लोकपाल एवं लोकायुक्तों पर राज्यसभा की प्रवर समिति की रिपोर्ट शुक्रवार को भारी हंगामे के बीच सदन में पेश की गई। बाद में समिति के अध्यक्ष व कांग्रेस नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने संवाददाताओं से कहा, "इस मुद्दे के कानूनी पक्ष और विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच मतभिन्नता को देखते हुए अनुशंसाएं देना एक मुश्किल काम था।" उन्होंने कहा, "विरोधाभासी विचार थे, लेकिन सभी सदस्यों ने राष्ट्रहित में अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं को दरकिनार कर दिया। समिति में जब विधेयक पर चर्चा हुई तो इसे लेकर कोई विवाद पैदा नहीं हुआ।"
समिति ने प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के दायरे में लाने की अनुशंसा की है, लेकिन विदेश मामलों, आंतरिक सुरक्षा, परमाणु ऊर्जा तथा अंतर्राष्ट्रीय सम्बंधों को लेकर प्रधानमंत्री को छूट देने के लिए कहा है। चतुर्वेदी ने कहा, "बहस के बाद विधेयक में 12 संशोधनों की अनुशंसा की गई।"
यह विधेयक पिछले साल शीतकालीन सत्र के आखिरी वक्त में लोकसभा में पारित हो गया था, लेकिन राज्यसभा में यह पारित नहीं हो सका था। इसके मौजूदा स्वरूप को लेकर विभिन्न दलों में मतभिन्नता थी। इसे इस साल बजट सत्र के दौरान प्रवर समिति को सौंपा गया था। समिति ने राज्य लोकायुक्तों को लोकपाल विधेयक से अलग करने की भी सलाह देते हुए इसे राज्यों के 'विवेक' पर छोड़ने के लिए कहा।
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