिन्दी का प्रचलन बढ़ रहा है. हमारा संकल्प है कि  हिन्दी के साथ-साथ सभी प्रांतीय भाषाएं विकसित हों. राष्ट्रपति ने हिन्दी को अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने की वकालत करते हुए उम्मीद जताई कि बाईस से चौबीस सितंबर के बीच दक्षिण अफ्रीका के जोहानसबर्ग में होने जा रहे नौंवे विश्व हिन्दी सम्मेलन से  हिन्दी  को अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने में सहायता मिलेगी. इस अवसर पर हिन्दी   के प्रसार में योगदान के लिए देश भर के लगभग 50 सरकारी विभागों को पुरस्कृत किया गया. उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई टेलीविजन चैनलों ने हिंदी के साथ-साथ दूसरी भारतीय भाषाओं में भी अपने कार्यक्रम प्रसारित करने शुरू कर दिए हैं। 

  हिन्दी के अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में उभरने का उल्लेख करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि इस समय विश्व के लगभग डेढ़ सौ विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ी और पढ़ाई जा रही है. यूनेस्को की सात भाषाओं में हिन्दी को भी मान्यता मिली है। मुखर्जी ने कहा, यही नहीं, आज व्यापार के क्षेत्र में भी हिंदी महत्वपूर्ण योगदान दे रही है. विदेशी कंपनियां भारत में अपने व्यापार को बढ़ावा देने के लिए हिंदी के साथ-साथ प्रांतीय भाषाओं को अपना रही हैं। 

 हिन्दी को देश की एकता का प्रतीक बताते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, ‘अगर हमें हिन्दुस्तान को एक राष्ट्र बनाना है तो राष्ट्रभाषा हिंदी ही हो सकती है. मुखर्जी ने कहा कि आज़ादी के पैंसठ साल में बापू की यह बात सत्य साबित हुई है. इस अवसर पर अन्य लोगों के अलावा गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे, गृह राज्य मंत्री जितेन्द्र सिंह और सचिव, राजभाषा विभाग शरद गुप्ता भी उपस्थित थे। 

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