मनुष्य जीवन ईश्वर का दुर्लभ उपहार है जो अनेक जन्मों में भटकाव के बाद प्राप्त होता है। इसकी सफलता का आधार रुपया-पैसा और जमीन-जायदाद या पद-प्रतिष्ठा नहीं है बल्कि मानव जीवन उसी का सफल है जो मनुष्य के गुणों से युक्त है और जगत के कल्याण की भावना को साकार करता है। मनुष्य के लक्षण न हों ऐसी मानव देह निरर्थक है और इसकी कोई उपयोगिता न स्वयं के लिए है, न जगत के लिए। मनुष्यत्व और मुमुक्षत्व से हीन मनुष्य पृथ्वी पर भारस्वरूप ही हैं और इन्हें पशुओं से अधिक नहीं समझा जाता। भले ही ऐसे बोझ अपने आपको जीवंत और प्रेरक मानते रहें। कलियुग में मनुष्य होना ख़ास बात नहीं है बल्कि मनुष्य के रूप में अपने आपको स्थापित करना चुनौतीपूर्ण है लेकिन बहुत कम संख्या में लोग ऐसे होते हैं जो इस चुनौती को स्वीकार कर पाने का साहस करते हैं और इनमें भी सफल रहने वाले लोगों का प्रतिशत तो काफी न्यू नही रहता है।
मनुष्य के गुणों से युक्त लोगों के भीतर दैवीय गुणों का प्रतिशत ज्यादा होता है और उनमें दया, करुणा, मैत्री जैसे गुण कूट-कूट कर भरे होते हैं। मनुष्य के लिए धर्म और आचरण के विषयों का न्यूनाधिक मात्रा में होना ही गौरवान्वित करने वाला है। जिनमें ये गुण ज्यादा मात्रा में होते हैं वे देवताओं और महापुरुषों के करीब होते हैं और जैसे-जैसे इन गुणों की मात्रा और घनत्व कम होता जाता है, ऐसे लोग असुरों के करीब होने लगते हैं। जिनमें आसुरी गुणों का समावेश होता है वे पशुओं और असुरों की जिन्दगी जीने लगते हैं और उनके प्रत्येक हाव-भाव, काम-काज, रहन-सहन, लक्ष्य और सोच-विचार से इनका असुरत्व अक्सर प्रकट होता रहता है। आजकल कलिकाल चल रहा है और ऐसे आसुरी वृत्तियों वाले लोगों की भरमार है। अपना इलाका हो या देश-दुनिया का कोई सा क्षेत्र, हर कहीं ऐसे लोगों की तादाद बढ़ती ही जा रही है। पशुओं की संख्या कम होती जा रही है और मनुष्य का ढांचा पाकर मनुष्य बनने वालों का आंकड़ा जनसंख्या विस्फोट को जन्म दे रहा है। यों आजकल मनुष्य के भेस में हमारे यहां विद्यमान लोगों के आचरणों को देखकर इनके पशुत्व के प्रति किसी को कोई संदेह रह नहीं जाता है।
आजकल पशुओं और मनुष्यों के बीच सबसे पहला और बड़ा अन्तर उनके व्यवहार और मुखाकृति से अच्छी तरह जाना जा सकता है। हमारे आस-पास कई सारे लोग हैं, खूब सारे लोग हमारे अपने इलाकों में हैं और जहाँ हमारा काम पड़ता है अथवा हमारे इलाके में जिधर नज़र दौड़ाएं, हर कहीं ऐसे मनहूस लोग बड़े पैमाने पर बिराजमान हैं जिनका दर्शन, स्मरण और सामीप्य मात्र ही दुर्भाग्य और मनहूसियत लाने वाला है। इन लोगों के चेहरों को देख कर ईश्वर पर दया आती है जिसने इन्हें जाने किस पुण्य के मारे मनुष्य का स्वरूप दिया होगा, वरना किसी भी दृष्टि से इन्हें मनुष्य स्वीकार करना किसी भी समझदार के लिए असंभव ही है। ऐसे मनहूस चेहरों वाले लोग आजकल हर चौराहों, गलियों, तमाम प्रकार के बाड़ों से लेकर राजपथ और जनपथ पर हैं। इन लोगों को सिर्फ पैसा और झूठी वाहवाही बटोरनी और षड़यंत्रों में रमते हुए अपनी चवन्नी चलानी ही आती है, मानवीय मूल्यों और मानवता के आदर्शों या परिवेश, समाज आदि से कुछ लेना-देना नहीं है। इन लोगों के चेहरे पर हमेशा उदासी और मनहूसियत ही छायी रहती है और ऐसे लोगों का दर्शन हर किसी के लिए अशुभ तथा भाग्यहीनता का खेल ही दिखाता है।
