न उठाएं फायदा, मजबूरी या अनभिज्ञता का - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 10 दिसंबर 2012

न उठाएं फायदा, मजबूरी या अनभिज्ञता का


आदमी की जिन्दगी का आजकल सबसे बड़ा ध्येय यही हो गया है कि कैसे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जाए और जमा किया जाए। इस उधेड़बुन में घिरा आदमी अपनी सारी ऊर्जाएं इसी में खपा देता है कि उसे कहां से किस प्रकार कुछ ऎसा मिल जाए जिसके लिए अलग से कोई मेहनत नहीं करनी पड़े। आदमीयत को छोड़ कर कुछ भी करना पड़े, आदमी आजकल गुरेज नहीं करता। इन्हीं सब गोरखधंधों में रमा हुआ आदमी वह हर काम करने लगा है जिसमें उसके हाथ कुछ लग जाए। चाहे फिर वह वैध हो या अवैध। आदमी आजकल अपनी चवन्नी चलाने के लिए तथा अपनी कमायी के लिए दूसरों की मजबूरी उठाने में भी पीछे नहीं रहता। मानवीय संवेदनाओं से भरे-पूरे लोग भले ही अपनी भावनाओं को परोपकार के लिए समर्पित कर दें और नाम कमाएं लेकिन अधिकांश लोग तो ऎसे ही हैं कि अपने लाभ के लिए औरों का कुछ भी कबाड़ा कर देने के लिए पीछे नहीं रहते। औरों की मजबूरी या अनभिज्ञता का फायदा उठाने वाले गांवों और ढांणियों से लेकर महानगरों और राजधानियों तक खूब पसरे हुए हैं और रोजाना अपने कामों को अंजाम देते रहते हैं।

हम जहां रहते हैं और जहां आते-जाते रहते हैं वहां और लोगों की पीड़ाओं और समस्याओं का निवारण हमारा प्राथमिक फर्ज हुआ करता था लेकिन धीरे-धीरे मानवीय संवेदनाओं का इस कदर क्षरण होता चला गया कि आज आदमी औरोें से लाभ पाने के फिराक में ही लगा रहता है। इसके लिए वह इसी तलाश में लगा रहता है कि कौन मजबूर है और कहां से उसका लाभ लिया जा सकता है।  याें देखा जाए तो राह भटके हुओं को राह दिखाना, समस्याओं से पीड़ितजनों को सम्बल प्रदान करना, मुश्किलों में पड़े लोगों की मदद, बेसराहाओं, आप्तजनों को संबल, जरूरतमन्दों को राह दिखाने से लेकर आदमी के लायक हर काम मेंं भागीदारी निभाने के लिए आदमी तत्पर हुआ करता था।

आज आदर्शों और नैतिक मूल्यों का ह्रास होता चला गया और मानवीय संवेदनाएं धड़ाम से नीचे गिरी हैं। इस वजह से आदमी के भीतर से मनुष्यत्व गायब होने लगा है और वह मजबूरी का फायदा उठाने के सारे करतबों और गोरखधंधों में माहिर है। मनुष्य के जीवन में आने के बावजूद जो लोग मनुष्य की मजबूरियों और अनभिज्ञता का फायदा उठाते हैं वे भले ही आर्थिक सम्पन्नता प्राप्त कर लें मगर बौद्धिक सम्पन्नता और शांति उनसे निरन्तर दूर भागती चली जाती है। इसलिए मनुष्यत्व को जानें-पहचानें और दूसरों का फायदा उठाने की कल्पना और कर्म का परित्याग कर खुद के बूते आगे बढ़ने का प्रयास करें।



---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077

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