उन संबंधों को छोड़ें, जो आपको बाँधते हैं - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

उन संबंधों को छोड़ें, जो आपको बाँधते हैं


संबंधों के कई प्रकार के रूप हैं। हर स्वरूप में हर प्रकार के संबंधों के अलग-अलग अर्थ और परिभाषाएँ होती हैं। ये संबंध ही हैं जो व्यक्ति-व्यक्ति, व्यक्ति और समाज तथा व्यक्ति और परिवेश के बीच सेतुओं का निर्माण करते हैं। संबंधों की मजबूती और आयु सभी संबंधित पक्षों की आशाओं-आकांक्षाओं और अपेक्षाओं पर निर्भर होती हैं। जहाँ स्वार्थ के कारण सायास कोई सम्पर्क होता है वह संबंध स्वार्थों की पूर्ति तक ही सिमट कर रह जाता है जबकि  निष्काम भाव से अथवा अनायास स्थापित हो जाने वाले संबंध जिन्दगी भर के लिए टिकते और निखरते रहते हैं और इनके लिए यह जरूरी नहीं कि हमारे अंत के साथ ही समाप्त हो जाएं बल्कि ये आने वाली कई पीढ़ियों तक भी बने रह सकते हैं।

यों दुनिया में जो संबंध अनायास हो जाते हैं वे पूर्व जन्मों के किसी न किसी संबंध को भी अभिव्यक्त करने वाले होते हैं अथवा इस प्रकार के संबंधों में दैवीय निर्देश या प्रेरणा भी हुआ करती है। संबंधों में स्वार्थों की कालिख होने पर इनका आलोक तत्व घट जाता है और यह न हमें रोशनी दे पाते हैं और न ही जमाने को। इन संबंधों में मंदत्व दोष देखा जाता है। संबंधों का सांसारिक और लौकिक पक्ष यह है यह उस निश्चित समय तक ही सभी संबंधित पक्षों को बांधे रखते हैं जब तक इनमें से उभयपक्षीय या एकपक्षीय स्वार्थ पूरा न हो जाए। संसार के ज्यादातर लोेग इन्हीं प्रकार के स्वार्थपूर्ण संबंधों की वजह से एक-दूसरे से बंधे रहते हैं। एक बार स्वार्थ के संबंधों के फंस जाने के बाद आदमी जिन्दगी भर इनसे बाहर निकल नहीं पाता है और दिन ब दिन एक के बाद एक काम चलचित्र की तरह सामने आते रहते हैं और इन कामों की वजह से पुराने संबंधों को प्रगाढ़ रखते हुए नए-नए संबंधों को अपनाने को विवश होना ही पड़ता है।

इस पूरी यात्रा में कई लोगों से हमारे संबंध बनते और बिगड़ते रहते हैं और लाभ-हानि के कई अवसरों से साक्षात होता है। स्वार्थ की श्रृंखला पूरी जिन्दगी यों ही चलती रहती है और आदमी पूरे जीवन भर मकड़जाल में इस कदर फंसा होता है कि वह जाल के भीतर हलचल करते हुए अपने आपको जिन्दा और चलित तथा सक्रिय तो बता सकता है किन्तु जाल से बाहर नहीं निकल पाता। या यों कहें कि स्वार्थों के जाले उसे भीतर ही बांधे रखते हैं। इनसे भी परे दूसरे प्रकार के संबंध ऎसे होते हैं जो किसी कर्षण शक्ति के मारे प्रगाढ़ और अटूट तो रहते हैं मगर इनमें स्वार्थ कोई लक्ष्य नहीं हुआ करता बल्कि जो कुछ होता चला जाता है वह संबंधों के प्रवाह में अपने आप होने लगता है। इससे जुड़े दोनों अथवा सभी पक्षों को इसके लिए न ज्यादा सोचना पड़ता है न कुछ करना पड़ता है। इन संबंधों में स्वार्थ की बजाय आत्मीयता के भाव ज्यादा प्रगाढ़ होते हैं।

जहां तक संबंधों के चरम लक्ष्य की बात है वास्तविक संबंध वे ही होते हैं जो किसी न किसी स्वार्थ, मोह या बंधन में बांधने की बजाय हमें उनसे मुक्त करें और इस प्रकार मुक्त करें कि संबंधों में आत्मीय प्रगाढ़ता भी रहे और सारे बंधन भी समाप्त हो जाएं। यहीं से शुरू होती है संबंधों से ईश्वर और आत्म आनंद पाने की साधना। आजकल के भोगप्रधान ‘लव’ की बातों को छोड़ कर वास्तविक प्रेम की यदि बात करें तो सच्चा प्रेम वही होता है जो व्यक्ति को हर प्रकार के बंधनों से मुक्त कर दे। फिर चाहे वह प्रेम किसी प्राणी से हो अथवा भगवान से, या किसी पहुंचे हुए संत-फकीर अथवा योगी से। असली संबंध वही है जो लौकिकता से अलौकिकता की ओर ले जाए।

आजकल हम जिसे प्रेम कहा करते हैं वह वस्तुतः भोगप्रधान और क्षणिक है तथा भोगों की पूर्ति के बाद ये संबंध अपने आप समाप्त हो जाते हैं अथवा शिथिलता पा लेते हैं। इसे प्रेम की बजाय मोहांधता, दैहिक स्वार्थ और क्षुद्र कामनाओं की पूर्ति का माध्यम कहा जाना ज्यादा बेहतर होगा। संबंधों में यदि किसी भी प्रकार का बंधन है और उस बंधन की वजह से अपने ईश्वरीय और दिव्य कार्यों में कोई बाधाएं आती हैं तो इसका सीधा सा अर्थ यही है कि ये संबंध हमारे जीवन के लिए बंधनकारी हैं और ऎसे बंधनों के रहते हुए व्यक्ति वर्तमान जन्म में तो मुक्ति पा नहीं सकता, उलटे इन बंधनों की वजह से अगले जन्मों में भी उसका नये से नया प्रारब्ध चलता रहता है।

इसलिए जीवन में संबंधों के मर्म को समझें और उन सभी प्रकार के संबंधों को तिलांजलि दें जो हमें किसी न किसी प्रकार से बांधते हैं। प्रेम और आत्मीयता भी चरम स्तर पर होती है तब मन और तन दोनों ही प्रत्यक्ष जुड़ावोें के दैहिक धरातल को त्याग कर दिव्यता में रूपान्तरित हो जाती है। ऎसे में संबंधों के दिव्यत्व का अहसास इतना प्रगाढ़ रहता है कि दूर होने के बावजूद एक विशिष्ट कर्षण शक्ति से दोनों तट जुड़े रहते हैं जिनमें बंधन नाम की कोई चीज नहीं हुआ करती। वास्तविक प्रेम वही है जो बंधनों से मुक्त करे। जहां बंधनों से मुक्ति का आरंभ होता है वहीं से वास्तविक प्रेम और आत्मीय संबंधों की शुरूआत होती है और ये संबंध ही दैवीय और दिव्य हैं जिन्हें पाने के बाद लौकिक और अलौकिक आनंद की महा भावभूमि प्राप्त हो जाती है।



- डॉ. दीपक आचार्य
9413306077

1 टिप्पणी:

शारदा अरोरा ने कहा…

bahut sahi aalekh...pyaas sabhi ko usi ghoont ki ...