ऐसे मनहूस लोेग ऐसे-ऐसे बाड़ों में घुस आए हैं जहाँ मुस्कान और लोक व्यवहार के सारे रंगों का उल्लास नज़र आना चाहिए। मगर ऐसा होता नहीं है। हमारे आस-पास से लेकर हमारे अपने इलाके में खूब लोग ऐसे हैं जो हर क्षण अहंकार के लबादे को ओढ़ कर घूमते रहते हैं। न किसी के नमस्कार या अभिवादन का कोई उत्तर देते हैं, न किसी से प्रेम से बात कर सकते हैं, न किसी के प्रति आदर और सम्मान जता सकते हैं और न अपने आस-पास रहने और काम करने वालों को कभी खुश रख सकते हैं और न ही खुश देख सकते हैं। अपने से बड़े-बुजुर्गों के प्रति किस प्रकार का आदर भाव दर्शाना चाहिए, यह भी इनके संस्कारों में कभी नहीं रहा। ऐसे गमगीन और मनहूस चेहरों वालों लोगों को देख कर ही भाँपा जा सकता है कि इनके दिल-दिमाग में कितने षड़यंत्र और मलीनताओं के सागर उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। फिर ऐसे दो-चार मनहूस किसी एक स्थान पर मिल जाएं तो वह स्थल ही जीवंत श्मशान में तब्दील हो जाता है।
हममें से कई लोग ऐसे हैं जो ऐसे मनहूसों के श्मशान से वाकिफ हैं। अपने क्षेत्र में तलाशें तो कई सारी चहारदीवारियों से घिरे आलीशान कक्षों में ऐसे कई-कई श्मशान देखने को मिल जाते हैं जिनमें ऐसे मनहूस चेहरों वाले दुर्भाग्यदायी भूतों का डेरा रहता है और इनकी अजीब सी गंध पसरी रहती है। जहाँ कर्मक्षेत्र में मुस्कान और प्रसन्नता के भाव न हों, हर एक को लगे कि कहीं से भी तलवार लटक सकती है, परिसरों से क्रोध और हिंसक मनोवृत्ति की गंध आने लगे तथा बाहर से आने वाले लोगों को भी वहां आकर लगे कि कहाँ फंस गए, तब समझ लेना चाहिए कि श्मशान की दृष्टि से यह आदर्श परिसर हैं और यहाँ रहने वाले मनहूस लोगों का जीवन जीते जी श्मशान ही हो गया है। हमारे संपर्क में अक्सर कई लोग ऐसे आते हैं जो कहीं से मनुष्य से नहीं लगते, उनका काम ही लूट-खसोट और भ्रष्टाचार करने से लेकर अपनी चवन्नियां और चमड़े के सिक्के चलाने का रह गया है, उन्हें औरों की कोई परवाह नहीं है, उन्हें परवाह उन्हीं लोगों की ही रहती है जो उनके लिए उनकी ही तरह माल सूंघने और सेंध मारने के आदी हैं। ऐसे ही लोग परिवेश और संसार में आसुरी धुंध फैलाने में जिन्दगी गुजार देते हैं।
इन लोगों के आस-पास काम करने वाले और किन्हीं मजबूरियों की वजह से इनके संपर्क में आने वाले लोग ऐसे मनहूस लोगों से हमेशा परेशान रहते हैं क्योंकि इन मनहूसों और दुर्भाग्यशालियों के रहते हुए उनका सारा आनंद छीन जाता है और उसकी जगह पग-पग पर पसर जाता है गमी, मायूसी और मुर्दानगी का डेरा। इस तरह की ओढ़ी हुई गमी और मायूसी बड़े कहे जाने वाले लोगों में कुछ ज्यादा ही हुआ करती है। इन लोगों की पारिवारिक जिन्दगी भी अपने पदों व प्रतिष्ठा के अहंकारपूर्ण चोगों की वजह से मायूसी से भरी होती है। दिन-रात इनका पूरा जिस्म और दिमाग पद, प्रतिष्ठा और पैसों के अहंकार से भरे लबादों से लक-दक रहता है।
इनकी जिन्दगी में कुछ ही वे क्षण होते हैं जब इनके चेहरों पर मायूसी की बजाय कुछ क्षण के लिए ही मुस्कान तैर पाती है और वह भी तब जब हराम की कमाई या गिफ्ट पा जाने का कोई मौका हाथ लग जाए, या अपने बाये किसी षड़यंत्र के बीजों से कोई अंकुर फूट पड़े, वरना हमेशा इनके चेहरों पर मनहूसियत के भाव तैरते हुए तरंगायित होते रहते हैं। ऐसे मनहूस लोगों के चेहरों का कोई दोष नहीं होता बल्कि हकीकत ये है कि इनके मन और मस्तिष्क में इतना कचरा जमा होता है, इतने षड़यंत्रों के ताने-बाने रोजाना बनते रहते हैं कि इनका मनः सौंदर्य पूरी तरह खत्म हो जाता है और उसकी जगह घृणा, कुटिलता और स्वार्थों का डेरा जम जाता है और यही फिर इनके चेहरों से प्रतिबिम्बित होने लगता है। इसलिए जहां तक संभव हो, ऐसे लोगों को असुर या पशु मानकर इनसे व्यवहार कम करते चले जाएं और इनके दर्शनों या सामीप्य से दूर रहें ताकि इनकी छाया से हम कभी दूषित न हो सकें। जो इनकी छाया में आज सुकून पा रहे हैं उनकी तो दुर्गति आने वाला समय ही बखानेगा, प्रतीक्षा करें।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
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