उन कर्मों को त्याग दें, जिनसे पछतावा हो - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 7 नवंबर 2012

उन कर्मों को त्याग दें, जिनसे पछतावा हो


सभी प्राणियों में मनुष्य इसीलिए श्रेष्ठ है कि भगवान ने उसे बुद्धि दी है और इसी के बूते उसे सत्यासत्य का बोध होता है और उसका पूरा जीवन विवेक तथा अनुशासन की मर्यादाओं में बँधा रहकर चलता रहता है। इन्हीं बौद्धिक विलक्षणताओं की वजह से मनुष्य पशुओं से पृथक पहचान कायम करता हुआ अपने जीवन लक्ष्यों को प्राप्त करता है। यह क्रम निरन्तर चलता रहता है। यह बुद्धि कुबुद्धि भी हो सकती है या सद्बुद्धि भी। हर मनुष्य के जीवन में असंख्यों मौके ऐसे आते हैं जब कई कामों को आरंभ करने से पहले, बीच में और पूर्ण हो जाने अथवा अपूर्ण रह जाने पर कभी सुकून का अहसास होता है और कभी दुःख का। उन क्षणों में जब सुकून प्राप्त होता है तब हम उन कामों को आगे भी जारी रखने का संकल्प लेने लगते हैं। इसके विपरीत कई कामों के बाद पछतावा होता है और तब भी इनकी पुनरावृत्ति नहीं करने के संकल्प लेने का प्रयास करते हैं।

इन दोनों ही स्थितियों में कोई बाहर का आदमी या बाहरी शक्ति हमें किसी भी काम के अच्छे-बुरे होने का कोई भान नहीं कराती है बल्कि हमारे भीतर की आत्मा ही हमें कम से कम एक बार यह संकेत दे ही देती है कि अमुक काम बुरा है अथवा अमुक काम अच्छा है। काम के मध्य में भी एक बार इसका संकेत मिलता है और कार्य पूर्णता या अपूर्णता के बाद भी हमें आत्मा संकेत देती ही है। यह अलग बात है कि हम आत्मा की आवाज को सुनने की क्षमता रखते हैं या नहीं। यह निर्भर करता है व्यक्तिगत जीवन में सादगी, शुचिता और सकारात्मकता पर। जो व्यक्ति जितना अधिक पाक-साफ होता है उसे आत्मा की आवाज साफ सुनाई देती है। अपने पूरे जीवन में घर-परिवार की बात हो या व्यक्तिगत निजी जिन्दगी की,  या फिर परिवेश और समाज के साथ अपने व्यवहार की, अच्छे या बुरे का भान हर आदमी को निश्चित ही होता है लेकिन वह कार्य की पूर्णता अथवा अपूर्णता के तत्काल बाद।

यह वह क्षण होता है जब व्यक्ति का संक्रमण काल चरम पर होता है और उसे निर्णायक समाधान करना होता है। लेकिन जो लोग इस क्षण के संकेतों के प्रति गंभीर नहीं हुआ करते हैं उनके लिए जिन्दगी भर किसी न किसी समस्या या तनाव का जन्म हमेशा होता रहता है और यही तनाव उनके जीवन आनंद को छीन लेता है। अपने कर्मयोग से जुड़े हर पहलू पर किसी भी कार्य के आरंभ, मध्य और समाप्ति पर आत्मा के संकेतों को समझें और निर्णय लें। ऐसा होने पर जीवन में सुगंध और सफलता दोनों प्राप्त होते हैं और यश का विस्तार होता है। भगवान ने सिर्फ मनुष्यों को ही वह शक्ति प्रदान की है जिसकी वजह से यह सटीक निर्णय ज्ञात हो सकता है कि कौन सा काम अच्छा-बुरा है। हमारी पूरी जिन्दगी में जिन कामों को करने से प्रसन्नता का बोध हो, उन्हें निरन्तर जारी रखा जाना चाहिए। इसके ठीक विपरीत जिस काम को करने से दुःख या पछतावा हो तथा अपने भीतर से यह भावना आकार ले कि प्रायश्चित जरूरी है, उस कर्म को पूरी तरह त्याग देने में ही अपना भला है।

हर आदमी के भीतर ब्रह्म का अंश है चाहे वह कितना ही बड़े से बड़ा आतंकवादी, समाजकंटक, भ्रष्ट, कामुक, व्यभिचारी, चोर-डकैत, हरामखोर, निर्वीर्य, पुरुषार्थहीन, किन्नर, आसुरी विचारों वाला, बेईमान, घूसखोर, मुनाफाखोर, कमीशनबाज, दलाल हो या बड़े से बड़ा राजनेता, बिजनेरमैन या अफसर। या फिर सामान्य से सामान्य व्यक्ति। ये लोग चाहे कितने वैध-अवैध काम करते रहें, उनकी हर गतिविधि पर आत्मा के भीतर से अच्छे या बुरे की एक तीखी गंध आती ही है। लेकिन जो लोग मदांध, अंधविश्वासी और मानवीय गुणों से हीन हैं उन लोगों का स्वभाव ही ऐसा बन जाता है कि वे किसी की बात मानते ही नहीं। दूसरे शब्दों में कहें तो इन लोगों के विवेक पर इतनी मोटी परत चढ़ी होती है कि इन्हें कोई अच्छी बात सुहाती तक नहीं। जीवन जीने की सबसे बड़ी कला यही है कि आत्मा की आवाज सुनें क्योंकि आत्मा ही एकमात्र वह साक्षी है जो अपने अच्छे और बुरे कर्मों का ध्यान रखती है, इनका पल-पल का पूरा रिकार्ड रखती है और समय-समय पर हमें ईश्वर का अंश होने का भान कराती रहती है।

एक तथ्य यह भी है कि हर व्यक्ति को परोपकार और पुण्य तथा अच्छे कर्मों की सायास स्मृति नहीं हुआ करती बल्कि उन सभी कामों की याद हमेशा क्लिक करते ही रील की तरह घूमने लगती है जो बुरे कर्म हैं।  जीवन में आनंद की चरम प्राप्ति और प्राप्त संसाधनों का  पूर्ण उपभोग करने के लिए जरूरी है कि बुरे कर्मों को स्मृति पटल से हटाएं, इसके लिए जो मन में है उसे बाहर की ओर फेंकने की कोशिश शुरू करें और फिर देखें। जैसे-जैसे आपका चित्त पुरानी बुरी स्मृतियों से मुक्त होने लगेगा, वैसे-वैसे अलग ही मस्ती छाने लगेगी और दुनिया हमसे अनचाहे ही प्रेम करने लगेगी। जिसका चित्त जितना ज्यादा शुद्ध होता है उसकी आकर्षण क्षमता उतनी ही अधिक व्यापक और घनीभूत होती है। यही कारण है कि दुनिया में कई लोग ऐसे हैं जिनसे मिलने पर, सम्पर्क करने पर, बातचीत में आनंद की प्राप्ति होती है और ऐसे लोग जहाँ कहीं होंगे वहाँ प्रेम, आनंद और प्रसन्नता अपने आप पसर जाती है। इसका अनुभव भी किया जा सकता है।



---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

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